अनुसूचित जाति/जनजाति विकास कानून में जनसंख्या के अनुपात में हो बजट आवंटित- निखिल डे

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दलित व आदिवासी समुदाय हेतु जन बजट पर पर चर्चा व विचार विमर्श बैठक का आयोजन हुआ सम्पन्न

जयपुर। स्वाधिकार, दलित आर्थिक अधिकार आन्दोलन राजस्थान और दलित अधिकार केन्द जयपुर के संयुक्त तत्वाधान में डॉ. बी.आर.अम्बेडकर मेमोरियल वैलफेयर सोसायटी, झालाना डूंगरी, जयपुर में दलित व आदिवासी समुदाय हेतु जन बजट पर पर चर्चा व विचार विमर्श बैठक पर चर्चा बैठक का आयोजन किया गया। दलित आर्थिक अधिकार आन्दोलन राजस्थान के राज्य समन्वयक चन्दा लाल बैरवा एडवोकेट ने कहा कि जब तक दलित व आदिवासी समुदाय के लोग जागरूक होकर अपने अधिकारों की मांग नही करेगे, तब तक कानून बनने से कुछ नही होगा। क्योंकि कानून कितना ही अच्छा बना ले जब तक उसकी पालना करने वाले अधिकारी, कर्मचारी ईमानदार व संवेदशील नही होगे कानून व्यर्थ है। इसलिए हमारा यह साझा प्रयास होना चाहिये की कानून भी प्रभावी बने व प्रभावी रूप से पालना भी हो । लेकिन देखा गया है कि सरकान कानून बना देती है लेकिन उसकी ईमानदारी से पालना नही होती। देश में दलित व आदिवासियों की जनसंख्या 30 प्रतिशत है। कानून में जनसंख्या के अनुपात में बजट आवंटित करने का प्रावधान है, लेकिन नही किया जाता। अतः हमारी मांग होनी चाहिये सौ में से तीस हक हमारा।

चर्चा बैठक में सामाजिक कार्यकर्ता व दलित लेखक स्वतंत्र पत्रकार भवंर मेघवंशी ने विशेष रूप से अनुसूचित जाति/जनजाति विशेष विकास निधि (योजना, आवंटन, एवं वित्तीय संसाधनों का उपयोग) अधिनियम-2022, की पृष्ठ भूमि व कानून बनने तक का संघर्ष पर विस्तार से प्रकाश डाला।

मजदूर किसान सक्ति संगठन के सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे ने अनुसूचित जाति/जनजाति विशेष विकास निधि (योजना, आवंटन, एवं वित्तीय संसाधनों का उपयोग) अधिनियम-2022, के नियमों के प्रारूप पर चर्चा की । नेसार अहमद, निदेशक बार्क, जयपुर ने कहा कि उक्त कानूनी दलित आदिवासियों को विकास की मुख्य धारा में लाने के लिए बहुत अच्छा है आवश्यकता है इसके कानून प्रभावी बने ताकि कानून की सार्थकता साबित हो सके।

एक्शनएड जयपुर के प्रोग्राम ऑफिसर ने नवीन नारायण ने कहा कि दलित व आदिवासियों की सामाजिक व आर्थिक स्थिति सदियों से  बहुत कमजोर रही है जिसके कारण से दलित व आदिवासी विकास की मुख्य धारा में नही जुड पाये। अतः दलित व आदिवासीयों को विकास की मुख्य धारा में लाने के लिए उक्त कानून वर्ष 2022 में पास हुआ जिसके कानून बनने जा रहे है हमारा प्रयास यह रहे कि कानून आपके सहयोग व आपसी चर्चा व विचार विमर्श से ऐसे बने ताकि दलितों की सामाजिक व आर्थिक स्थिति में सुधार हो सके

चर्चा बैठक में विस्तार से चर्चा व विचार विमर्श कर प्रतिभागीयों ने अनुसूचित जाति/जनजाति विकास कानून के नियमों को प्रभावी बनाने के लिए निम्न सुझाव दियेः-
1. कानून की पालना करने के लिए अधिकारी/कर्मचारियों की जवाबदेही सुनिश्चित हो।
2. जनसंख्या के अनुपात में बजट आवंटित हो व पूरा खर्च हो।
3. अन्य मद में खर्च नही किया जावे।
4. बजट व खर्च की नियमति मॉनिटरिंग हो।
5. उक्त अधिनियम के तहत बजट ग्राम पंचायत के स्तर पर कार्य करने वाले पांच विभाग उनको भी आवंटित किया जावे।
6. दलित व अदिवासियों को रोजगार, स्वगरोगार से जोडने व आर्थिक रूप से सक्षम करने के लिए कौशल विकास योजना के तहत प्रशिक्षित किया जावे।
7. उक्त योजना के तहत व्यक्तिगत लाभ, परिवारिक लाभ व समुदायिक लाभ की योजना विभागवार तैयार कर बजट आवंटित किया जावे।
8. दलित व आदिवासी महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत करने के लिए उनको रोजगार से जोडा जावे।
9. दलित आदिवासियों को आर्थिक रूप से सशक्त करने के लिए इस योजना के तहत भूमि आवंटित की जावे।
10. दलित व आदिवासियों के छात्र-छात्राओं को गुणवतापूर्ण शिक्षा प्राप्त करने के लिए नवोदय विद्यालय की तर्ज पर विद्यालय खोले जावे।
11. प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए दलित व आदिवासी छात्र-छात्राओं को निःशुल्क कोचिंग करने के लिए व्यवस्था की जावे।
12. इस योजना के तहत बेरोजगारों को बिना गारंटी के ऋण उपलब्ध करवाया जावे।
13. इस योजना के तहत एप तैयार किया जावे जिसमें आवंटन, खर्च, कार्य बजट आदि के बारे में जानकारी अपडेट होती रहे।
14. इस योजना के तहत अधिकारियों की जवाबदेही, पारदर्शीता, सुनिश्चित की जावे।
15. योजना का बजट, एक्शन प्लान सार्वजनक होना चाहिये व लोगों से सुझाव आमंत्रित किये जाने चाहिये।
16. कक्षा 10 वी से कम्पयूट शिक्षा अनिवार्य की जावे।
इस चर्चा व विचार विमर्श बैठक में आदिवासी मंच से धर्मचन्द खैर, उदयपुर, हेमन्त मीमरौठ, एडवोकेट, बन्ने सिंह जाटव, अलवर, सुनीता देवी, जिला समन्वयक, दलित अधिकार केन्द्र दौसा, श्रीमती द्रोपदी जोनवाल, प्रेरक, दलित आर्थिक अधिकार आन्दोलन सहित अजमेर, दौसा, भरतपुर, सीकर, अलवर, झून्झूनू, आदि जिलो से 50 प्रतिभागीयों ने भाग लिया।

kalamkala
Author: kalamkala

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