योगक्षेम वर्ष में साधु, साध्वियों और समणियों के लिए उपलब्ध है ज्ञानाराधना और आगमन अध्ययन का स्वर्णिम अवसर- आचार्य महाश्रमण,
लाडनूं में आयोजित त्रिदिवसीय अनुष्ठान के दूसरे दिन विभिन्न मंत्रों के जप प्रयोग



लाडनू़ं (kalamkala.in)। जैन विश्व भारती में योगक्षेम वर्ष के अन्तर्गत त्रिदिवसीय आध्यात्मिक अनुष्ठान के द्वितीय दिवस मंगलवार को सुधर्मा सभा में आचार्यश्री महाश्रमण ने अनेकानेक मंत्रों के जप का प्रयोग कराया। आचार्यश्री महाश्रमण ने उपस्थित जनों को संबोधित करते हुए कहा कि बत्तीस आगम हमारे धर्मसंघ की व्यवस्था में सम्मत हैं, जिनमें ग्यारह अंग, बारह उपांग, चार मूल, चार छेद और एक आवश्यक। ये आगम प्रमाण के रूप में मान्य किए गए हैं। ग्यारह अंगों को तो स्वतः प्रमाण कहा गया है, इसके साथ सभी बत्तीस ही आगम प्रमाणभूत हैं।साधु-साध्वियां व समणियां भी इनका स्वाध्याय और पारायण करते हैं। हम लोगों के पास बत्तीस आगमों का मूलपाठ उपलब्ध है। मूलपाठ को पढ़ने से ही उसके भावार्थ को समझ लेना तो ज्ञान के क्षेत्र में बहुत अच्छी गति की बात हो सकती है।अनुवाद तो उस मूलपाठ का आधार होता है।मूलपाठ से अर्थ समझ आ जाता है, तो ज्ञान की अच्छी प्रगति मानी जा सकती है। ज्ञान की और अच्छी बात यह हो सकती है कि मूलपाठ के आधार पर अनुवाद की गलती को भी पकड़ लिया जाए।अनुवाद करने में पक्षपात की भावना नहीं, बल्कि तटस्थता हो तो बहुत अच्छी बात हो सकती है।उन्होंने कहा कि आगम के अनुवाद का कार्य गुरुदेवश्री तुलसी के समय से प्रारम्भ हुआ। उनके साथ आचार्यश्री महाप्रज्ञ भी इससे जुड़े और वे तो मानों आगम कार्य के लिए समर्पित ही हो गए थे। योगक्षेम वर्ष का समय सामने है। साधु-साध्वियां व समणियां हैं। वे यहां अपने लम्बे समय का लाभ आगम स्वाध्याय के रूप में लेने का प्रयास करें, तो इन बारह महीनों में कई आगम स्वाधित हो सकते हैं। साथ ही उसमें से कुछ नोट भी बना लिया जाए तो व्याख्यान आदि देने के लिए अच्छी सामग्री तैयार की जा सकती है। योगक्षेम वर्ष में आगम के सिवाय और भी कोई साहित्य आदि का कार्य भी किया जा सकता है। कोई आगम संबंधी कार्य भी करना है तो उसमें भी समय लगाने का प्रयास करना चाहिए। गुरुदेव तुलसी के समय प्रारम्भ हुए इस कार्य को जितनी गति दी जा सके और यह कार्य कुछ वर्षों में सुसम्पन्न हो जाए, तो बड़ी बात हो सकती है। अनेक साधु, साध्वियों व समणियों को जो अलग-अलग कार्य सौंपे हुए हैं, इस योगक्षेम वर्ष की अवधि में उस कार्य को पूर्ण करने का प्रयास किया जा सकता है।
उच्च शिक्षा और पीएचडी के लिए साधु-साध्वियों से आह्वान
आचार्य श्री महाश्रमण ने कहा कि जो साधु, साध्वियां व समणियां अध्ययन में आगे बढ़ना चाहें, पीएचडी आदि करनी हो तो उनके लिए भी यह योगक्षेम वर्ष स्वर्णिम काल के समान हो सकता है। उनके लिए तो जैन विश्व भारती और ग्रन्थागार आदि के रूप में लगभग सारी सामग्रियां उपलब्ध हो सकती हैं। इसके लिए तो यह मानों स्वर्णिम काल है। विश्वविद्यालय से संबंधित अध्ययन व महाप्रज्ञ श्रुताराधना आदि के पाठ्यक्रमों में भी समय लगाकर ज्ञान के क्षेत्र में बहुत अच्छा विकास किया जा सकता है। उसमें भी मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित होना और सामूहिक रूप में कोई चर्चा और ज्ञान की बात हो तो बहुत अच्छी बात हो सकती है। इसके माध्यम से भी स्वयं को लाभान्वित किया जा सकता है। इस प्रकार यह योगक्षेम वर्ष भी हमारे कार्य करने का महत्त्वपूर्ण अवसर बन सकता है।
बाहर से आए साधु-संतों ने की खम्मतखामणा
कार्यक्रम के दौरान नवदीक्षित साध्वी व समणी ने संतवृंद को वंदन किया तो संतवृंद की ओर से मुनि धर्मरूचि ने नवदीक्षित साध्वी व समणी के प्रति मंगलकामना की। इस अवसर पर बहिर्विहार से गुरु सन्निधि में पहुंची साध्वीवृंद व समणीवृंद ने आचार्यश्री सहित मुख्यमुनि आदि संतवृंद से खमतखामणा करते हुए सुखपृच्छा की, तो संतवृंद की ओर से मुनि धर्मरूचिजी ने साध्वीवृंद व समणीवृंद से खमतखामणा व मंगलकामना की। तदुपरान्त अग्रणी संतवृंद ने भी साध्वी समुदाय से खमतखामणा की। मुनि कौशकुमार ने अपनी भावाभिव्यक्ति देते हुए गीत का संगान किया। मुनि विनोदकुमार ने भी अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति दी।






