शांत और अनन्त चार प्रकार के होते हैं लोक- आचार्यश्री महाश्रमण

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ज्ञानार्थियों को ज्ञान के साथ-साथ अच्छे संस्कार देने की दी प्रेरणा


  • छापर (चूरू)। ‘भगवान महावीर जिस समय कायंजला नगर के बाहर स्थित छत्र पलाशक चौत्य में विराजमान थे। उस समय स्कंदक नामक एक परिव्राजक भगवान महावीर से मिलने का निश्चय करता है। उधर भगवान महावीर ने गौतम स्वामी को बताया कि देखो, अभी कुछ ही समय में तुम अपने पूर्व मित्र स्कंदक को देखोगे। गौतम स्वामी ने स्कंदक की अगवानी की और पिंगल नाम के वैशालिक श्रावक द्वारा स्कंदक से पूछे गए प्रश्न का उल्लेख किया। यह बात सुनकर स्कंदक ने गौतम स्वामी से पूछा कि यह बात तो पिंगल के साथ व्यक्तिगत रूप में हुई थी, मुझे आश्चर्य कि आपको इस बात का पता कैसे चला? ऐसा ज्ञानी, तपस्वी वह कौन आदमी है, जिसने हमारी इतनी रहस्यपूर्ण बात को जान लिया। गौतम स्वामी ने कहा कि मेरे गुरु, धर्माचार्य तो भगवान महावीर हैं, जो सर्वज्ञ हैं। वे अतीत, वर्तमान और भविष्य के ज्ञाता हैं। उन्होंने ही सारी बात बताई।’
    ‘उन दिनों भगवान महावीर प्रतिदिन भोजन लेने लगे थे, जिससे शरीर भी अच्छा हो गया था। स्कंदक ने भगवान महावीर की वन्दना की और उनके पास पर्युपासना के रूप में स्थित हो गया। भगवान महावीर से पूछे गए प्रश्नों का उत्तर देते हुए बताया कि लोक चार प्रकार के होते हैं-द्रव्यतः, क्षेत्रतः, कालतः, भावतः। द्रव्यतः के अनुसार सारा लोक एक ही है और सारा लोक एक है तो वह शांत हो गया, क्योंकि उसका अंत ही नहीं। क्षेत्र की दृष्टि से एक सीमा के बाद भी शांत होता है। काल के अनुसार अनंत है। लोक हमेशा था, है और रहेगा, नित्य, शाश्वत है। भाव के अनुसार भी पर्याय के कारण लोक अनंत है। इस प्रकार दो दृष्टियों से लोक शांत है और दो दृष्टियों से अनंत है।’
    जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण ने गुरुवार को छापर चातुर्मास प्रवास स्थल में बने आचार्य कालू महाश्रमण समवसरण में प्रेरणा प्रदान करते हुए यह सब बताया। आचार्यश्री ने काल का विस्तारित वर्णन करने के उपरान्त कालूयशोविलास का रोचक शैली में आख्यान किया।
    बच्चों में ंसंस्कार एवं ज्ञान का विकास जरूरी
    आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा द्वारा आयोजित राष्ट्रीय ज्ञानशाला प्रशिक्षक सम्मेलन 2022 के त्रिदिवसीय कार्यक्रम के दूसरे दिन ज्ञानशाला प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय संयोजक सोहनराज चौपड़ा ने अपनी विचाराभिव्यक्ति दी। ज्ञानशाला की प्रशिक्षिकाओं द्वारा गीत का संगान हुआ। मुम्बई ज्ञानशाला की प्रशिक्षिकाओं ने अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति दी। इस संदर्भ में आचार्यश्री ने कहा कि जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के तत्त्वावधान में ज्ञानशालाएं संचालित होती हैं और क्षेत्रीय स्तर पर सभाएं उनके संचालन का कार्य देखती हैं। ज्ञानशाला के संचालन का एक महत्त्वपूर्ण अंग है ज्ञानशाला में ज्ञानार्थियों को प्रशिक्षण देना। ज्ञानशाला के प्रशिक्षक/प्रशिक्षिकाएं यह ध्यान दें कि बच्चों में कैसे अच्छे संस्कार और ज्ञान का विकास हो सके। इसके लिए बच्चों को जो भी बताएं, उसके उच्चारण की शुद्धता का ध्यान दिया जाए। मात्रात्मक शुद्धि का भी प्रयास हो। आचार्यश्री ने उच्चारण शुद्धि का प्रशिक्षण देते हुए कहा कि बच्चों को अच्छी सीख देने के साथ अच्छे संस्कार भी देने का प्रयास हों और प्रशिक्षिकाएं उपासिकाएं बनने का भी प्रयास करें, तो अच्छा हो सकता है। निरंतर ज्ञान के अर्जन का प्रयास होता रहे।
kalamkala
Author: kalamkala

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