साहित्य, शोध व व्याकरण से समृद्ध राजस्थानी भाषा को विश्व के 16 करोड़ लोग बोलते हैं, लाखों साहित्यिक कृतियां, 5 लाख पांडुलिपियां संरक्षित, शिक्षण संस्थानों व विश्वविद्यालयों में होता है अध्ययन, पर मान्यता को तरसी, राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए राष्ट्रपति से गुहार

SHARE:

[responsivevoice_button voice="Hindi Female"]

साहित्य, शोध व व्याकरण से समृद्ध राजस्थानी भाषा को विश्व के 16 करोड़ लोग बोलते हैं, लाखों साहित्यिक कृतियां, 5 लाख पांडुलिपियां संरक्षित, शिक्षण संस्थानों व विश्वविद्यालयों में होता है अध्ययन, पर मान्यता को तरसी,

राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए राष्ट्रपति से गुहार

मूंडवा (kalamkala.in)। अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति के संस्थापक लक्ष्मण दान कविया ने राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू से राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलवाने की गुहार की है। कविया ने अंग्रेजी भाषा में लिखे ज्ञापन के सारांश में लिखा है कि हमारी मातृभाषा राजस्थानी भाषा को यथाशीघ्र संवैधानिक मान्यता देने का दिशा-निर्देश वे भारत सरकार को दिलावें, ताकि एक समृद्ध साहित्य सम्पन्न भाषा राजस्थानी अपने बहुप्रतीक्षित सम्मान को प्राप्त कर सके। राजस्थानी भाषा साहित्य दृष्टि से सम्पन्न एवं जीवंत भाषा है। यह भाषा सम्पूर्ण राजस्थान के साथ ही मालवा, मध्यप्रदेश, अमरकोट, हरियाणा, पंजाब व गुजरात के क्षेत्रों में आज भी बोली जाती है। राजस्थानी की मेवाड़ी, ढूंढाड़ी, हाड़ौती, बागड़ी, ब्रज, मारवाड़ी, भीलाड़ी, पहाड़ी, खामा, बदोसी आदि उप भाषाएं हैं। डिंगल पिंगल राजस्थानी की समृद्ध साहित्य शैलियां हैं। राजस्थानी में लाखों ग्रंथ रचे जा चुके हैं, साथ ही 5 लाख पांडुलिपियां आज भी सरकारी संरक्षण में सुरक्षित हैं। राजस्थानी के सहयोग से ही भारतीय भाषाएं समृद्ध हुई है। राजस्थानी का हजारों वर्ष पुराना साहित्यिक इतिहास रहा है। राजस्थानी लोक साहित्य से ऋग्वेद की ऋचाएं भी प्रभावित हुई, जिसके सैकड़ों उदाहरण मौजूद हैं। कविया ने लिखा कि राजस्थानी लोकगीत, लोककथाएं, लोकगाथाएं, कहावतें, लोकनृत्य की अलग ही पहचान बनी हुई है। राजस्थानी में वर्णित संत, सती, सूरमा, साहूकारों का जीवन हमेशा प्रेरणास्त्रोत रहा है। राजस्थानी की बदौलत ही हिंदी राष्ट्रभाषा बनने के मार्ग पर अग्रसर है। हिंदी की आदिकाल की सारी सामग्री राजस्थानी द्वारा सुसज्जित है, इसे नकारा नहीं जा सकता। विदेशी भाषा विशेषज्ञ कर्नल जेम्स टॉड, जाॅन ग्रियर्सन, एलपी टेसीटोरी आदि विद्वानों ने राजस्थानी पर शोध कार्य कर इस भाषा की विशेषताओं को विश्व के सामने उजागर किया है। राजस्थानी का विशाल शब्दकोश एवं व्याकरण इसे पृथक साहित्य समृद्ध भाषा मानने के लिए विद्वानों को सहमत करते हैं। राजस्थानी विश्व की पच्चीसवीं एवं भारत की तीसरी साहित्य समृद्ध भाषा है। इसके बोलने वाले 16 करोड़ लोग आज विश्व के कोने-कोने में फैले हुए हैं। शिक्षा की दृष्टि से राजस्थानी आज सीनियर सेकेंडरी स्कूलों, महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर राजस्थानी कार्यक्रम एवं समाचार बुलेटिन प्रसारित हो रहे हैं। राजस्थानी भाषा की मान्यता का आंदोलन गांधीवादी विचारधारा से देश आजाद होने से पूर्व से चला आ रहा है। जनता की बेहद मांग पर राजस्थान विधानसभा की ओर से सर्वसम्मति से राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित करने का संकल्प 25 अगस्त 2003 को पारित कर केन्द्र सरकार को भेजा जा चुका है। प्रतिवर्ष राजस्थानी की सैकड़ों साहित्यिक कृतियां प्रकाशित हो रही हैं। राजस्थानी के विश्वविख्यात कथानवीस विजयदान देथा को उनकी साहित्य साधना के लिए साहित्य के नोबेल पुरस्कार के लिए प्रस्तावित किया जा चुका है। साहित्यिक अकादमियां केंद्र व राज्य सरकार अन्य भाषाओं के विद्वानों की तरह हमेशा राजस्थानी साहित्यकारों को भी सम्मानित एवं पुरस्कृत करती आ रही है। अतः राजस्थानी भाषा को यथाशीघ्र संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित करने का श्रेय एवं प्रेय कार्य करावें, ताकि राजस्थानी भाषा-भाषी लोग अपनी मातृभाषा के सम्मान को पाकर अपने आपको गौरवान्वित महसूस कर सकें।

राजस्थानी को मिले राजस्थान की द्वितीय राजभाषा का दर्जा, मुख्यमंत्री को लिखा पत्र 

डेह/ नागौर (kalamkala.in)। राजस्थानी भासा प्रसार संस्थान नागौर के अध्यक्ष पवन पहाड़िया ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को पत्र लिखकर राजस्थानी भाषा को प्रदेश की द्वितीय राजभाषा घोषित करवाने की मांग की है। पहाड़िया ने लिखा है कि राजस्थान प्रदेश की मायड़ भाषा, जो आजादी के बाद से हमारे तत्कालीन शासकों, हितचिंतकों ने राष्ट्रहित के मद्देनजर जो त्याग किया था, उससे देश के एकीकरण में जो सफलता मिली, उसका श्रेय हम राजस्थानियों को ही है। पर, यह त्याग अब यहां के बच्चों के लिए ही नासूर बन गया है। इस त्याग का खामियाजा पिछले पचहत्तर वर्षों से हमारी मायड़ भाषा व प्रदेश का प्रत्येक नागरिक भोग रहा है। इसकी मान्यता के लिए बराबर आवाज उठाई जाती रही है, आंदोलन भी होते रहे हैं, पर जब तक कोई पीड़ा समझने वाला मसीहा नहीं हो, तब तक भैंस के आगे बीन बजाने जैसा ही सिद्ध होता रहा है। हां, एक बार अशोक गहलोत के 2003 के कार्यकाल में जब सरकार पर अत्यधिक दबाब पड़ा, तो सरकार ने जनता की भावना को समझते हुए एक आवश्यक मानक जिसको पूरा किये बिना केंद्र सरकार भाषाई अनुसूची में मान्यता के लिए विचार नहीं कर सकती है, के मापदण्ड की पूर्ति कर जन आंदोलन को शांत कर वाहवाही लूटकर इतिश्री करली थी। यदि उनकी मंशा साफ होती तो उसी समय केंद्र सरकार, जो कि उनकी स्वयं की थी, से इस प्रकरण का निस्तारण करवा लिया जाता। पर, जन हित की परवाह उनको कदापि नहीं थी, फिर भी उन्होंने संकट में होते हुए भी भाषाई मसले को सर्वसम्मति से पारित करवा कर गेंद केंद्र के पाले में डाल कर जनता की नजरों में एक ऐतिहासिक कार्य के जादूगर बन गए। यह बात तब की थी जब प्रदेश की बागडोर किसी सपूत के हाथ में नहीं थी, यदि सपूत के हाथ में होती तो जो संकल्प सर्वसम्मति से आठवीं अनुसूची के लिए पारित करवा सकते थे, वे प्रदेश की राजभाषा भी घोषित कर लाखों युवाओं व करोड़ों प्रदेशवासियों के दिलों में अपनी जगह बना सकते थे। पर कहते हैं ना कि पाप का घड़ा फूटता है, तब सूपड़ा साफ करके ही दम लेता है और तब से ही जनता जनार्दन ने इनको सिरे से नकारा हुआ है। परिणाम सबके सामने हैं , दैविक कृपा से आज सत्ता एक सपूत के हाथ सौंपी गई है, हो सकता है यह पुण्य कार्य आप जैसे सपूत के हाथों लिखा हो तथा करोड़ों प्रदेशवासियों के दिलों में युगों-युगों तक अमर होना लिखा हो। अतः आप मायड़ भाषा को प्रदेश की द्वितीय राजभाषा बनाने का श्रेय एवं प्रेय कार्य कर प्रदेश के करोड़ों वासियों को यह तोहफा देकर मायड़ भाषा को मान्यता का ताज पहनाने का कार्य कर सच्चे सपूत होने का गौरव अपने व अपनी सरकार के नाम अवश्य करेंगे। जब केंद्र सरकार धारा 370, राममंदिर निर्माण, 35 ए जैसे फैसले लेकर दुनियां को आश्चर्यचकित कर देने का साहस कर सकती है, तो क्या राज्य सरकार इतना सा कार्य भी नहीं कर सकेगी, यह माना जाना असंभव है। अतः आप इसके श्रेय का सेहरा अपने सर बंधवाने को शीघ्रता कर अपना कार्यकाल स्वर्णिम अक्षरों में लिखवाने की कार्यवाही कर प्रदेश के लोगों को राहत प्रदान करावें।

kalamkala
Author: kalamkala

[the_ad id='179']

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

सबसे ज्यादा पड़ गई
[the_ad id='15212']
[the_ad id='22854']
[the_ad id='22855']
[the_ad id='22856']

शहर चुनें

Follow Us Now