गहलोत का सियासी संदेश- रिमोट से नहीं खुद निर्णय करने में सक्षम, उन्हें मनमोहन की तरह नहीं समझा जावे, राजस्थान में गहलोत विरोधी फिर हुए चारों खाने चित

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गहलोत का सियासी संदेश-

रिमोट से नहीं खुद निर्णय करने में सक्षम, उन्हें मनमोहन की तरह नहीं समझा जावे

राजस्थान में गहलोत विरोधी फिर हुए चारों खाने चित

जयपुर (पत्रकार बाबूलाल सैनी की रिपोर्ट)। गांधी परिवार के सबसे विश्वसनीय माने जाने वाले अशोक गहलोत ने अपने ताजा स्टेंड से न केवल कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव के समीकरण को पलटी मार दी, बल्कि देश विदेश की मीडिया व राजनैतिक विश्लेषकों के कयासों को भी उलट दिया। देश की सियासत में एक नया संदेश दे दिया कि वो रिमोट से संचालित नहीं होते, बल्कि खुद निर्णय करने में सक्षम है।
फैल हो गई विरोधियों की सारी पैंतरेबाजी
किसी ने आईडिया भी नही लगाया होगा कि जादूगर की इस जादूगरी का, कि कैसे विरोधियों को एक बार फिर चारों खाने चित कर नये सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया। गांधी परिवार को भी यह आभास तक नहीं हुआ होगा कि उनके गलत निर्णय के खिलाफ अशोक गहलोत ऐसा कोई कदम उठा सकते हैं। उनका मानना रहा होगा कि दस साल तक प्रधानमंत्री के तौर पर मनमोहन सिंह ने जो भूमिका गांधी परिवार के प्रति निभाई, वैसे की वैसे उम्मीद अशोक गहलोत से जताते हुए राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में गहलोत का नाम आगे कर दिया। गहलोत ने भी गांधी परिवार के प्रति अपनी निष्ठा व प्रतिबद्धता जाहिर करते हुए अपनी सहमति दे दी। इसी सहमति पर विरोधियों की बल्ले-बल्ले हो गई और वो गांधी परिवार पर दबाव बनाकर एक व्यक्ति एक पद का राग अलापने लगे। गहलोत ने इस पर भी अपनी सहमति दे दी। ऐसे में विरोधियों को मन मांगी मुराद मिल गई। ऐसे में उन्होंने नया पैंतरा खेला और अध्यक्ष के नामांकन से पूर्व सीएम पद त्यागने व उत्तराधिकारी तय करने के लिए एक लाईन का प्रस्ताव आलाकमान के नाम सहमति के लिए पर्यवेक्षक लगा लिए, यही बात गहलोत समर्थक विधायकों व मंत्रियों को नागवार गुजरी।
खामियाजा आलाकमान की जल्दबाजी का
उनका मानना था कि जब गहलोत ने स्वयं आगे आकर एक व्यक्ति एक पद के सिद्धांत को अपनाने व सीएम पद छोड़ने का बयान दे दिया, तो फिर इतनी जल्दी क्या थी। गहलोत समर्थक विधायकों व मंत्रियों का मानना था कि एक तरफ तो हमारे नेता को आलाकमान के तौर पर स्थापित करने के लिए राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने के लिए सहमति ली जा रही है और दूसरी निर्णय के लिए व ऐसे गंभीर मामलों के लिए पूंछा तक नही जा रहा है। ऐसे में गहलोत समर्थकों ने नाम के अध्यक्ष बनने की बजाय तो अपनी सियासत का ही अहसास कराने का फैसला कर लिया और हुआ भी यही गहलोत समर्थक विधायकों व मंत्रियों ने यह दिखा दिया कि हमारे नेता रिमोट से नहीं खुद निर्णय करने में सक्षम हैं।
kalamkala
Author: kalamkala

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