संवत्सरी पर सालभर का लेखा-जोखा मिलाकर सोचें- क्या खोया, क्या पाया और आत्मा को धर्म और संयम में लगायें- साध्वीश्री युक्ति प्रभा,
लाडनूं में आत्म-मंथन के पर्व संवत्सरी पर्व पर कार्यक्रम आयोजित



लाडनूं (kalamkala.in)। भगवती संवत्सरी के आत्म मंथन के पर्व पर यहां ऋषभ द्वार में कार्यक्रम आयोजित हुआ। कार्यक्रम में शासनश्री विजय मुनि ने कहा कि तीर्थंकरों के वर्णन की तरह ही महासतियों का वर्णन भी आता है। उन्होंने भगवान महावीर के समय में चन्दना सती का पूरा व्याख्यान सुनाया। संवत्सरी पर सुंदर ढाल सुनाई। साध्वीश्री युक्तिप्रभा ने कहा, संवत्सरी पर्व पर पूरे साल का लेखा-जोखा मिलाकर यह सोचें कि हमने क्या खोया, क्या पाया। अपनी आत्मा को धर्म और संयम की ओर लगायें और अपनी भूलों को छोड़कर आगे बढ़ें। यह पर्व हमें आत्म शुद्धि का संदेश देता है। तन्मय मुनि ने कार्यक्रम में ‘आत्मा की पोथी पढ़ने का यह सुंदर अवसर आया है’ गीतिका का संगान किया।
यह सम्यक्त्व को सुरक्षित रखने का पर्व
हाकम साध्वीश्री कार्तिकयशा ने कहा कि यह मन से, वचन से हल्का होने का पर्व है। काम, क्रोध, मद, लोभ आदि से हम कितने ही कर्मों का बंधन करते हैं। आज का यह दिन सम्यकत्व को सुरक्षित रखने का पर्व है। आज के दिन श्रावक-श्राविकायें पौषध, सामायिक, उपवास, व्याख्यान सुनना,व आदि से धर्म में लीन हो जाते हैं। साध्वीश्री ने भगवान महावीर की जीवन यात्रा का वृतांत सुनाया और कहा, तीर्थंकर बचपन से ही तीन ज्ञान से संपन्न होते हैं। भगवान महावीर ने कितने ही कष्ट सहे, पर कभी उनका प्रतिकार नहीं किया। उपसर्ग स्वयं उनके आगे नतमस्तक हो जाते थे। भगवान महावीर ने चार तीर्थ की स्थापना की। साध्वीश्री ने बहुत ही सरस व्याख्यान दिया। महिला मंडल की बहनों ने गीतिका गाई। साध्वी तेजस्वी प्रभा, नम्रताश्री, मन्नय प्रभा व ख़ुशी प्रभा ने भी मंगल भावना व्यक्त की। इस अवसर पर लाडनूं का श्रावक-श्राविका समाज उपस्थित रहा।





