‘तुम मुझे हाजी साहब कहो और मैं तुम्हें काजी साहब कहूंगा’

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कायमखानी महासभा के सदस्यता अभियान में हेराफेरी व अनियमितता के आरोप

(मो. मुश्ताक खांन कायमखानी एवं इकरा पत्रिका के सौजन्य से)

लाडनूं। राजस्थान कायमखानी महासभा के अन्तर्गत ‘कायमखानी विरासत एवं वंशावली संरक्षण समिति’ के सदस्य मो. मुश्ताक खान कायमखानी ने आम कायमखानी समाज से अपील करते हुए बताया है कि राजस्थान कायमखानी महासभा के सदस्यता अभियान में हेराफेरी व अनियमितता की गई है। संविधान को ताक में रखकर विभिन्न निर्णय किए गए हैं। एजीएम बुलाने की मनमानी घोषणा और कायमखानी जाति के नाम पर बन रहे ‘फर्जी ओबीसी प्रमाण पत्रों’ को बनवाने में मददगार बने लोगों का कच्चा चिट्ठा शीघ्र ही कौम के सामने पेश किया जाएगा। इस फर्जीवाड़े को रोकने के लिए अन्तिम सांस तक हर सम्भव प्रयास किया जाएगा। इसके लिए शीघ्र ही जिला कलेक्टरों एवं अन्य सम्बंधित अधिकारियों से मिलकर उन्हें ज्ञापन भी दिया जाएगा।
जरुरत पड़ी तो कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया जाएगा, क्योंकि यह कायमखानी कौम की विरासत, वंशावली व वजूद को बचाने की जद्दोजहद है। उन्होंने अपील करते हुए कहा कि सभी कायमखानी उनके साथ आएंगे तो यह जद्दोजहद करना आसान रहेगा।

क्या है कायमखानी महासभा की AGM के पीछे का षड्यंत्र

AGM (असेम्बली ऑफ जनरल मेम्बर/एनुअल जनरल मीटिंग या वार्षिक आम सभा) किसी भी संगठन/संस्था की रीढ़ होती है। संगठन की एक तरह से यही मालिक होती है। संगठन का हर पदाधिकारी एजीएम के प्रति उत्तरदायी होता है। ऐसा ही राजस्थान कायमखानी महासभा में भी है, जो 1979-80 में सोसायटी एक्ट के तहत रजिस्टर्ड हुई थी। लेकिन दुर्भाग्य से राजनीतिक षड्यंत्र और कायमखानी क़ौम के प्रबुद्ध सरदारों की लापरवाही, खुदगर्जी या यह कहें कि “तुम मुझे हाजी साहब कहो और मैं तुम्हें काजी साहब कहूंगा” वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए पिछले 20 साल में न कभी एजीएम बुलाई गई और ना ही ईमानदारी से एजीएम बनाई गई। लेकिन, इतना जरूर हुआ कि दो तीन बार चुनाव की नौटंकी हुई, चुनाव के नाम पर फसाद व फर्जीवाड़ा हुआ और मामला कोर्ट में पहुंच गया। नीयत में इधर भी खोट था और उधर भी। हां, यह कह सकते हो कि एक पक्ष की नीयत में दो आने खोट था और दूसरे पक्ष के चार आने, लेकिन खोट दोनों तरफ था। जो आज भी है, जिसका खामियाजा पूरी कौम भुगत रही है।

संविधान में नहीं है संयोजक का पद

कोर्ट कचहरी विवाद, चुनाव के नाम पर एक दशक पहले हुए बिसाऊ के लाठी काण्ड और डीडवाना के मिर्ची काण्ड के बाद क़ौम के कुछ सुलझे हुए फिक्रमंद युवाओं और सरदारों ने अच्छी उम्मीद में कोशिश शुरू की। साल आया 2015, तत्कालीन संयोजक मरहूम जी. ख़ान साहब ने अपने पद से इस्तीफा दिया और कर्नल शौकत साहब को नया संयोजक बनाया गया, हालांकि संयोजक पद महासभा के संविधान में नहीं है। फिर भी अच्छी उम्मीद में लोगों ने सब कुछ स्वीकार किया। दोनों पक्षों की सहमति से 151 लोगों की सलाहकार समिति बनाई गई और काम सौंपा गया। हाईकोर्ट से मामले को वापस लेकर छह महीने में फ्रेश इलेक्शन करवाने का था। आज तक इस सलाहाकार समिति की एक बार भी बैठक नहीं बुलाई गई।

फर्जी चुनाव समिति का गठन कर किया कोढ में खाज का काम

साल आया 2020, जबरदस्त प्रेशर के बाद चुनाव के लिए सदस्यता अभियान की घोषणा की गई, लेकिन कोरोना महामारी की शुरूआत की वजह से इसे रोक दिया गया। फिर साल आया 2021, हाईकोर्ट का मामला वापस लेने के लिए एक 11 सदस्यीय समिति का गठन किया गया और मामला वापस हुआ। फिर तीन लोगों ने मिलकर 21 सदस्यीय चुनाव कमेटी बनाई और सदस्यता अभियान की घोषणा की। यह पूरी तरह से अवैध थी, क्योंकि यह काम एजीएम को करना था, लेकिन एजीएम नहीं बुलाई गई। कोढ़ में खाज वाली कहावत यह चरितार्थ हुई कि इन 21 सदस्यों को बनाते वक्त गुट दो की बजाए तीन हो गए तथा तीनों गुटों के आकाओं ने योग्यता से सलेक्शन करने की बजाए, इसमें भाई भतीजावाद किया और अपने नजदीकी लोगों और रिश्तेदारों की चुनाव कमेटी बना दी। यह कायमखानी क़ौम के साथ सरेआम खिलवाड़ नहीं हुआ तो फिर क्या हुआ?

25 से सीधे 500 किया सदस्यता शुल्क

चुनाव कमेटी ने संयोजक कर्नल शौकत साहब के नेतृत्व में काम करना शुरू किया और अक्टूबर 2021 से तीन महीने का सदस्यता अभियान चलाना शुरू कर दिया। महासभा के संविधान को ताक में रख कर मनमर्जी की फीस रख दी और मनमर्जी के निर्णय ले लिए। फीस 25 से बढ़ाकर सीधे 500 रूपए कर दी, ताकि आम व गरीब कायमखानी महासभा का सदस्य नहीं बन सके और चुनाव प्रक्रिया पूरी तरह से राजनेताओं और कुछ धन्नासेठों की चौखट की गुलाम बना दी जाए। दिसम्बर तक तीन महीने में मुश्किल से तीन हज़ार मेम्बर बने, क्योंकि फीस ज्यादा थी। लेकिन, फिर एक महीना बढा दिया गया और फिर राजनेताओं व धन्नासेठों की एंट्री हुई, धड़ल्ले से मेम्बर बनाए गए, हर तरह की हेराफेरी व अनियमितता बरती गई। हर गुट ने अपने तीन चार हज़ार वोट पुख्ता कर लिए। जिसने भी सवाल उठाए उसको तीनों गुटों ने क़ौम का दुश्मन, गद्दार, असामाजिक तत्व आदि शब्दों से सोशल मीडिया पर ट्रोल किया। इस सारे खेल में अधिकतर बड़े सरदार एक तरह से खामोश तमाशबीन बने बैठे रहे।

कायमखानी क़ौम की वंशावली बदलने का प्रयास

विचित्र बात यह भी हुई कि 31 जनवरी 2022 को सदस्यता अभियान समाप्त होने के बावजूद सदस्यता सूची सार्वजनिक नहीं की गई तथा बैक डेट में अपनी मनमर्जी से फरवरी में भी सदस्यता की रसीदें कटती रही तथा बार बार कुछ लोगों द्वारा हाय तौबा करने के बाद मार्च के अन्तिम सप्ताह में जिले वाइज़ किश्तों में सूची जारी करनी शुरू की, जिसमें करीब 32 अन्य जातियों के 1708 लोगों (गैर कायमखानियों) को भी सदस्य बना कर कायमखानी क़ौम की वंशावली ही बदल दी। सवाल करने वालों को लगातार किए जा रहे ट्रोल और कायमखानी क़ौम की विरासत एवं वंशावली को खत्म करने के इस षड्यंत्र के खिलाफ़ कुछ लोग लामबन्द हुए तथा 2 अप्रैल 2022 को “कायमखानी विरासत एवं वंशावली संरक्षण समिति” का गठन किया।

कायमखानी विरासत एवं वंशावली संरक्षण समिति की चार बड़ी मीटिंग, सूचनार्थ नोटिस, लीगल नोटिस और सोशल मीडिया पर की गई तमाम गुजारिश के बावजूद संयोजक महोदय और चुनाव कमेटी ने न किसी बात का जवाब दिया और ना ही कोई सुधार किया तथा इस बीच बार बार यह जरूर सुनने को मिला कि एजीएम बुलाई जाएगी, फिर उसमें तमाम जरूरी फैसले ले लिए जाएंगे। यानी संयोजक महोदय और चुनाव कमेटी ने जो असंवैधानिक निर्णय लिए और कायमखानी क़ौम की विरासत एवं वंशावली के साथ जो खिलवाड़ किया है, उन कर्मकाण्डों पर अब यह लोग एजीएम की मुहर लगवाना चाहते हैं? एजीएम तो बहुत पहले बुलानी चाहिए थी चुनाव कमेटी गठित होने से भी पहले, क्योंकि चुनाव कमेटी के गठन का अधिकार महासभा के संविधान ने एजीएम को दिया है, ना कि किसी पंच पटेल को।

सभी गैर कायमखानी सदस्यों को हटाएं

यकीनन एजीएम बुलाई जाए और उसमें संविधान के मुताबिक 21 लोगों की नई कमेटी गठित की जाए तथा महासभा का सम्पूर्ण रिकाॅर्ड, हिसाब किताब उस नई कमेटी को सौंपा जाए। साथ ही समस्त गैर कायमखानी सदस्यों को सूची से हटाया जाए तथा संविधान की अक्षरशः पालना करते हुए नई कमेटी शीघ्रता से फ्रेश इलेक्शन करवाए।

चेतो कौम के सरदारों

अगर ऐसा नहीं होता है, तो कौम के फिक्रमंद सरदार जमा हों और एक नई 21 लोगों की कमेटी गठित करें और महासभा का एक कार्यवाहक अध्यक्ष बनाएं तथा महासभा को सुचारू रूप से संचालित करने एवं नए चुनाव कराने का प्रयास करें।

kalamkala
Author: kalamkala

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