संवाद के साथ हमारी संस्कृति, परम्परा और अस्मिता की आधारशिला है मातृभाषा- प्रो. व्यास, लाडनूं के जैविभा विश्विविद्मायालय में ‘मातृभाषा दिवस’ कार्यक्रम आयोजित 

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संवाद के साथ हमारी संस्कृति, परम्परा और अस्मिता की आधारशिला है मातृभाषा- प्रो. व्यास,

लाडनूं के जैविभा विश्विविद्मायालय में ‘मातृभाषा दिवस’ कार्यक्रम आयोजित

 

लाडनूं (kalamkala.in)। जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय के राजस्थानी भाषा एवं साहित्य विभाग व प्राकृत एवं संस्कृत विभाग के संयुक्त तत्वावधान में ‘विश्व मातृभाषा दिवस’ के अवसर पर मातृभाषा के संरक्षण, संवर्धन और उसके व्यापक प्रचार-प्रसार के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने के उद्देश्य से एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में राजस्थानी भाषा एवं साहित्य विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. लक्ष्मीकांत व्यास ने मातृभाषा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मातृभाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, परम्परा और अस्मिता की आधारशिला है। मां, मातृभूमि और मातृभाषा व्यक्ति के जीवन की अस्मिता और संस्कृति की पोषक है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे राजस्थानी भाषा के अध्ययन-लेखन और सृजनात्मक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाएं।प्राकृत एवं संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. जिनेन्द्रकुमार जैन ने भाषा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए मातृ भाषा को व्यवहार की भाषा बताया। इस अवसर पर मंच पर उपस्थित अतिथिगण प्रो. दामोदर शास्त्री, प्रो. रेखा तिवारी, प्रो. बी.एल. जैन, डॉ. रामदेव साहू आदि ने भी अपने विचार रखे और मातृभाषा के महत्व पर विचार प्रस्तुत करते हुए वैश्वीकरण के दौर में क्षेत्रीय भाषाओं के सामने उपस्थित चुनौतियों और उनके समाधान के बारे में बताया। कार्यक्रम में विद्यार्थियों द्वारा राजस्थानी कविताओं, लोकगीतों की मनोहारी प्रस्तुति दी गई, जिन्होंने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम में बलबीर सिंह चारण, वासुदेव चारण, छात्रा लक्की आदि ने काव्य-पाठ किये। शोधार्थी मीनाक्षी राठौड़ ने पत्र-वाचन किया। स्नातक स्तर के विद्यार्थियों ने छात्रा खुशबू के नेतृत्व में ’धरती धोरां री’ गीत प्रस्तुत कर सबको मोहित किया।शोधार्थियों द्वारा मंचस्थ अतिथियों का सम्मान शाॅल ओढाकर किया। प्रारम्भ में शोधार्थी रामराज मीणा ने स्वागत भाषण प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का शुभारंभ ईर्या जैन ने मंगलाचरण प्रस्तुत कर किया। शोधार्थी महेन्द्र सिंह छायण ने कार्यक्रम संयोजन किया। अंत में डाॅ. सत्यनारायण भारद्वाज ने आभार ज्ञापित किया। इस अवसर पर शोधार्थी मनोज कुमार, मनीष मीणा, छात्र नरेश, पूनमचन्द सहित संस्थान के शिक्षक, विद्यार्थी, शोधार्थी तथा साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।

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Author: kalamkala

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