आदमी को स्वच्छंदता को छोड़ने और अनुशासन में रहने का प्रयास करना चाहिए- आचार्य महाश्रमण,
लाडनूं के सुधर्मा सभा में आचार्य श्री महाश्रमण का नियमित प्रवचन


लाडनूं (kalamkala.in)। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण ने बुधवार को सुधर्मा सभा में अपने प्रातःकालीन प्रवचन में ‘स्वच्छन्दता का निरोध करें’ विषय पर कहा कि अनुशासनबद्धता और अनुशासनहीनता, स्वच्छन्दता और नियंत्रित रहना- ये दो स्थितियां होती हैं। आदमी यह सोचता है कि मैं दूसरों के अनुशासन में क्यों रहूं। स्वानुशासी बन जाना, कषाय बहुत मंद हो जाएं, ऐसी तो बहुत उच्च स्थिति होती है। वहां तो भला दूसरों की शासन की अपेक्षा न होती हो, किन्तु सामुदायिक में अनुशासन की अपेक्षा होती है। आदमी अपनी इन्द्रियों को स्वस्थ बनाए रखने के लिए कितना-कितना उपाय करता है। आंखों की टेस्टिंग, कानों की टेस्टिंग अथवा सफाई अथवा कोई योग आदि करते हैं। सुनने के लिए कान में मशीन भी लगाई जाती है। आदमी के इन्द्रियों में दुर्बलता भी आ सकती है। सामान्य आदमी अपनी इन्द्रियों की दुर्बलता को दूर करने का प्रयास भी करता है। उन्होंने कहा कि आगम में बताया गया है कि स्वच्छन्दता का निरोध करने वाला साधु संसार का पार पा सकता है। और स्वच्छन्दता का निरोध न हो तो आदमी भवसागर में फंसा हुआ रह सकता है। इसलिए आदमी को स्वच्छन्दता को छोड़़ने और अनुशासन में रहने का प्रयास करना चाहिए। बड़ों के साए में, अनुशासन में रहने से ही कल्याण संभव हो सकता है।
विनयवान रहते हुए आगे बढ़ें
आचार्य श्री महाश्रमण ने आगे कहा कि अनुशासनहीनता, उद्दण्डता से बचने का प्रयास करना चाहिए। जो आदमी अथवा साधु अनुशासन में रहता है, शिक्षित होता है, अच्छे ढंग से ज्ञान का अर्जन करता है, उसे सफलता की प्राप्ति हो सकती है और जो अनुशासनहीन हो जाए, स्वच्छन्दता में चला जाता है, उसे विफलता प्राप्त हो सकती है। आदमी को अपने जीवन के पहले हिस्से में भी प्रमादों से बचते हुए अनुशासन में रहने का प्रयास करना चाहिए। बड़ों के साथ अनुशासित रहना, बड़ों के प्रति उचित विनय का भाव रखने वाले मुनि का सर्वांगीण विकास हो सकता है। इसलिए आदमी को विनयवान रहते हुए अपने जीवन में आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए।आचार्यश्री के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। साध्वीवृंद ने प्रज्ञागीत को प्रस्तुति दी। तदुपरान्त शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने चतुर्विध धर्मसंघ को कुछ समय तक ध्यान का प्रयोग कराया।






