ज्ञान के निरंतर अभ्यास से वस्तुओं, परिवेश और घटनाओं को व्यक्ति जान लेता है, आचार्य महाश्रमण की पुस्तक ‘संवाद भगवान से’ की समीक्षा प्रस्तुत

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ज्ञान के निरंतर अभ्यास से वस्तुओं, परिवेश और घटनाओं को व्यक्ति जान लेता है,

आचार्य महाश्रमण की पुस्तक ‘संवाद भगवान से’ की समीक्षा प्रस्तुत

लाडनूं। जैन विश्वभारती संस्थान मान्य विश्वविद्यालय के शिक्षा विभाग में संचालित पुस्तक समीक्षा कार्यक्रम में सोमवार को आचार्य महाश्रमण की पुस्तक ‘संवाद भगवान से’ के भाग दो की समीक्षा प्रस्तुत की गई। समीक्षा में प्रो. बी.एल जैन ने बताया कि आध्यात्मिक, नैतिक, चारित्रिक आदि प्रेरणादायी विषयों को इस पुस्तक में प्रश्न और उत्तर के माध्यम से गहनता से समझाने का प्रयास किया गया है। मन, वचन, काया, शांति, सद्भाव, आहार, योग, भक्ति आदि के विषय में यह पुस्तक ज्ञानेंद्रियों को पवित्र बनाने के लिए प्रेरित करती है और जीवन में आने वाली समस्याएं, चुनौती और कठिनाइयों से निजात दिलाने में सहायक है। ज्ञानेंद्रियों और त्रिरत्न से क्या मिल सकता है, इसका विवेचन करते हुए ज्ञान संपन्नता के बारे में बताया गया है कि ज्ञान से संपन्न व्यक्ति को संसार के पदार्थों का ज्ञान ठीक प्रकार से हो जाता है। ज्ञानी व्यक्ति अवधि ज्ञान, विनय,तप और चरित्र आदि जैसे विशिष्ट गुणों का खंचाजी बन जाता है।
ज्ञानी व्यक्ति भ्रमित नहीं होता
आचार्यश्री ने अपनी इस पुस्तक में ज्ञान को पवित्र वस्तु माना है। ज्ञान वही प्राप्त कर सकता है, जिसमें श्रद्धा और रुचि होती है। जिस व्यक्ति के अंदर ज्ञान प्राप्त करने के प्रति लालसा नहीं होती, वह व्यक्ति कभी भी ज्ञानी नहीं बन सकता है। ज्ञान प्राप्त करने वाला व्यक्ति परम शांति एवं आनंद को प्राप्त करता है। ज्ञानी व्यक्ति जीवन में कभी भ्रमित नहीं होता है। वह हर कार्य श्रेष्ठ ढंग से करता है। ज्ञान का निरंतर अभ्यास करने से वस्तुओं का, परिवेश का और घटनाओं को व्यक्ति जान लेता है। आचार्य महाश्रमण कहते हैं कि जिसे सम्यक दर्शन प्राप्त हो जाता है,उसे मिथ्यात्व का मोह या मिथ्यात्व का रोग दूर हो जाता है। सम्यक दर्शन प्राप्त व्यक्ति जो जैसा है, उसे वैसा ही समझता है। वह यथार्थ तत्व को जानना, पहचानना और स्वीकार करने लग जाता है।
सम्यक् दर्शन से व्यक्ति वही देखता है, जो वास्तव में होता है
सम्यक दर्शन को स्पष्ट करने के लिए एक बहुत सुंदर उदाहरण आचार्यश्री ने अपनी पुस्तक में दिया है। जैसे रंगीन चश्मे को पहनने पर व्यक्ति को दुनिया उसी प्रकार की दिखाई देगी, जिस प्रकार का वह रंगीन चश्मा होगा। यदि रंगीन चश्मा हरा होगा तो दुनिया हरी दिखाई देगी और रंगीन चश्मा पीला होगा तो पीली दिखाई देगी। लेकिन सम्यक दर्शन प्राप्त व्यक्ति को दुनिया जैसी है वैसी ही दिखाई देगी। सम्यक दर्शन प्राप्त व्यक्ति वस्तु को उसी रूप में ही देखता है जिस रूप में वह होती है। चरित्र संपन्नता मैं व्यक्ति शैलेषी भाव को प्राप्त होता है और चरित्र संपन्न व्यक्ति प्रशांत, मुक्त और सब दुखों का अंत कर लेता है। ज्ञान को प्राप्त करने के बाद उसे आचरण में लाना सम्यक चरित्र है। क्योंकि, ज्ञान का सार आचार है। चरित्र की साधना और आराधना करते हुए व्यक्ति शैलेषी भाव को प्राप्त कर लेता है। कार्यक्रम में डा. मनीष भटनागर, डॉ. विष्णु कुमार, डॉ. गिरिराज भोजक, डॉ. अमिता जैन, डॉ. आभा सिंह, डॉ. गिरधारीलाल शर्मा, खुशाल जांगिड, डॉ. सरोज रॉय, प्रमोद ओला आदि संकाय सदस्य एवं शिक्षा विभाग की बी.एड, बी.ए.-बी.एड. एवं बी.एस.सी-बी.एड. की छात्राध्यपिकाएं उपस्थित रही।
kalamkala
Author: kalamkala

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