लाडनूंः विधानसभा चुनाव- लाडनूं विधानसभा क्षेत्र में जातिगत आंकड़ों को उलझाने में लगे विभिन्न दावेदार, हकीकत से कोसों दूर, दे रहे झूठे आंकड़े भरपूर

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लाडनूंः विधानसभा चुनाव-

लाडनूं विधानसभा क्षेत्र में जातिगत आंकड़ों को उलझाने में लगे विभिन्न दावेदार,

हकीकत से कोसों दूर, दे रहे झूठे आंकड़े भरपूर

लाडनूं। विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे पास आते जा रहे हैं, यहां से अपनी किस्मत आजमाने वालों की संख्या भी बढ रही है। हालांकि कतिपय ऐसे लोगों को लाडनूं विधानसभा क्षेत्र की पूरी भौगोलिक स्थिति, गांवों से सम्पर्क के रास्ते, स्थानीय समस्याएं, आबादी के बारे में विवरण और मतदाताओं के जातिगत आंकड़े आदि की वास्तविकता से कोसों दूर लग रहे हैं। इस सबमें सबसे बड़ी उलझन जो सामने आ रही है, वह है कि हर दावेदार अपनी जाति की वोटर संख्या को बढ-चढ कर बताने का प्रयास करते हैं और इस प्रयास में वे अन्य बहुल जातियों की संख्या को घटा देते हैं। इससे इस क्षेत्र में असमंजस की स्थिति पैदा हो रही है। हालांकि पार्टियों ने अपने स्तर पर या एजेंसियों के माध्यम से वास्तविक जातिगत आकड़े हासिल कर लिए हैं, फिर भी इन दावेदारों के दावे कुछ अलग ही बयान करते हैं। संभावना है कि गलत आंकड़ों के प्रस्तुतिकरण से उनकी दावेदारी मजबूत होने के बजाए कमजोर हो रही है।

झूठ के सहारे से लगाना चाहते हैं नैया पार

इस क्षेत्र को राजपूत दावेदारों द्वारा राजपूत बाहुल्य क्षेत्र घोषित करने की चेष्टाएं की जा रही है और वे मूल ओबीसी की कुछ जातियों रावणा राजपूत, चारण आदि को भी अपने में मिला कर आंकड़ें तैयार करते हैं और फिर उसमें भी मनमाने तरीके से बढोतरी करके प्रस्तुत करते हैं। आखिर चुनाव की उम्मीद रखने वाले झूठ के सहारे से अपनी नैया पार लगाना चाहते हैं। इस प्रकार तो गाड़ी का खेंचना मुश्किल ही रहेगा। राजपूत समाज के मूल मतदाताओं को सिर्फ 10 से 12 हजार करीब ही बताया जाता हैं। लेकिन इनसे दुगुने रावणा राजपूत और चारण समाज को अपने में शामिल किया जाता है। ये मूल ओबीसी की जातियां अपना अलग अस्तित्व रखती हैं। इन्हें अपना पिछलग्गू मान लेना कत्तई उचित नहीं रहेगा।

हकीकत से बहुत दूर हैं दावेदार

लाडनूं विधानसभा क्षेत्र में अनुसूचित जाति, जाट और मुस्लिम मतदाताओं की संख्या अधिक मानी जाती है। इन तीनों जातियों के लोग भी अपनी-अपनी संख्या को मनमर्जी से बहुत अधिक बढा कर स्वयं को सर्वाधिक होने का दावा करते रहते हैं। जाट दावेदारों का कहना है कि वे सबसे ज्यादा 60 से 65 हजार की संख्या में हैं। इधी अनुसूचित जातियों के मतदाताओं की संख्या भी इसी के आसपास बताई जाने लगी है। फिर अल्पसंख्यक समुदाय की संख्या भी रहेगी और मूल ओबीसी जातियों की संख्या भी मिलानी पड़ेगी। ब्राह्मण समाज भी अपनी संख्या को बहुत अधिक मानता है। हालांकि स्वामी आदि जातियों को ब्राह्मण अपने में गिनकर चलता है, लेकिन ये सभी जातियां भी मूल ओबीसी की जातियां हैं। आखिर लाडनूं विधानसभा क्षेत्र के कुल मतदाताओं की संख्या जब 2 लाख 65 हजार से 2 लाख 70 हजार के बीच ही है, तो फिर इनके सबके दावों को जोड़ा जाए, तो संख्या इससे दुगुनी तक चली जाएगी। लगता है कि सभी दावेदार जनता को हकीकत से बहुत दूर रखना चाहते हैं।

कब तक चलेगी दावेेदारों के दावों की पोल

एक अनुमान के अनुसार अनुसूचित जातियों के वोटर्स की संख्या 52 हजार मानी जा रही है, जाट समुदाय की संख्या 50 हजार वोटर्स और मुस्लिम समुदाय की संख्या 45 हजार है। मूल ओबीसी की जातियों माली, रावणा राजपूत, सुनार, कुम्हार, नाई, जांगिड़, गुर्जर, लुहार, चारण आदि की संख्या तो सबसे अधिक मानी जाती है और यह संख्या एक लाख तक पहुच सकती है। अग्रवाल, ओसवाल, सरावगी आदि अन्य जातियों की संख्या को सभी नगण्य मान लेते हैं और उनकी कोई पृथक गिनती नहीं की जाती अथवा उन्हें भी अपने आप में समाहित कर लिया जाता है। कुछ लाग ब्राह्मण-बनिया को मिलाकर बताते हैं। राजपूत, ब्राह्मण आदि सभी मूल ओबीसी की अनेक जातियों को स्वयं में शामिल मान कर मूल ओबीसी की कुल मतदाता संख्या को घटा कर प्रस्तुत करते हैं। आखिर सबसे बड़े समुदाय का सबसे कम करके दिखाने और उसमें फूट पैदा करने की कोशिशें करके उसे राजनीतिक दृष्टि से कमजोर करने के प्रयास किए जा रहे हैं। पर हकीकत से सभी पार्टियां अवगत है और दावेदारों के दावों की पोल अधिक नहीं चल पाएगी।
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Author: kalamkala

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