राष्ट्रीय व्याख्यानमाला में जैन आगम में ज्योतिष पर व्याख्यान प्रस्तुत 

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जैनागमों में ज्योतिषीय सिद्धान्तों का अद्भुत प्रयोग- डॉ. श्रीमाल
   
लाडनूं। ‘ज्योतिषीय तत्त्व सृष्टि की उत्पत्ति के साथ ही प्राप्त होते हैं। खगोेलीय तत्त्व, ग्रह, नक्षत्र, चन्द्र, सूर्य आदि ऐसे तत्त्व हैं, जो ज्योतिष विद्या के मुख्य तत्त्व माने जाते हैं। ज्योतिष विद्या के विकास में सभी धर्मों का योगदान रहा है, उनमें से जैन धर्मशास्त्रों का भी महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। यह विचार केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय अगरतला के डॉ. मनोज श्रीमाल ने जैन विश्वभारती संस्थान के प्राकृत एवं संस्कृत विभाग द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित मासिक व्याख्यानमाला के 14वें व्याख्यान में व्यक्त किये। डॉ. श्रीमाल ने जैन आगमों के साथ ही अनेक स्वतंत्र ग्रंथों का भी उल्लेख किया, जिनमें ज्योतिषीय सिद्वान्तों का विस्तार से वर्णन हुआ है। उन्होंने ज्योतिष की परिभाषा बताते हुए कहा कि यह विद्या व्यक्ति को भूत, भविष्य के विषय में बताती है तथा उसको कर्म-प्रधान बनाने पर जोर देती है। जैन ज्योतिष का विभाजन 5 स्कन्धों में किया गया है, जिनमें ज्योतिष से सम्बन्धित सिद्धांत वर्णित हैं। ज्योतिष विद्या को उपयोगिता को बताते हुए डॉ. श्रीमाल ने कहा कि यह विद्या शिक्षा, व्यापार, रोजगार, स्वास्थ्य आदि की जानकारी उपलब्ध कराती है। यदि हमें सुख-शान्ति पूर्वक व्यवस्थित जीवन जीना है, तो हमें जैन ज्योतिष को सम्यक् रूप से समझकर उसके सिद्धान्तों की अनुपालना करनी चाहिए। उन्होंने जैन पंचांग प्रणाली को भी अति प्राचीन बताते हुए उसकी अनेक विशेषताओं का उल्लेख किया। जैन ज्योतिषीय सिद्धान्तों को नासा ने भी स्वीकार्य किया है। अध्यक्षीय वक्तव्य में विभागाध्याक्ष प्रो. दामोदर शास्त्री ने कहा कि ज्योतिषीय सिद्धान्त भगवान महावीर के जीवनकाल में भी देखने को मिलते थे। उन्होंने आज के युग में ज्योतिष शास्त्रों के सम्यक् रूप से अध्ययन-अध्यापन की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने अनेक उदाहरणों से उक्त तथ्य को सिद्ध किया। प्रारम्भ स्वागत वक्तव्य सह-आचार्या डॉ. समणी संगीतप्रज्ञा ने प्रस्तुत किया। इससे पूर्व छात्र पवित्र जैन ने मंगलाचरण करके कार्यक्रम का प्रारम्भ्ज्ञ किया। कार्यक्रम का संचालनन डॉ. सत्यनारायण भारद्वाज ने किया। व्याख्यान में देश के विभिन्न क्षेत्रों से लगभग 35 प्रतिभागियों ने सहभागिता की।

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Author: kalamkala

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