सात दिवसीय संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा का शुम्भारंभ, कलश यात्रा निकाली

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सात दिवसीय संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा का शुम्भारंभ, कलश यात्रा निकाली

मूण्डवा (रिपोर्टर लाडमोहम्मद खोखर)। मारवाड़ मूंडवा में सात दिवसीय संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा का शुम्भारंभ शुक्रवार को किया गया। भागवत कथा के प्रथम दिवस श्रीकरुणामूर्ति धाम भादवासी आश्रम के मुख्य अधिष्ठाता त्यागी संत हेतमराम महाराज ने कहा कि श्रीमद् भागवत कथा में कलश यात्रा का अर्थ है, समाज में हो रहे झगड़ों को मिटाकर एकजुट करना, सास-बहू के बीच आए राग-द्वेष को मिटाकर प्रेम का संचार करना; कलश रिद्धि-सिद्धि का प्रतीक है। इसका हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। उन्होंने कलश यात्रा का महत्व बताते हुए कहा कि कलश में भरा पवित्र जल इस बात का संकेत हैं कि हमारा मन भी जल की तरह हमेशा ही शीतल, स्वच्छ एवं निर्मल बना रहे। हमारा मन श्रद्धा, संवेदना एवं सरलता से भरे रहें। यह क्रोध, लोभ, मोह-माया, ईष्या और घृणा आदि कुत्सित भावनाओं से हमेशा दूर रखता है। त्यागी संत ने कहा कि श्रीमद् भागवत कथा श्रवण करने से जीवन में भगवान की भक्ति जाग्रत हो जाती है। संसार में चारों ओर मोह माया व्याप्त है, जिसमें मानव फंस कर अपने अमूल्य जीवन को नष्ट कर रहा है। जबकि मनुष्य का शरीर अनेक जन्मों के पुण्यों के फल से प्राप्त हुआ है, जिसका उद्देश्य संसार में परमात्म-चरणों के आश्रय में सदाचारी बन जीवन यापन करके मोक्ष प्राप्ति होना चाहिए।

मन की स्वच्छता के लिए जरूरी है कथा का श्रवण

त्यागी संत ने श्रीमद्भागवत कथा श्रवण के महत्व को समझाया तथा कलयुग में भगवान के नाम सुमिरन के बारे में बताया। उन्होंने कथा में कहा कि हमारा मन दर्पण के समान है, जिस प्रकार दर्पण गंदा हो जाता है तो उसको हम कपड़े से बार-बार साफ करते हैं, उसी प्रकार से हमारा मन जब विकार युक्त हो जाता है तो कथा के माध्यम से, सत्संग के माध्यम से निरंतर भगवान के नाम का सुमिरन करते हुए मन को निर्मल किया जाता है। मनुष्य को अपने जीवन में एक बार आवश्यक रूप से भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए, क्योंकि इस कलयुग में भागवत कथा ही है, जो मनुष्य को मोक्ष दिलाती है।
त्यागी संत ने कहा कि हमारे भारत की धरा बहुत ही पुण्यशाली भूमि है। इस भूमि पर जन्म लेने के लिए देवता भी तरसते हैं। उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति व सभ्यता संसार में सर्व श्रेष्ठ है। इसे जीवन मे अपनाए। भगवान के प्रति अटूट श्रद्धा बनाए रखें। ईश्वर की कृपा के बगैर संसार मे कुछ नहीं होता हैं। कथा की सार्थकता तभी सिद्ध होती हैं, जब इसे हम अपने जीवन के व्यवहार में धारण कर निरंतर हरि स्मरण करते हुए अपने जीवन में आत्मसात करें।

ज्ञान होने पर ही मिलती है सांसारिक वासनाओं से मुक्ति

त्यागी संत ने श्री सुखदेव जी के जन्म प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि गुरू जिस धरा पर अवतरित होते है वहां परमआनंद होता है, वहां के सब तामसिक दोष समाप्त हो जाते हैं, जिस जगह गुरू वास करते हैं उस जगह देवी-देवता पुष्प-वर्षा करते हैं। जो व्यक्ति गुरू की सेवा पूजा करता है, उस पर आने वाली सभी प्रकार की विपदाओं को गुरू हर लेते है। गुरू के चरणों में स्वर्ग होता है, जहां गुरूदेव विचरण करते है, उस जगह वास करने से तामसिकता का दमन होता है। त्यागी संत ने व्यास-नारद संवाद में कहा कि अगर दु:खों से छुटकारा पाना चाहते हो तो अपने जीवन में श्रीमद् भागवत के शब्दों को धारण करना होगा। इससे दु:ख मनुष्य के पास भी नहीं आएंगें। आज के समय में मनुष्य मोह माया में फंसा हुआ है। जब तक इंसान को ज्ञान नहीं हो जाता तब तक उसको सांसारिक वासनाओं से मुक्ति नहीं मिलेगी। भक्ति ही मनुष्य जीवन का अधार है। ईश्वर की प्राप्ति के लिए मानव को परमात्मा की भक्ति करनी पड़ेगी।

भव्य कलश यात्रा निकाली

इससे पूर्व श्रृंगारित महिलाओं ने सिर पर जल का कलश धारण कर कलश-यात्रा निकाली। पंडित मुकेश दाधीच ने वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ श्रीमद् भागवत कथा का शुम्भारम्भ करवाया।
कथा वाचन के दौरान बीच-बीच में भजनों की मधुर स्वर लहरियों पर श्रोता झूमने लगे। इस अवसर पर रमाकांत शर्मा, श्यामसुंदर कंदोई, महेंद्र तिवारी, कमल शर्मा, दिनेश प्रजापत, हरिओम तिवारी, गिरिराज, पवन भट्टड़, श्रीगोपाल सारड़ा, सुरेश राठी, अभिषेक सारड़ा, निर्मल सारड़ा, अभिषेक राठी, पवन भट्टड़, रामानुज बंग, रामकिशोर भट्टड़, प्रकाश कंदोई, महेंद्र तिवारी, कमल शर्मा, गोविंद बाहेती, दीपक कदोई व समाज के व्यक्ति तथा कथा में श्रद्धालु महिलाएं तथा पुरुष बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

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Author: kalamkala

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