आत्मबल के बिना अहिंसा को नहीं अपनाया जा सकता- अजय असवाल (निदेशक, शांति एवं अहिंसा विभाग राजस्थान सरकार)
लाडनूं के जैविभा विश्वविद्यालय में राजस्थान सरकार के संयुक्त तत्वावधान में मनाया अन्तर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस



लाडनूं (kalamkala.in)। राजस्थान सरकार के शांति एवं अहिंसा विभाग एवं जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में अन्तर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस एवं गांधी जयंती के उपलक्ष में गुरूवार को यहां विश्वविद्यालय स्थित आॅडिटोरियम में ‘अहिंसाः नई सोच, नया समाज’ विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में राज्य सरकार के शांति एवं अहिंसा विभाग के निदेशक अजय असवाल ने कहा कि भारतीय परम्परा में शांति और अहिंसा को शुरू से ही पूरा महत्व दिया जाता रहा है। यहां महावीर एवं बुद्ध ने अहिंसा का संदेश दिया था। महाव्रतों के रूप में लागू की गई यह अंिहंसा बाद में सबके लिए लागू करने के लिए अणुव्रतों में भी परिवर्तित की गई। बौद्ध एवं हिंदू धर्मों में आत्मा का स्वाभाविक धर्म ही अहिंसा को माना गया है। महात्मा गांधी द्वारा प्रचलित अहिंसा को मार्टिन लूथर किंग और नेल्सन मंडेला आदि सभी ने अपनाया। अहिंसा को विश्व के अनेक देशों में फैलाया गया। दुनिया में भारत को आज भी महात्मा गांधी का देश कहा जाता है। उन्होंने इस अवसर पर प्रशासन द्वारा अपनाए जा सकने वाले अहिंसा के छोटे-छोटे प्रयोग भी समझाए। साथ ही उन्होंने कहा कि अहिंसा को अपनाने के लिए व्यक्ति में प्रचुर आत्मबल होना आवश्यक है। असवाल ने सोशल मीडिया पर भी अहिंसा का उपयोग करने एवं एआई केे नवाचारों में भी अहिंसा के महत्व को समझाया।
शांति एवं अहिंसा होती है प्रगतिशीलता में सहायक
राजस्थान प्रशासनिक सेवा की अधिकारी एवं शांति एवं अहिंसा निदेशालय की उपनिदेशक श्रीमती मधु रघुवंशी ने संगोष्ठी में अपने विचार रखते हुए कहा कि मनुष्य शांति एवं अहिंसा के विचारों से ही प्रगतिशील बन सकता है। उन्होंने शांति एवं अहिंसा निदेशालय की स्थापना, उद्देश्य, कार्यक्रमों आदि की जानकारी दी और कहा कि महात्मा गांधी के अहिंसा एवं शांति के विचारों की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। अहिंसा एवं शांति के विचारों से ही राष्ट्र का निर्माण संभव है। विश्वविद्यालय के अहिंसा एवं शांति विभाग की विभागाध्यक्ष वंदना कुंडलिया ने कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए बताया कि जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय अहिंसा को जीवन में उतारने की प्रयोगशाला है। पिछले तीन दशकों से यहां शांति एवं अहिंसा को जीवन में उतारने के लिए अनवरत कार्य किया जा रहा है। अहिंसा प्रशिक्षण के माध्यम से समाज में इसके लिए नई संभावनाएं तलाशी जा रही है। उन्होंने अहिंसा के विचार को व्यवहार में बदलने और व्यवहार को संस्कार में बदलने की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही उन्होंने प्रशासन, समाज ओर शिक्षा में तालमेल द्वारा अहिंसा की सोच को नये समाज की रचना में आवश्यक बताया।
सविता राठी व दुर्गादल समिति का किया गया सम्मान
इस अवसर पर जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय की ओर से शांति एवं अहिंसा तथा इनसे जुड़े हुए क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले दो व्यक्तियोें को सम्मानित करने की परम्परा को शुरू किया गया। इस वर्ष यह सम्मान पर्यावरण, पंचायत राज और महिला सशक्तिकरण क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य किए जाने के लिए सुजानगढ तहसील के गोपालपुरा ग्राम पंचायत की प्रशासक एवं पूर्व सरपंच सविता राठी को एवं लाडनूं में पर्यावरण एवं सामाजिक क्षेत्र में सेवाकार्यों के लिए दुर्गादल सेवा समिति को ‘प्रकृति मित्र सम्मान’ प्रदान किया गया। यह सम्मान समिति के अध्यक्ष मनीष शर्मा एडवोकेट एवं समिति के अन्य सदस्यों को प्रदान किया गया। संगोष्ठी में सविता राठी ने अपने सम्बोधन में सरपंच रहते हुए किए गए कार्यों के बारे में बताया तथा कहा कि महात्मा गांधी एक व्यक्ति नहीं विचार थे। आज 167 देशों में महात्मा गांधी को पढाया जा रहा है। दुर्गादल सेवा समिति के हर्षवध्रन चारण ने भी दुर्गादल द्वारा किए गए कार्यों की जानकारी दी।
अहिंसा जीवन के हर पहलु के लिए उपयोगी
शिक्षा विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. बीएल जैन ने संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए अपने सम्बोधन में जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय के अहिंसा एवं शांति क्षेत्र में एक पृथक व स्वतंत्र विभाग की स्थापना किए जाने, इस सम्बंध में पाठ्यक्रमों एवं प्रशिक्षण कार्यक्रमों के संचालन, पुस्तकों के प्रकाशन, विभिन्न पैटेंट प्राप्त किए जाने आदि की पूरी जानकारी दी। विश्वविद्यालय के कुलसचिव देबाशीष गोस्वामी ने स्वागत वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए कहा कि अहिंसा को केवल राजनीति के लिए प्रयोग समझना ठीक नहीं है। अहिंसा सम्पूर्ण जीवन के हर पहलु के लिए आवश्यक तत्व है। उन्होंने महात्मा गांधी की अहिंसा के साथ गौतम बुद्ध और भगवान महावीर की अहिंसा को भी समझाया। कार्यक्रम की संचालिका डाॅ. लिपि जैन ने संगोष्ठी में अपने विचार रखते हुए महात्मा गांधी के जीवन पर प्रकाश डाला तथा कहा कि अहिंसा केवल राजनीति का साधन ही नहीं, यह जीवन का आध्यार भी है। कार्यक्रम का प्रारम्भ मीनल द्वारा प्रस्तुत वंदे मातरम संगान के साथ किया गया। सभी अतिथियों का स्वागत कुलसचिव देबाशीष गोस्वामी, प्रो. बीएल जैन, वंदना कुंडलिया, प्रो. लक्ष्मीकांत व्यास, डाॅ रविन्द्र सिंह राठौड़, प्रो. युवराज सिंह खंगारोत, डाॅ. लिपि जैन, दीपाराम खोजा आदि ने पुष्पगुच्छ भेंट कर, शाॅल ओढा कर एवं स्मृति चिह्न प्रदान कर किया। अंत में डाॅ. बलबीर सिंह चारण ने आभार ज्ञापित किया। कार्यक्रम में सभी विभागों के संकाय सदस्य एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।



