बंद हो अब महिलाओं के नाम पर राजनीति करना, खो रहा है आरक्षण का असली उद्देश्य,
लोकतंत्र में ‘छाया-सत्ता’ का अंत जरूरी: महिलाएं बनीं मोहरें, समस्त अधिकार पतियों के हाथों में,
लोकतंत्र ही नहीं महिला अधिकारों का हो रहा खुला हनन, ‘सरपंच पति, पार्षद पति और चेयरमैन पति’ तक के हस्तक्षेप पर लगे सक्षम लगाम
(वरिष्ठ पत्रकार श्याम सुंदर दाधीच कुचेरा की कलम से)
भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में महिलाओं की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई थी। उद्देश्य था कि आधी आबादी नेतृत्व संभाले और नीति-निर्धारण में अपनी भूमिका निभाए। लेकिन, आज यह व्यवस्था एक गंभीर विकृति का शिकार हो गई है। पंचायतों में ‘सरपंच पति’ और नगर निकायों में ‘पार्षद पति’ के साथ-साथ अब ‘चेयरमैन पति’ जैसे असंवैधानिक पदों ने जन्म ले लिया है, जो लोकतंत्र और महिला अधिकारों पर सीधा प्रहार है।
यह कैसा आरक्षण है, कुर्सी महिला की, हुकूमत पति की
सरकार ने महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए सीटें आरक्षित कीं, लेकिन धरातल पर निर्वाचित महिला प्रतिनिधि अक्सर केवल कागजों और नाम पट्टिकाओं तक सीमित रह गई हैं। नगर निकायों में चेयरमैन पति और पंचायतों में सरपंच पति न केवल प्रशासनिक कार्यों में दखल देते हैं, बल्कि आधिकारिक निर्णयों में भी अपनी मर्जी चलाते हैं। यह प्रथा महिलाओं को केवल एक ‘नाममात्र का प्रतिनिधि’ बनाकर उन्हें पुरुषों की कठपुतली में तब्दील कर रही है।
बैठकों में पतियों के प्रवेश पर लगे तुरंत रोक
सरकार और प्रशासन को अब इस ‘छाया सत्ता’ पर कड़ा प्रहार करने की आवश्यकता है। पंचायतों और नगर निकायों की आधिकारिक बैठकों में महिला प्रतिनिधियों के स्थान पर उनके पतियों या पुरुष रिश्तेदारों के भाग लेने पर तुरंत और पूर्णतः रोक लगनी चाहिए। यह विडंबना ही है कि जनता द्वारा चुनी गई महिला प्रतिनिधि के बजाय उनके पति बैठकों की अध्यक्षता करते और कर्मचारियों को निर्देशित करते नजर आते हैं। प्रशासन को ऐसी बैठकों को तुरंत अवैध घोषित करना चाहिए और संबंधित प्रतिनिधि के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान करना चाहिए।
सरकार से अपील, बंद को पूरा पति-तंत्र का हस्तक्षेप
महिलाओं को घर की चारदीवारी तक सीमित रखकर उनके नाम पर राजनीति करना अब बंद होना चाहिए। आरक्षण का असली उद्देश्य महिलाओं को निर्णय लेने का अधिकार देना था। जब तक चेयरमैन पति और सरपंच पति जैसे अनौपचारिक पद सक्रिय रहेंगे, तब तक महिला सशक्तिकरण के दावे केवल कागजी ही रहेंगे। सरकार को ऐसे सख्त नियम बनाने होंगे, जिससे निर्वाचित महिला की वास्तविक उपस्थिति अनिवार्य हो और ‘पति तंत्र’ का हस्तक्षेप पूरी तरह समाप्त हो।
लोकतंत्र की गरिमा तभी सुरक्षित रहेगी जब चुनी हुई महिला प्रतिनिधि के हाथ में वास्तव में सत्ता की कलम और निर्णय लेने का साहस होगा।
-श्याम सुंदर दाधीच कुचेरा (वरिष्ठ पत्रकार)


