हर आदमी अहंकार व प्रदर्शन से बचने का प्रयास करे- आचार्यश्री महाश्रमण, सुधर्मा सभा में नियमित प्रातःकालीन प्रवचन की प्रस्तुति

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हर आदमी अहंकार व प्रदर्शन से बचने का प्रयास करे- आचार्यश्री महाश्रमण,

सुधर्मा सभा में नियमित प्रातःकालीन प्रवचन की प्रस्तुति

लाडनूं (kalamkala.in)। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के अधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण ने जैन विश्व भारती स्थित सुधर्मा सभा में अपने नियमित प्रातःकालीन मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के दौरान श्रद्धालुओं को उपदेश देते हुए कहा कि, जैन दर्शन में मोक्ष की बात नव तत्त्वों में भी मिलती है। साधना की अंतिम निष्पत्ति भी मोक्ष के रूप में होती है। मोक्षावस्था में आठ कर्मों में से कोई भी कर्म विद्यमान नहीं रहता है। मोक्ष के जीव को न तो शरीर होता है और न ही मन होता है और न ही उनके वाणी होती है। ज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम से ज्ञान की प्राप्ति होती है। ज्ञान की विशेष प्राप्ति भी अहंकार का निमित्त बन सकती है। ज्ञान व विद्वता होने पर भी मौन रखना, बहुत अच्छी बात होती है। दिखावे के लिए ज्ञान का प्रदर्शन करना अहंकार की बात होती है। ज्ञान होने पर भी मौन रख लेना, बहुत महत्ता की बात हो सकती है। इसी प्रकार शक्ति, बल होने के बाद भी आदमी को क्षमा भाव रखना, शक्ति होने पर भी सहिष्णुता रखना बड़प्पन की बात होती है।

गुप्त दान होता है महापुण्य का काम 

आचार्य श्री महाश्रमण ने अपने प्रभावी प्रवचन में कहा कि दान न करने पर भी श्लाघा/ख्याति की आशा नहीं रखना। गुप्त तरीके से दान देना बहुत बड़ा पुण्य है। दान देने में भी नाम की भावना नहीं हो तो भी बहुत अच्छी बात हो सकती है। गुप्तदान को महापुण्य की भांति बताया गया है। आदमी को अपने चेहरे की सुन्दरता का भी अहंकार नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार तपस्या आदि का भी अहंकार नहीं करना चाहिए। तपस्या तो आदमी आत्मा के कल्याण के लिए करता है, इसलिए तपस्या का अहंकार भी नहीं होना चाहिए। इसी प्रकार लाभ, आदि-आदि विभिन्न चीजों का भी आदमी को अहंकार नहीं होना चाहिए। अहंकार व प्रदर्शन से बचने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को जहां तक संभव हो सके, आदमी को अहंकार से बचने का प्रयास करना चाहिए।इसलिए शास्त्र में कहा गया कि मति, बुद्धि और ऋद्धि का गर्व मोक्ष प्राप्ति में बाधक है। फालतु चुगलखोरी करना बाधक और बुरी बात भी है। किसी भी काम में सफलता पाने के लिए परिश्रम एकमात्र सूत्र है। आदमी को परिश्रमशील होना चाहिए। जितना हो सके, परिश्रमशीलता की भावना बनी रहे। जहां तक संभव को अपना काम स्वयं से कर लेने का प्रयास करना चाहिए। दूसरों के ऊपर कोई काम नहीं छोड़ना, स्वयं को परिश्रमशील बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। जिसका जो भी कर्त्तव्य है, जिसकी जो ड्यूटी है, उसे उसके प्रति जागरूकता रखने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार मोक्ष प्राप्ति की बाधाओं को पार कर आदमी को मोक्ष की दिशा में गति करने का प्रयास करना चाहिए।

मुनियों और साध्वियों की प्रस्तुतियां 

आचार्य श्री महाश्रमण के समक्ष चारित्रात्माओं ने भी प्रवचनोपरांत अपनी प्रस्तुतियां दी। साध्वीश्री सुप्रभा व साध्वीश्री प्रमिला कुमार के सिंघाड़ा ने संयुक्त रूप से तथा साध्वीश्री प्रज्ञावती, साध्वीश्री शशिरेखा व साध्वी रचनाश्री के सिंघाड़े ने पृथक्-पृथक् गीतों का संगान कर आचार्यश्री की अभ्यर्थना की। मुनिश्री सुमतिकुमार व मुनि पृथ्वीराज (जसोल) ने भी अपने हृदयोद्गार व्यक्त करते हुए आचार्यश्री महाश्रमण की अभ्यर्थना की।

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Author: kalamkala

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