नौ करोड़ राजस्थानियों की अस्मिता की प्रतीक राजस्थानी भाषा को अविलंब मिले संवैधानिक मान्यता- राजेश विद्रोही,
उर्दू के ख्यातनाम शायर का खुला विद्रोह, अब केवल और केवल लिखेंगे राजस्थानी में, अद्भुत संकल्प-शीघ्र मिले मान्यता
लाडनूं (kalamkala.in)। राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने की ललक ने यहां के एक प्रतिष्ठित शायर को ग़ज़लों और मुशायरों से बाहर निकाल कर राजस्थानी कुछ तरफ इतना आकर्षित किया कि उन्होंने संकल्प ले लिया कि वे अब उर्दू या हिंदी की बजाय अपनी कलम केवल राजस्थानी भाषा साहित्य सृजित करने में ही चलाएंगे। यह अद्भुत निर्णय निश्चित रूप से राजस्थानी को मजबूत आधार प्रदान करता है और मान्यता की दिशा में भी ‘ठाडा’ साबित होगा। यह संकल्प लेने वाले उर्दू और हिंदी के विख्यात ग़ज़लकार राजेश विद्रोही हैं। इनका संकल्प कि वे राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता मिलने तक केवल और केवल राजस्थानी भाषा में ही लिखेंगे।
विद्रोही ने किया मान्यता के लिए विद्रोह
भारतीय डाक विभाग में पोस्ट-मास्टर के पद से सेवानिवृत्त विद्रोही ने राजस्थान के तमाम कवियों-लेखकों से भी अपील की है कि वे भी इस पहल में भागीदार बनें ताकि राज्य सरकार और केंद्र सरकार तक यह सकारात्मक सन्देश पहुंचाया जा सके। ‘विद्रोही’ ने बताया कि राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने से ही राजस्थान की संस्कृति, साहित्य और इतिहास की रक्षा हो सकेगी। इसलिए, सरकार को नौ करोड़ राजस्थानियों की अस्मिता की प्रतीक राजस्थानी भाषा को अविलंब संवैधानिक मान्यता देनी चाहिए।
कवि ‘विद्रोही’ का रचना-संसार
उल्लेखनीय है कि ‘विद्रोही’ पिछले पैंतालीस सालों से हिन्दी और उर्दू में कविताएं और ग़ज़लें लिखते रहे हैं।उन्होंने अब तक राजस्थानी में नहीं के बराबर लिखा है, लेकिन अब उनकी लेखनी केवल और केवल राजस्थानी में ही चलेगी, इसके लिए उन्होंने प्रण लिया है। उल्लेखनीय है कि विद्रोही अब तक एक कविता संग्रह, दो ग़ज़ल संग्रह, एक संस्मरण संग्रह, एक मुक्तक संग्रह और ‘महाभारत बनाम आज का भारत’ शीर्षक से एक विशिष्ट मुक्तक संग्रह लिख चुके हैं। इसके अलावा इन्होंने दुष्यन्त कुमार के प्रसिद्ध ग़ज़ल संग्रह ‘साये में धूप’ तथा मशहूर शायर राजेश रेड्डी के ग़ज़ल संग्रह ‘उड़ान’का राजस्थानी भाषा में अनुवाद भी किया है। उनकी लेखनी उर्दू व हिंदी में उच्च स्तर की रही है तो अब राजस्थानी में भी इनका सृजन उच्च स्तर को कायम रखे हुए हैं। इनकी हाल ही की एक राजस्थानी रचना ‘मायड़ री महमां’ पाठकों के अवलोकनार्थ प्रस्तुत है-
मायड़ री महमां
कवि -राजेश विद्रोही
मातभोम री घणमोली,
बोली रो सुजस सुणांवांला।
इणरै वैधानिक दर्ज़े रै,
हक़ में अलख जगांवांला।।
मायड़ रो मान बधांवांला,
नितका जयगान गुंजांवांला।
म्हे नौ करोड़ राजस्थानी,
निज भाषा नैं अपणांवांला।।
तुतला के जीं में बोल्या हा,
बीं रो ऐसान चुकै कोनी।
अणमोलो हेत दियो जामण,
बो हेत कियां बिसरांवांला।।
हरदम मन में हरखांवांला,
मायड़ री महमां गांवांला।
पग-पग आभार जतांवांला,
श्रद्धा स्यूं शीश झुकांवांला।।
बरजो मत सेवा करतां नैं,
थे भी मायड़ रा मोभी हो।
हरजो तो कोनी पण, दरजै रो करजो कियां चुकावांला।।
जद ज़रा-ज़रा सी भासावां ,
ईं अनुसूची में सामिल है।
तो आपां नौ करोड़ नालायक मूंडो कठै दिखांवांला।।
आपां सगळां रै हिवड़ै री, अंतिम आसा है आ भासा।
अब ईं ने एकठ हू’र आठवीं अनुसूची में ल्यांवांला।।
जे मां को मान बढांवांला,
अणगिण आसीसां पांवांला।
थोड़ो भी क्यूं करज्यांवांला,
तो फूल्या नहीं समांवांला।।
जो भी करणूं है बो करल्यो,
आख़िर तो सै नैं मरणूं है।
लेकर के फेर जलम दूजो,
ओज्यूं जाणैं कद आंवांला।।





