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जैनागमों में निहित है पर्यावरण-संरक्षण के सूत्र – डॉ. पाटिल, प्राकृत साहित्य में पर्यावरण पर व्याख्यान आयोजित

जैनागमों में निहित है पर्यावरण-संरक्षण के सूत्र – डॉ. पाटिल,

प्राकृत साहित्य में पर्यावरण पर व्याख्यान आयोजित

लाडनूं। ‘प्राकृत साहित्य के आधारभूत जैन आगमों में पर्यावरण संरक्षण के अनेक सूत्र निहित हंै। आचारांगसूत्र में वर्णित षड़जीवनीकाय का वर्णन इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। आगमों में अनेक स्थानों पर वायुप्रदूषण, ध्वनिप्रदूषण, जलप्रदूषण आदि को रोकने का विधान बताया गया है।’ यह विचार जैन विश्वभारती संस्थान के प्राकृत एवं संस्कृत विभाग के द्वारा ‘भारत का गौरव: प्राकृत भाषा एवं साहित्य’ विषयक मासिक व्याख्यामाला के अन्तर्गत आयोजित 21वें व्याख्यान ‘प्राकृत साहित्य में पर्यावरण’ विषयक व्याख्यान में शिवाजी विश्वविद्यालय, कोल्हापुर के सह-आचार्य रायगौण्डा तातोबा पाटिल ने प्रकट किये। उन्होंने प्राकृत भाषा में लिखित अभिलेखों का भी उल्लेख करते हुए बताया कि अशोक ने पर्यावरण संरक्षण के लिए वृक्ष लगवाये तथा सभी को वृक्ष लगाने के निर्देश दिये। पशुओं को खाने पर पाबन्दी लगाई। इस प्रकार उन्होंने आगमों, अभिलेखों तथा स्वतन्त्र प्राकृत साहित्य से अनेक उद्धरणों के माध्यम से पर्यावरणीय चिंतन को प्रस्तुत किया। डॉ. पाटिल ने पर्यावरण प्रदूषण का कारण हमारे मन के अनियन्त्रण को बताया। यदि हम हमारे मन पर नियन्त्रण करें तो पर्यावरण को बचाया जा सकता है और मन पर नियन्त्रण के अनेक उपाय जैन आगमों एवं प्राकृत साहित्य में वर्णित है। व्याखान में अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रो. दामोदर शास्त्री ने कहा कि आगमों में वर्णित सूत्र पर्यायवरणीय चिन्तन का अतिसूक्ष्म वर्णन करते हैं। मनुष्य सभी जीवों के प्रति मैत्री भाव रखे। सभी जीवों को आत्मवत् समझे आदि अनेक सूत्रों के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का उल्लेख मिलता है। हमारा इतिहास पर्यावरण की सुरक्षा पर आधारित है। प्रो. शास्त्री ने लौकिक प्राकृत साहित्य के भी अनेक उदाहरणों के माध्यम से पर्यावरणीय चिन्तन को प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का शुभारंभ प्राकृत की अध्येता बहनों के मंगलाचरण से हुआ। स्वागत एवं विषयप्रवर्तन डॉ. समणी संगीतप्रजा ने किया। कार्यक्रम का संयोजन डॉ. सत्यनारायण भारद्वाज ने किया। अंत में धन्यवाद ज्ञापन डाॅ. सब्यसाची सारंगी ने किया। व्याख्यान में देश के विभिन्न क्षेत्रों से 25 प्रतिभागियों ने सहभागिता की।

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Author: kalamkala

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