साधना के महापर्व पर्युषण का मंगल शुभारम्भ, प्रथम दिन ‘खाद्य संयम दिवस’ के रूप में समायोजित
छापर (चूरू)। तेरापंथ धर्मसंघ के अष्टमाचार्य कालूगणी की जन्मधरा छापर में तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ आध्यात्म की साधना के महापर्व पर्युषण का शुभारम्भ हुआ। जैन धर्म में आध्यात्मिक साधना के महापर्व पर्युषण का शुभारम्भ हो रहा था। संवत्सरी और क्षमापना दिवस सहित कुल नौ दिनों तक चलने वाले इस महापर्व को मानाने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु पूज्य सन्निधि में उपस्थित हो चुके हैं। आचार्यश्री के मंचासीन होने और मंगल महामंत्रोच्चार के पश्चात् मुमुक्षु बहनों ने गीत का संगान किया। साध्वी मुकुलयशा ने ‘खाद्य संयम दिवस’ के संदर्भ में गीत-संगान किया।
चातुर्मास काल धर्माराधना के लिय विशेष अवसर

साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभा ने ‘पर्युषण महापर्व’ व ‘खाद्य संयम दिवस’ के महत्त्व को व्याख्यायित किया। तदुपरान्त महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण ने कहा कि वर्ष के दो विभाग होते हैं-चातुर्मासकाल और शेषकाल। चतुर्मासकाल धर्म-आराधना के लिए विशेष होता है। यों तो आदमी प्रतिदिन धर्माराधना करता है, किन्तु सामूहिक और समयानुकूल धर्माराधना का यह विशेष अवसर होता है। कितनी-कितनी तपस्याएं होती हैं। इन चार महीनों में भी श्रावण और भाद्रव तो धर्माराधना की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होते हैं और उनमें भी भाद्रव महीना तो जैन परंपरा के लिए मानों शिमौर महीना होता है। इसी महीने में पर्युषण महापर्व का प्रारम्भ होता है। आज यहां ही नहीं, देश भर में जगह-जगह साधु-साध्वियों, समणियों द्वारा पर्युषण की आराधना आरम्भ हो गई होगी।
खाद्य संयम रखा जाना आवश्यक
पर्वाधिराज पर्युषण के शुभारम्भ पर आराधना में चारित्रात्माओं का ही नहीं, श्रावक-श्राविकाओं का भी विशेष सहभाग होता है। धर्माराधना का पुष्ट कार्य है आत्मवाद। शाश्वत आत्मवाद पर ही अध्यात्मवाद टिका हुआ है। आज का दिन खाद्य संयम दिवस के रूप में समायोज्य है। उपवास करना तो अच्छी बात होती है, किन्तु भोजन करने के दौरान भी संयम रखने का प्रयास होना चाहिए। दो प्रकार के भोजन होते हैं- साधनानुुकूल भोजन और स्वास्थ्यानुकूल भोजन। भोजन ऐसा हो जो कार्य में बाधा नहीं, सहायक बने। अपने-अपने शरीर के अनुसार भोजन करने का प्रयास हो। आदमी को हितकर भोजन पर ध्यान देने का प्रयास करना चाहिए। खाने में जल्दीबाजी न हो और चबा-चबाकर भोजन हो तो भोजन का संयम हो सकता है। भोजन के अर्जन और विसर्जन का समय निर्धारित हो तो स्वास्थ्य अच्छा रह सकता है। खाद्य संयम की प्राणशक्ति है अनासक्ति। अनासक्ति के साथ और स्वास्थ्य के अनुकूल भोजन हो तो अच्छा रह सकता है। आचार्यश्री ने बालमुनियों को उत्प्रेरित करते हुए उनसे भोजन के संदर्भ में अनेक प्रश्न किए और उन्हें उचित समाधान भी प्रदान किए।
पर्युषण के दौरान आध्यात्मिक कार्यक्रम
पर्युषण महापर्व की आराधना के अवसर पर सूर्याेदय से लेकर देर रात तक चरणबद्ध रूप में विभिन्न आध्यात्मिक आयोजित किए गए। इनमें प्रातः 4.50 बजे से अर्हत् स्तुति-वंदना, बृहत् मंगलपाठ आदि, प्रातः 6.20 से 7.10 बजे तक प्रेक्षाध्यान, प्रातः 8.00 बजे से 8.30 बजे तक तात्त्विक विश्लेषण (25 बोल आधारित), 8.30 से 8.55 तक आगम स्वाध्याय (उत्तराध्ययन), 9 बजे से 11 बजे तक मुख्य प्रवचन कार्यक्रम, 11.10 से 11.40 तक कायोत्सर्ग (बैठे-बैठे), 1.30 से 2 बजे तक जप प्रयोग (नमस्कार महामंत्र), दोपहर 2 बजे से 2.45 बजे तक आगम (आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में), 3 बजे से 3.30 बजे तक अनुप्रेक्षा (मैत्री, अभय, सहिष्णुता), 3.30 से 4.15 तक आध्यात्मिक संबोध, 6.40 से 9 बजे तक गुरुवंदना, प्रतिक्रमण, अर्हत्वंदना रात्रि सत्संग कार्यक्रम-इतिहास आदि हैं। इसी प्रकार इन आठ दिनों तक श्रद्धालु अध्यात्म के महासागर में डुबकी लगाते रहेंगे।







