निष्काम कर्म से आसक्ति व अहंकार का शमन होता है- प्रो. त्रिपाठी

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शांति व सुखद जीवन का आधार गीता दर्शन’ पर व्याख्यान प्रस्तुत
लाडनूं। जैन विश्वभारती संस्थान के आचार्य कालू कन्या महाविद्यालय में आयोजित आंतरिक व्याख्यानमाला का शुभारम्भ करते हुए प्राचार्य प्रो. आनन्द प्रकाश त्रिपाठी ने प्रथम व्याख्यान के रूप में ‘शांति व सुखद जीवन का आधार गीता दर्शन’ पर अपने व्याख्यान में बताया कि गीता केवल ईश्वर, ज्ञान, भक्ति, कर्मयोग आदि के बारे में ही बात नहीं करती, बल्कि गीता व्यक्ति के जीवन को शांत व सुखद बनाने पर भी जोर देती है। 18 अध्यायों में विभक्त इस प्राचीन ग्रंथ में सभी शास्त्रों का समावेश है। यह समस्त उपनिषदों का निचोड़ है। उन्होंने बताया कि आज चार्वाक दर्शन के अनुरूप भौतिक सुखो की पूर्ति पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। लेकिन गीता भौतिक सुखों को क्षणिक सुख मात्र ही मानती है। इस ऐन्द्रिक सुख से शांति नहीं मिलती, अपितु यह विनाश की ओर ले जाता है। ऐन्द्रिक सुख के लिए जितनी भी वस्तुओं को एकत्र करते हैं, उनमें कष्ट सहने पड़ते हैं और उनसे कामनाएं शांत भी नहीं होती। इच्छाओं की पूत्रि नहीं उनका शमन होना चाहिए। इच्छाओं पर नियंत्रण से शांति मिलती है। चित को स्थिर रखने के लिए इन्द्रिय निग्रह जरूरी है। विषयों में आसक्ति होने पर मोह, क्रोध, लोभ, बुद्धिनाश व पूर्ण विनाश होने की तरफ व्यक्ति बढता है।
कामनाओं से निस्पृह रहना चाहिए
उन्होंने कहा कि गीता कर्म का उपदेश अवश्य देती है, लेकिन सकाम कर्म का नहीं, बल्कि निष्काम कर्म पर जोर देती है। कर्म कामना रहित होने की बात करती है। कर्म के फल के प्रति आसक्ति का त्याग होना चाहिए। निष्काम कर्म में अहंकार उत्पन्न नहीं होता। शांत व सुखद जीवन के लिए समता का भाव भी जरूरी है। दुःख आनेपर उद्विग्न नहीं होने कर सलाह कृष्ण देते हैं। प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि जब तक चाहत रहती है, सुखानुभूति नहीं होती। राग, द्वेष और भय के चलते व्यक्ति सुखी नहीं बन सकता। हर परिस्थिति में सम रहने पर ही समता व शांति मिलती है। सब कामनाओं को छोड़ कर निस्पृह होना चाहिए। उन्होंने गीता और चार्वाक के दर्शनों की तुलना करते हुए ईश्वर आत्मा, मोक्ष, पुनर्जन्म आदि बिन्दुओं के बारे में विस्तार से बताया और कहा कि आत्मा की नित्यता और पुनर्जन्म की अवधारणा व्यक्ति को सद्मार्ग पर चलाती है और शांत जीवन के लिए प्रेरित करती है। कार्यक्रम के अंत में प्रगति चौरड़िया ने आभार ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन अभिषेक चारण ने किया। इस अवसर पर अभिषेक शर्मा, श्वेता खटेड़, देशना चारण, प्रगति चौरड़िया, जगदीश यायावर, अभिषेक चारण, घासीलाल शर्मा आदि उपस्थित रहे।

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Author: kalamkala

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