जहां 500 सालों से कोई श्मशान नहीं था, वहां राम धाम भूमि बता कर करवाया जा रहा है निम्बी जोधां में हंगामा, कभी अगोर, फिर आवासीय दर्ज हुई और तहसीलदार ने 1974 में यहां पट्टे जारी किए, वहां नोहरे व मकान बन गए और अब बताया जा रहा है श्मशान भूमि

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जहां 500 सालों से कोई श्मशान नहीं था, वहां राम धाम भूमि बता कर करवाया जा रहा है निम्बी जोधां में हंगामा,

कभी अगोर, फिर आवासीय दर्ज हुई और तहसीलदार ने 1974 में यहां पट्टे जारी किए, वहां नोहरे व मकान बन गए और अब बताया जा रहा है श्मशान भूमि

लाडनूं (kalamkala.in)। तहसील के अन्तर्गत निम्बी जोधां गांव (वर्तमान में उप तहसील मुख्यालय) में अपनी पट्टासुदा आवासीय भूमि पर बसे लोगों को फर्जी व षड्यंत्र पूर्वक बनाए प्रकरण द्वारा निशाने पर लिया गया है और राजस्वकर्मियों से मिलीभगत करके रिकॉर्ड में उनकी बसावट की जमीनों को रामधाम श्मशान कुछ भूमि बताते हुए उन्हें बेदखल करवाने की साज़िश रची गई है। पहले राजस्व रिकार्ड में यह पूरी जमीन अगोर दर्ज रही थी। इन लोगों द्वारा श्मशान भूमि पर कब्जा करने का व्यापक प्रचार करवा कर उनके साथ पूरे निम्बी जोधां गांव को बदनाम किया जा रहा है। पूरे ग्रामवासियों को इसके लिए शर्मिन्दा होना पड़ रहा है। दूरदराज के क्षेत्रों में इस बात को लेकर गांव की छाप खराब हो रही है कि क्या निम्बी जोधां के लोग श्मसान की भूमि को भी नहीं छोड़ते। जबकि वास्तविकता कुछ और ही है।

कभी किसी का दाह-संस्कार नहीं हुआ, फिर भी इसे श्मशान भूमि बताने के पीछे है गहरा राज!

निम्बी जोधां गांव की स्थापना 500 वर्ष पहले हुई थी। निम्बी जोधां में यह भूमि मालगांव रोड के उत्तर में और राष्ट्रीय उच्च मार्ग सं. 58 के पूर्वी भाग से चिपती भूमि का एक भाग है। इसी भूमि को राजस्व रिकार्ड में राम धाम की भूमि बताया जा रहा है। जबकि निम्बी जोधां बसने से लेकर आज तक 500 सालों में यह भूमि कभी श्मशान भूमि नहीं रही और किसी ने भी इस भूमि को श्मशान की भूमि नहीं बताया। गांव के इतिहास में इस स्थान पर कभी भी किसी मृत व्यक्ति का दाह-संस्कार नहीं किया गया था। इससे यह आश्चर्य स्वाभाविक है कि अब इस भूमि को राम-धाम की भूमि कैसे घोषित किया जा रहा है और इसके पीछे क्या राज है?

जमीन का पुराना रिकॉर्ड खंगाला जाए और उच्च स्तरीय जांच करवाई जाए

इस जमीन के पुराने रिकॉर्ड को खंगाला जाए तो पता चलता है कि किसी जमाने में राजस्व रिकॉर्ड में यह भूमि अंगोर में दर्ज थी। सन् 1972-73 ने जिला कलेक्टर, नागौर ने इस भूमि को आवासीय में तब्दील कर दिया और सन 1974 में तहसीलदार लाडनूं ने इस भूमि पर नि:शुल्क पट्टे जारी कर दिये। तब से यह भूमि पट्टाधारकों की चलती आई है। पता नहीं, कैसे आगे जाकर राजस्व रिकॉर्ड में अधिकारियों ने इस भूमि को राम-धाम की भूमि दर्ज कर डाला। इसकी उच्च स्तरीय जांच हो तो सारी सच्चाई सामने आ जाएगी।

पहले भी एसडीएम कर चुके थे कार्यवाही ड्रोप

इस कथित विवादास्पद भूमि पर स्थित प्लाॅटों के बेचान पर 12-13 वर्षों पहले भी शिकायतों का दौर चला और दो राजस्व अधिकारियों पर कार्यवाही के आदेश भी अमल होने वाले थे। इसी बीच यह पुराने रिकॉर्ड का इतिहास पेश हो जाने पर तत्कालीन एसडीएम मुरारीलाल शर्मा को कार्यवाही ड्राॅप करनी पड़ी। इस भूमि विवाद से सम्बन्धित सारे दस्तावेज एसडीएम कोर्ट में उक्त मुकदमें की फाइल में मिल जाएंगे।

जिला परिषद के सीईओ के पास है सारा रिकॉर्ड

इस विवादित भूमि को लेकर निम्बी जोधां के मौजीज व्यक्ति गौरीशंकर अटल ने इस बाबत 30-32 वर्ष पूर्व एक शिकायत भी की गई थी। जिसमें जांच के दौरान सारा रिकॉर्ड जिला परिषद में मंगवा लिया गया था। इस कारण इस जमीन से जुड़े कोई दस्तावेज ग्राम पंचायत निम्बी जोधां या पंचायत समिति लाडनूं में मिलना मुश्किल है। अटल द्वारा दर्ज इस शिकायत पर जांच के दौरान जिला परिषद नागौर की सीओ प्रभा टाक ने जांच के लिए यह पूरा रिकॉर्ड नागौर मंगाया था। अभी तक वह पूरा रिकॉर्ड जिला परिषद नागौर में उपलब्ध है। कोई भी व्यक्ति वहां से उसकी नकलें प्राप्त कर सकते हैं। (क्रमशः)

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Author: kalamkala

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