आत्मशुद्धि के लिए अहिंसा की आराधना, संयम की साधना और तप का आसेवन जरूरी- आचार्यश्री महाश्रमण, लाडनूं के विभिन्न संस्था-संगठनों ने किया ने आचार्य श्री महाश्रमण का नागरिक अभिनंदन, 2028 में रहेगा आचार्य श्री महाश्रमण का हरिद्वार, ऋषिकेश, देहरादून, मसूरी का पदभ्रमण

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आत्मशुद्धि के लिए अहिंसा की आराधना, संयम की साधना और तप का आसेवन जरूरी- आचार्यश्री महाश्रमण,

लाडनूं के विभिन्न संस्था-संगठनों ने किया ने आचार्य श्री महाश्रमण का नागरिक अभिनंदन,

2028 में रहेगा आचार्य श्री महाश्रमण का हरिद्वार, ऋषिकेश, देहरादून, मसूरी का पदभ्रमण

लाडनूं (kalamkala.in)। योगक्षेम वर्ष के महामंगल उत्सव के अवसर पर यहां स्थित जैन विश्व भारती परिसर में स्थित ‘महाश्रमण विहार’ में विराजित तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण का सुधर्मा सभा में समस्त लाडनूं की ओर से शनिवार को नागरिक अभिनंदन किया गया। शुक्रवार को नगर पालिका लाडनूं की ओर से पालिकाध्यक्ष रावत खां लाडवाण ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की मौजूदगी में आचार्य श्री महाश्रमण का नागरिक अभिनंदन किया था और शनिवार को आयोजित अभिनंदन समारोह में विभिन्न संस्था, संगठनों एवं समुदायों की ओर से उनका अभिनंदन किया गया। इस अवसर पर लाडनूं के मुस्लिम समाज की ओर से शहर काजी मो. मदनी अशरफी ने अपनी अभिव्यक्ति देते हुए मुस्लिम समाज की ओर से अभिनंदन पत्र अर्पित किया। सर्व ब्राह्मण समाज के मंत्री राजकुमार पारीक, रावणा राजपूत समाज की ओर से राजकुमार पंवार, तेरापंथ प्रोफेशनल फोरम-लाडनूं के अध्यक्ष डॉ. श्रेयांस घोड़ावत ने अपनी अभिव्यक्ति दी। तेरापंथ महिला मण्डल की अध्यक्ष आरती कठोतिया, जांगिड़ समाज की ओर से कोषाध्यक्ष गोपाल जांगिड़, सैन समाज के अध्यक्ष रोहित सैन, रैगर समाज की ओर से नवरतनमल रैगर, भारत विकास परिषद के प्रान्तीय कोषाध्यक्ष नितेश माथुर ने आचार्य श्री महाश्रमण के नागरिक अभिनन्दन समारोह में अभिव्यक्ति दी गई और परिषद से हनुमानमल जांगिड़, सुशील कुमार पीपलवा,रमेश सिंह राठौड़ बृजेश माहेश्वरी, नितेश माथुर, राधेश्याम सांखला, रवींद्र सिंह राठौड़, दिनेश सोनी, गिरधर चौहान, नौरतन मल तुनगरिया, लक्ष्मण शर्मा, विजय चौहान, सुशील दाधीच, गणेश चौहान आदि ने अभिनंदन पत्र भेंट किया। दिगम्बर जैन समाज की ओर से महेन्द्र सेठी तथा माली समाज की ओर से हनुमंतसिंह परिहार ने अपनी अभिव्यक्ति देते हुए माली समाज की ओर से अभिनंदन पत्र अर्पित किया गया। इसी प्रकार माहेश्वरी समाज के संरक्षक सूरजनारायण राठी, युवक परिषद की ओर जौहरीमल दूगड़, ओसवाल सभा के अध्यक्ष राकेश नाहटा, ओसवाल पंचायत की ओर से सरपंच राजकुमार चौरड़िया, श्री रामआनंद गौशाला की ओर से सीताराम गौतम ने अपनी अभिव्यक्ति दी। स्वर्णकार सोनी समाज की ओर से दिनेश सोनी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। अखिल भारतीय विद्या भारती के महामंत्री देवराज शर्मा ने आचार्यश्री के दर्शन कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके अलावा भी अनेक संस्थाओं के पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं ने आचार्यश्री के दर्शन कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। अणुव्रत समिति की ओर से शांतिलाल बैद ने भी अपनी भावाभिव्यक्ति दी।तदुपरान्त लाडनूं के समस्त समाज की ओर से आचार्यश्री का अभिनंदन पत्र अर्पित किया गया। इसी क्रम में तेरापंथी सभा-लाडनूं के अध्यक्ष प्रकाशचंद बैद, तेरापंथ युवक परिषद के अध्यक्ष सुमित मोदी ने भी अपनी भावाभिव्यक्ति दी। लाडनूं ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति दी। स्थानीय तेरापंथ कन्या मण्डल की कन्याओं ने भी अभिनंदन स्वरूप अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति दी। जैन विश्व भारती के आध्यात्मिक पर्यवेक्षक मुनिश्री कीर्तिकुमार ने भी अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी। जैन विश्व भारती के ट्रस्टी राजेश दूगड़ ने अपनी अभिव्यक्ति दी।

चित्त की स्थिरता व निर्मलता के लिए होता है ध्यान का प्रयोग

कार्यक्रम के दौरान आचार्यश्री महाश्रमण ने अपने व्याख्यान में कहा कि आत्मा की शुद्धि अध्यात्म साधना का लक्ष्य होता है। यह शुद्धि धर्म की साधना द्वारा, अध्यात्म की साधना द्वारा हो सकती है। अध्यात्म की साधना के अनेक आयाम हैं- अहिंसा की आराधना, संयम की साधना और तप का आसेवन। ये सभी आत्म शुद्धि के उपाय हैं। इन सब चीजों का ज्ञान स्वाध्याय के द्वारा प्राप्त होता है। मानव जीवन में ज्ञान का बहुत महत्त्व है। पहले ज्ञान होता है, फिर दया और उसके अनुरूप आचरण होता है। स्वाध्याय व अध्ययन के द्वारा ज्ञान प्राप्त होता है। स्वाध्याय के साथ ध्यान का भी महत्त्व है। चित्त की स्थिरता व निर्मलता के लिए ध्यान का प्रयोग किया जा सकता है। ध्यान भी दो प्रकार से हो सकता है। एक आदमी सारा कार्य छोड़कर ध्यान करे। शरीर की स्थिरता जितनी सघन होती है, वह मन की एकाग्रता में सहायक बन सकती है।

लाडनूं का आभूषण है जैन विश्व भारती

आचार्यश्री महाश्रमण ने कहा कि हम जैन विश्व भारती में स्थित हैं। हमारे यहां प्रेक्षाध्यान के नाम से ध्यान की पद्धति चलती है। ध्यान की अनेक पद्धतियां हैं। उन ध्यान पद्धतियों का अपना अलग सिद्धांत हो सकता है, किन्तु ध्यान का मूल लक्ष्य स्थिरता व आत्मा की निर्मलता ही होती है। योग साधना और अयोग साधना हो, लक्ष्य दोनों का एक ही है। आत्मा को मोक्ष से जोड़ने वाली विधा योग-साधना होती है। ध्यान प्रत्येक आदमी के जीवन में होना चाहिए। ध्यान मानव व्यवहार के जीवन में कितना जुड़ा है। आदमी जो भी कार्य करे, उसमें एकाग्र हो जाना चाहिए। आचार्यश्री ने कहा कि अभी हम जैन विश्व भारती में हैं। इतने साधु-साध्वियां, समणियां, मुमुक्षु बहनें रहती हैं। लाडनूं में आना हुआ है। पूज्य गुरुदेव तुलसी की जन्मभूमि, दीक्षाभूमि और कुछ अंशों में कर्मभूमि भी है। लगातार दो-दो चातुर्मास यहां हुए हैं। गुरुदेव तुलसी इस जैन विश्व भारती परिसर में कितना-कितना भ्रमण करते थे। यहां हमारा आना हुआ है। कल भी स्वागत का क्रम चला। आज भी प्रस्तुतियां हुई हैं, होने वाली हैं। लाडनूं का आभूषण है- जैन विश्व भारती। जीवन में धार्मिक-आध्यात्मिक रूप में पर-स्वकल्याण का प्रयास करते रहें।

आचार्य श्री ने जताया 2028 में हरिद्वार, ऋषिकेश, देहरादून, मसूरी, यमुनानगर व जागदड़ी जाने का भाव

कार्यक्रम में मुनि श्री जयकुमार ने अपनी अभिव्यक्ति में आचार्यश्री महाश्रमण के हरिद्वार और ऋषिकेश पधारने की प्रार्थना की। आचार्यश्री महाश्रमण ने इस संदर्भ में कहा कि मुनि जयकुमार ऋषिकेश चतुर्मास करके आए हैं। आचार्य श्री महाश्रमण ने भगवान महावीर, आचार्यश्री भिक्षु स्वामी, परम पूज्य गुरुदेव तुलसी व आचार्यश्री महाप्रज्ञ का स्मरण करते हुए कहा कि सन् 2028 के मर्यादा महोत्सव के बाद यथासंभवत: अनुकूलता के अनुसार हरिद्वार, ऋषिकेश, देहरादून, मसूरी, यमुनानगर व जागदड़ी जाने का भाव है। आचार्यश्री की इस घोषणा के साथ ही पूरा प्रवचन पांडाल जयघोष से गूंज उठा।

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Author: kalamkala

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