हमेशा सोच-समझकर और तोल कर ही बोलना चाहिए- आचार्यश्री महाश्रमण, तीन मुमुक्षु बहनों की दीक्षा आज, दीक्षार्थी बहनों की शहर में वरघोड़ा यात्रा निकाली : अभय दूगड़ को मिला प्रज्ञा पुरस्कार, व्यवस्था समिति कार्यालय का लोकार्पण

SHARE:

[responsivevoice_button voice="Hindi Female"]

हमेशा सोच-समझकर और तोल कर ही बोलना चाहिए- आचार्यश्री महाश्रमण,

तीन मुमुक्षु बहनों की दीक्षा आज, दीक्षार्थी बहनों की शहर में वरघोड़ा यात्रा निकाली : अभय दूगड़ को मिला प्रज्ञा पुरस्कार, व्यवस्था समिति कार्यालय का लोकार्पण

लाडनूं (kalamkala.in)। तेरापंथ धर्मसंघ के अधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण के सान्निध्य में चल रहे योगक्षेम वर्ष के अंतर्गत ’बहुत मत बोलो‘ विषयक व्याख्यानमाला में सुधर्मा सभा में अपने प्रवचन में आचार्य श्री महाश्रमण ने कहा, ‘बहुयं मा य आलवे’ इस आगम सूक्त में ‘बहुत मत बोलो’ का निर्देश है। विकसित भाषा लब्धि (बोलने की क्षमता) का होना प्रगति की पहचान है और भाषा का उपयोग हमारे व्यवहार का एक सक्षम आधार है। जो व्यक्ति सूक्ष्मता और निपुणता से सुनता है, वही श्रोता कभी एक अच्छा वक्ता भी बन सकता है। उन्होंने कहा कि एक वक्ता के बैठने की मुद्रा, कंठ की आवाज़, हाव-भाव आदि बाह्य चीजें प्रवचन का ‘शरीर’ हैं, जबकि वक्ता का ज्ञान, अध्ययन और उसका अनुभव उस प्रवचन की ‘आत्मा’ या प्राण तत्व होते हैं। क्षेत्रों में विचारण के दौरान साधु-साध्वियों में जिसकी भी व्याख्यान देने की ड्यूटी हो, उसे पूर्व तैयारी करनी चाहिए, समयबद्धता का ध्यान रखना चाहिए। श्रोता ध्यान से सुनें या न सुनें, यदि वक्ता ‘अनुग्रह बुद्धि’ से बोलता है, तो वह उसका स्वयं का हित और आत्म-विकास अवश्य होता है। बात को अनावश्यक लम्बा करना और उसमें सार न होना, ये दोनों वाणी के दोष हैं। इसके विपरीत संयमित बोलना और सारपूर्ण बोलना, वाणी के गुण होते हैं। वाचालता आदमी को लघु बनाने वाली हो सकती है, जबकि मौनशीलता उन्नति की ओर ले जाने वाली होती है। हमेशा सोच-समझकर और तोल कर ही बोलना चाहिए, मितभाषी होना सच्चाई की साधना में भी सहयोगी बनता है। वाणी संयम व्यवहार प्रशिक्षण का एक बहुत अच्छा सूक्त है, जिसकी हम सभी को अपने जीवन में आराधना करने का प्रयास करना चाहिए। इस अवसर पर आचार्य श्री महाश्रमण ने सबको प्रेरित करते हुए कहा कि अणुव्रत, नैतिकता और सद्भावना का मानवता का संदेश जेलों, स्कूलों, विद्या संस्थानों और बाज़ार के चौराहों तक भी पहुंचना चाहिए।

प्रवास व्यवस्था समिति कार्यालय का लोकार्पण

गुरुवार को प्रभातकाल में आचार्य श्री महाश्रमण का जैन विश्व भारती परिसर में योगक्षेम वर्ष प्रवास व्यवस्था समिति के नवनिर्मित कार्यालय में पदार्पण हुआ। उनके सान्निध्य में इस कार्यालय का लोकार्पण किया गया। व्यवस्था समिति के पदाधिकारियों ने आचार्य श्री महाश्रमण से पावन आशीर्वाद प्राप्त किया। इस दौरान संपोषणम भोजनशाला में भी गुरुदेव पधारे एवं मंगलपाठ प्रदान किया। व्यवस्था समिति अध्यक्ष प्रमोद बैद एवं मंत्री निर्मल कोटेचा ने आचार्यप्रवर को संबंधित जानकारी प्रस्तुत की।

अभय दूगड़ को दिया गया प्रज्ञा पुरस्कार

जैन विश्व भारती द्वारा गुरुवार को प्रज्ञा पुरस्कार समारोह भी आयोजित हुआ, जिसके तहत आचार्य श्री महाश्रमण के सान्निध्य में अभय दुगड़ (बैंगलोर-जयपुर) को यह पुरस्कार प्रदान किया गया। अभय दूगड़ को यह पुरस्कार जैन विश्व भारती के अध्यक्ष अमरचंद लुंकड़, मुख्य न्यासी जयंतीलाल सुराणा, जैविभा मान्य विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बच्छराज दुगड़, योगक्षेम प्रवास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष प्रमोद बैद ने प्रदान किया। प्रारंभ में राजेंद्र खटेड ने अभय दूगड़ का परिचय प्रस्तुत किया।

दीक्षार्थियों की वरघोड़ा यात्रा निकाली

आचार्य प्रवर के सान्निध्य में 6 मार्च शुक्रवार को भव्य जैन भगवती दीक्षा समारोह का आयोजन रखा गया है। आचार्य श्री महाश्रमण के योगक्षेम वर्ष प्रवास के दौरान यह द्वितीय दीक्षा समारोह होगा। इसके लिए गुरुवार दोपहर में दीक्षार्थी बहनों मुमुक्षु प्रिशा गादीया, मुमुक्षु प्रिया मेहनोत, मुमुक्षु रक्षा ओस्तवाल की वरघोड़ा यात्रा गाजे-बाजे के साथ शहर में निकाली गई। गुरूदेव आचार्य श्री महाश्रमण ने मंगलप्राठ प्रदान कर दीक्षार्थियों को आशीष दिया।

kalamkala
Author: kalamkala

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

सबसे ज्यादा पड़ गई

अपनी ऊर्जा का उपयोग राष्ट्रहित और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने के लिए करें युवा- देवनानी, विधान सभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी का लाडनूं दौरा, अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद के ‘दक्षिणांचल स्तरीय युवा सम्मेलन’ में हुए शामिल

शहर चुनें

Follow Us Now