दीक्षा सामान्य नहीं होती, जीवन भर सर्व पापपूर्ण कर्मों का त्याग और अनुशासन में रहना होता है- आचार्यश्री महाश्रमण, लाडनूं में 10 वर्षीया बालिका प्रिशा सहित तीन मुमुक्षुओं ने दीक्षा ग्रहण कर साधुत्व का मार्ग अपनाया

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दीक्षा सामान्य नहीं होती, जीवन भर सर्व पापपूर्ण कर्मों का त्याग और अनुशासन में रहना होता है- आचार्यश्री महाश्रमण,

लाडनूं में 10 वर्षीया बालिका प्रिशा सहित तीन मुमुक्षुओं ने दीक्षा ग्रहण कर साधुत्व का मार्ग अपनाया

लाडनूं (kalamkala.in)। यहां जैन विश्व भारती में योगक्षेम वर्ष के लिए एक वर्षीय प्रवास कर रहे तेरापंथ धर्मसंघ के अधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण के सान्निध्य में जैन भागवती दीक्षा का दूसरा आयोजन शुक्रवार कै किया गया। इस दीक्षा समारोह में मात्र 10 वर्षीया प्रिशा गादीया सहित तीन मुमुक्षुओं ने दीक्षा ग्रहण की। मुमुक्षु प्रिया महनोत, रक्षा ओस्तवाल और प्रिशा गादीया ने संसार से संन्यास और राग से वैराग्य के मार्ग पर कदम बढ़ाते हुए संयम का जीवन अंगीकार किया। दीक्षा के बाद इनका नवीन नामकरण किया जाकर मुमुक्षु प्रिशा गादिया को साध्वी पद्मप्रभा, मुमुक्षु प्रिया महनोत को साध्वी पवित्र प्रभा और मुमुक्षु रक्षा ओस्तवाल को साध्वी रक्षाप्रभा नाम प्रदान किए गए।

साध्वीप्रमुखा श्री विश्रुतविभा ने किया नवदीक्षित साध्वियों का केश लुंचन

इस अवसर पर पारमार्थिक शिक्षण संस्था के बजरंग जैन ने परिजनों द्वारा लिखित आज्ञा-पत्र का वाचन किया। जिसे दीक्षार्थियों के माता-पिता ने गुरुदेव आचार्य श्री महाश्रमण के श्रीचरणों में भेंट किया। तीनों दीक्षार्थियों द्वारा अपने वैराग्य भाव व्यक्त किए जाने के उपरांत, आचार्य श्री महाश्रमण ने आगम सूक्तों का वाचन कर उन्हें संयम जीवन प्रदान किया। तत्पश्चात् आचार्य श्री महाश्रमण के निर्देशानुसार साध्वीप्रमुखा श्री विश्रुतविभा ने नवदीक्षित साध्वियों का केश लुंचन किया। केश लुंचन प्रक्रिया शिष्य की चोटी गुरु के हाथ में रहने के भाव के साथ श्रमण संस्कृति की कठोर केश लोच परंपरा का प्रतीक है। केश लोच के पश्चात नवदीक्षितों को ‘रजोहरण’ प्रदान किया गया, जो साधु चर्या का सबसे अभिन्न अंग माना जाता है। इस अवसर पर साध्वीप्रमुखा श्री विश्रुतविभा ने अपना उद्बोधन भी प्रदान किया।

नवदीक्षितों के लिए होगा छह महिनों का प्रशिक्षण कोर्स

दीक्षा समारोह के दौरान आचार्यश्री ने महाश्रमण ने कहा कि पहले शिक्षा, फिर परीक्षा और अंत में समीक्षा के बाद दीक्षा का क्रम आता है। दीक्षा कोई सामान्य कार्य नहीं है, इसमें भर के लिए सर्व सावद्य (पापपूर्ण) कार्यों का त्याग किया जाता है और गुरु के अनुशासन में रहना होता है। उन्होंने निर्देश देते हुए कहा कि आगम के अनुसार ‘समय पर अध्ययन हो’। नवदीक्षित साध्वियों का स्वाध्याय निरंतर चलना चाहिए, क्योंकि भोजन शरीर की खुराक है, परंतु स्वाध्याय संयम की असली खुराक है। नवदीक्षितों के लिए छह महीने का प्रशिक्षण कोर्स होता है। स्वाध्याय के साथ उच्चारण शुद्धि का भी बहुत महत्व है। जैसे ‘णमो अरहंताणं’ में अनुस्वार का शुद्ध उच्चारण होंठ खुले रखकर ही संभव है। ज्ञान के संदर्भ में केवल सूत्र पाठ ही नहीं, बल्कि अर्थ का अवबोध भी होना चाहिए ताकि आगम की बातें दिशा-निर्देशक बन सकें। इन सबके साथ मन में सेवा की भावना प्रबल रहनी चाहिए। अपनी सामर्थ्य से बीमार, वृद्ध और सेवा के अधिकारियों की यथायोग्य सेवा करें। नवदीक्षितों को संभालना, उन्हें संस्कार देना और तैयार करना एक बहुत बड़ी आध्यात्मिक सेवा है।

बाल दीक्षा के कारण चर्चित रहा समारोह

इस दीक्षा समारोह को लेकर इस बात की चर्चा रही कि इस बार मात्र 10 वर्षीय बालिका प्रिशा गादीया इतनी लघु आयु में भी दीक्षा ग्रहण कर रही है। इससे सभी अचम्भित रहे। यह दीक्षा समारोह भौतिकता के भीषण माहौल में अध्यात्म की राह स्वीकार करने का विशेष और महत्वपूर्ण कार्यक्रम रहा। कार्यक्रम का प्रारम्भ साध्वी वृंद द्वारा प्रस्तुत योगक्षेम गीत से किया गया। प्रारम्भ में दीक्षा संस्कार की विधि से पूर्व मुमुक्षु भावना नाहटा ने दीक्षार्थियों का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया। मुनिश्री दिनेश कुमार ने समारोह का संयोजन किया। इस समारोह में देश-विदेश से आए हजारों श्रद्धालुओं ने शिरकत की और बाल दीक्षा सहित कार्यक्रम के साक्षी बने।

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Author: kalamkala

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