चक्रवर्ती सम्राट महान विक्रमादित्य के कार्यों को भुलाया जाना अनुचित
जोधपुर। अखिल भारतीय परमार पंवार क्षत्रिय महासंघ के राष्ट्रीय संयोजक एवं श्री राष्ट्रीय क्षत्रिय महासभा के राष्ट्रीय सलाहकार इंजीनियर जालम सिंह परमार ने अयोध्या में भारत के महान चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य की घोडत्रे पर सवार प्रतिमा लगाने की मांग की है। उन्होंने अपील की है कि उत्तर प्रदेश के सभी परमारों को पहल करते हुए भारतवर्ष के समस्त परमार वंश के लोगों से सहयोग लेते हुए अयोध्या में सम्राट विक्रमादित्य की अश्वारूढ मूर्ति लगवानी चाहिए। साथ ही एक स्मारक का निर्माण भी करवाया जाना चाहिए। इसके अलावा एक मुख्य द्वार एवं सड़क का नामकरण भी सम्राट विक्रमादित्य के नाम पर किया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि वर्तमान अयोध्या परमार वंश के महान सम्राट विक्रमादित्य ने 5 कोस में बसाई थी। रामजन्म भूमि पर मंदिर का निर्माण भी सम्राट विक्रमादित्य द्वारा करवाया गया था। पूरे उत्तर प्रदेश में तथा लखनऊ व अयोध्या के आसपास भारी संख्या में परमार वंश के लाग निवास कर रहे हैं, लेकिन सम्राट विक्रमादित्य की अश्वारूढ मूर्ति अयोध्या में लगाने के संबंध में सभी शांत बैठे हैं, यह चिंता की बात है। देश के सभी परमार वंश के लोगों को एकजुट होकर इसके लिए आवाज उठानी चाहिए और इसके लिए पहल अयोध्यावासी परमारों को करनी होगी। इंजीनियर परमार ने बताया कि अयोध्या में सम्राट विक्रमादित्य की अश्वारूढ मूर्ति लगवाने का ध्येय लेकर वे शीघ्र ही अयोध्या और लखनऊ का दौरा करंेगे, ताकि इस सम्बंध में जागृति और आवश्यक कार्रवाई के लिए प्रयास कर पाएं उन्होंने भारतवर्ष के सभी परमारों से अनुरोध किया है कि वे इस सम्बंध में आवश्यक मार्गदर्शन एवं सहयोग प्रदान करावें।
विक्रमादित्य ने कराया था विलुप्त हो चुके श्रीराम जन्म मंदिर पुनर्निर्माण
भारतीय समाज के कम ही लोगों को पता है कि महाराज विक्रमादित्य ने भी बाबा महाकाल मंदिर की शोभा बढ़ाने के साथ साथ लोप हो चुकी अयोध्या की फिर से खोज करने तथा श्री राम जन्म मंदिर के पुनर्निर्माण कराने का महती कार्य भी किया था। कोई 2078 बरस पहले, जिसे बाबर के सेनापति मीर बांकी ने 1528 में ध्वस्त किया था और जिस पर अब भव्य राम मंदिर का पुनर्निर्माण हो रहा है। साथ ही अयोध्या में 240 नए मंदिरों का तथा 60 प्राचीन मंदिरों के निर्माण का श्रेय भी महाराजा विक्रमादित्य को जाता है। इसका विस्तार से उल्लेख गीता प्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘अयोध्या दर्शन’ में भी मिलता है। सुप्रसिद्ध जर्मन विद्वान मैक्समूलर ने भी श्री नागेश्वरनाथ मंदिर के प्रति अपने विचार प्रकट करते हुए लिखा है कि- ‘इस मंदिर पर नामालूम कितनी आंधियां और भयंकर तूफान आए, परंतु यह सबको बर्दाश्त करता हुआ अपने स्थान पर अडिग और अचल खड़ा है।’ महाराज विक्रमादित्य ने जब अयोध्या की पुनः खोज की तो सबसे पहले इसी स्थान का पता लगा।
जनश्रुति के अनुसार महाकवि कालिदास को ‘स्त्रीयोनि’ में जन्म लेने का श्राप यहीं से मिला था। डाउसन के अनुसार महाराजा विक्रमादित्य ने 240 नए मंदिर बनवाए और 60 का जीर्णाेद्धार किया। शुभशील के पंचशती बोध में महाराजा विक्रमादित्य द्वारा अयोध्या में उत्खनन करके चर्मकार स्त्री की स्वर्ण जरी की जूतियां अन्वेषण की कथा है।
अयोध्या में सम्राट विक्रमादित्य निर्मित महत्वपूर्ण मंदिर

अयोध्या दर्शन (गीता प्रेस, गोरखपुर, पृष्ठ 98-99) के अनुसार महाराजा विक्रमादित्य द्वारा निर्मित प्राचीन मंदिरों में हैं –
1. श्रीराम जन्मभूमि मंदिर- श्री राम जन्म स्थान पर कसौटी पत्थर के 84 स्तंभों और सात कलशों वाला मंदिर महाराजा विक्रमादित्य ने बनवाया था, जिसे 1528 ई. में मुगल बादशाह बाबर के सेनापति मीर बांकी ने ध्वस्त कर दिया था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा किए गए उत्खनन में वहां हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियां, प्रतीक और स्तंभ प्राप्त हुए हैं जिसके आधार पर वहां एक भव्य मंदिर था, इस बात की पुष्टि हुई है।
2. कनक भवन- अयोध्या राजवंश के पराभव के बाद कनक भवन भी जर्जर होकर ढह गया। सोने का यह महल माता कैकेयी ने सीताजी को मुंह दिखाई में दिया था। यह श्री राम-जानकी का विहारस्थल है। महाराजा विक्रमादित्य ने 57 ई.पू. में कनक भवन पुनःनिर्मित कराया। उसे लगभग 11वीं शती ई. में यवनों ने ध्वस्त कर दिया। वर्तमान कनक भवन का निर्माण ओरछा नरेश सवाई महेन्द्र श्री प्रताप सिंह की धर्मपत्नी महारानी वृषभानु कुंवरि द्वारा सन् 1891 ई. में करवाया।
3. रत्न सिंहासन मंदिर- जन्म स्थान के पास रत्न मंडप ही रत्न सिंहासन मंदिर है। यहां भगवान श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ था। कनक भवन के निकट दक्षिण में है। यहां विक्रमादित्य कालीन तीन मूर्तियां हैं। दुर्भाग्य से यह स्थान अपनी स्वतंत्र पहचान खोता जा रहा है।
4. लक्ष्मण मंदिर, सहस्त्रधारा तीर्थ- सहस्त्रधारा तीर्थ (लक्ष्मण घाट पर) लक्ष्मणजी के शरीर छोड़ने के स्थान पर यह मंदिर है। यहां रामांज्ञा से श्री लक्ष्मणजी शरीर छोड़कर परमधाम पधारे थे। यहां मंदिर में शेषावतार लक्ष्मण जी की 5 फुट ऊंची चतुर्भुज मूर्ति है। यह मूर्ति सामने कुंड में पाई गई थी। लक्ष्मण घाट पर यह मंदिर लक्ष्मण किला के निकट स्थित है। नागपंचमी एवं पूरे वैशाख मास में यहां विशेष भीड़ रहती है।
5. बड़ी देवकाली (शीतलादेवी दुर्गाकुण्ड पर)- इन्हें भगवान श्रीरामचंद्रजी की कुलदेवी कहा जाता है। द्वापर युग में सूर्यवंशी महाराज सुदर्शन द्वारा यहां एक मंदिर की स्थापना की गई। कालांतर में महाराजा विक्रमादित्य ने शालग्राम शिलामय की त्रिदेवियों की स्थापना की गई। यहां एक ही शिला में महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती शक्तियंत्र सहित अंकित है। अयोध्या के इस आदिशक्तिपीठ पर आज भी अयोध्यावासी बड़ी श्रद्धा रखते हैं। यहां एक जल से परिपूर्ण सरोवर (कुंड) भी है। 2002 ई. में मंदिर एवं सरोवर का जीर्णाेद्धार किया गया है। यह फैजाबाद चौक से आग्नेय (दक्षिण पूर्व) कोण में स्थित है।
6. छोटी देवकाली गिरिजा (ईशान देवी) नामक प्रसिद्ध मंदिर है। इस विग्रह की स्थापना त्रेतायुग में श्री सीता जी द्वारा की गई थी, जिसे वे अपने साथ जनकपुर से लाई थीं। यह स्थान मत्त गजेन्द्र चौराहे के पास सप्तसागर के निकट अयोध्या में ही है। (पृष्ठ-98-99)
525 ई. में बाबर के मीर बांकी ने यहां के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर को ध्वस्त कर दिया था। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की रक्षा के लिए संघर्ष का इतिहास काफी लम्बा है। वर्ष 2019 को उच्चतम न्यायालय का फैसला प्रकट हुआ। तदनुसार श्री राम जन्मभूमि पक्ष की ओर से कहा गया था कि उस स्थान पर महाराजा विक्रमादित्य के समय से एक मंदिर था। (पृष्ठ-81)
उज्जयिनी के सम्राट विक्रमादित्य ने इसकी खोज कर इस (अयोध्या) को पुनः बसाया। (पृष्ठ-92)
महाराजा विक्रमादित्य ने अयोध्या की पुनः खोज की, तो सर्वप्रथम नागेश्वर मंदिर मिला। (पृष्ठ-75)
एक कथानुसार महाकवि कालिदास को स्त्री योनि में जन्म लेने का श्राप यहीं से मिला था। (पृष्ठ-45-46)
डॉ. श्रीराम अवतार ‘श्रीराम जन्मभूमिः अयोध्या का इतिहास में’ लिखते हैं कि- ‘सात मोक्षदायिनी नगरियों में प्रथम नगरी अयोध्या सतयुग में महाराज मनु ने बसाई थी। सरयू नदी के किनारे बसी यह नगरी 12 योजन (144 किलोमीटर) लम्बी तथा 3 योजन (36 किलोमीटर) चौड़ी थी। चक्रवर्ती सम्राट दशरथजी ने इसे विशेष रूप से बसाया था। इसमें सभी प्रकार के बाजार थे। तथा इसकी रक्षा खाइयों, किवाड़ों, और शताध्रियों से होती थी। महाराज इक्ष्वाकु, अनरण्य, मान्धाता, प्रसेनजित, भरत, सगर, अंशुमान, दिलीप, भगीरथ, ककुत्थ्य, रघु, अम्बरीष जैसे सम्राटों की यह राजधानी रही। श्रीरामजी की आज्ञा से इसके प्रधान देवता हनुमानजी हैं।’
वे आगे लिखते हैं कि- ‘श्रीराम के परमधाम पधारने पर यह नगरी जनशून्य हो गई थी। तब महाराज कुश ने इसे पुनः बसाया था। यह पावन नगरी जब पुनः लुप्त हो गई, तब लगभग 2500 वर्ष पूर्व उज्जयिनी के सम्राट विक्रमादित्य ने इसकी खोज कर इसे पुनः बसाया था। 1525 ई. में बाबर के मीर बांकी ने यहां के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर को ध्वस्त कर दिया था। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की रक्षा के लिए संघर्ष का इतिहास काफी लम्बा है।’
विक्रमादित्य की पांच-कोसी अयोध्या से 17 गुना बड़ी 84 कोस में होगी नव्य अयोध्या
नव्य अयोध्या बसाने की योजना के अनुसार उज्जैन के महाराजा विक्रमादित्य द्वारा बसाई गई पांच कोस की अयोध्या से करीब 17 गुना बड़ी चौरासी कोस में होगी। यहां करीब सवा तीन सौ रामायणकालीन स्थलों और ऋषि-मुनियों के आश्रमों का पुनरोद्धार करने के साथ आधुनिक पर्यटन, यातायात और ठहरने की सुविधाएं विकसित होंगी।
101 ईसा पूर्व उज्जैन के महाराजा विक्रमादित्य ने उजड़ चुकी रामकालीन अयोध्या को फिर से बसाया था। तब की अयोध्या पांच कोस में फैली थी। ईसा पूर्व सौ वर्ष उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य यहां रामदर्शन करने आए थे। सम्राट ने देखा कि समूची अयोध्या ध्वस्त पड़ी है। तब उन्होंने श्रीराम जन्मस्थान मंदिर बनवाने के साथ पांच कोस में 360 मंदिरों का निर्माण कर नई अयोध्या बसाई थी। इसके स्तंभों का उल्लेख वंशीय प्रबंध व लोमस रामायण में मिलता है। इस प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा राम नवमी को उत्सव के साथ की गई।






