सिद्धि प्राप्ति के बाद साधन महत्त्व नहीं होता- आचार्य श्री महाश्रमण, लाडनूं में तेरापंथ के अधिशास्ता का नियमित प्रवचन जारी

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सिद्धि प्राप्ति के बाद साधन महत्त्व नहीं होता- आचार्य श्री महाश्रमण,

लाडनूं में तेरापंथ के अधिशास्ता का नियमित प्रवचन जारी

लाडनूं (kalamkala.in)। तेरापंथ धर्मसंघ के अधिशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण ने सुधर्मा सभा में अपने प्रातःकालीन मुख्य प्रवचन में ‘धर्म का निवास कहां’ विषय पर कहा कि आध्यात्मिक जगत में मोक्ष की बात आती है। धर्म की साधना का अंतिम लक्ष्य मोक्ष ही होता है। मोक्ष मिलने के बाद धर्म वहीं कृत-कृत्य हो जाता है। सिद्धों में कोई चारित्र, संवर और निर्जरा नहीं होते, ये सभी संसारी जीवों के लिए मोक्ष प्राप्ति के साधन हैं। सिद्धि प्राप्ति के बाद साधन महत्त्व नहीं होता। साधन का महत्त्व तभी तक होता है, जब तक कि सिद्धि की प्राप्ति नहीं हो जाती। प्रश्न हो सकता है कि मोक्ष को कौन जीव प्राप्त कर सकता है? उत्तर प्रदान किया गया कि मोक्ष को वही जीव प्राप्त कर सकता है, जिसके जीवन में धर्म होता है। जो धर्म की साधना करता है, वही मोक्ष प्राप्त कर सकता है। प्रश्न हो सकता है कि धर्म किसके शरीर में ठहरता है? उत्तर दिया गया कि धर्म शुद्ध आदमी में ठहरता है। तीसरा प्रश्न होता है कि शुद्ध कौन होता है? आगमवाणी में कहा गया है कि जो ऋजु अर्थात् सरल होता है, उसकी शोधि होती है। इस प्रकार ऋजुता कितनी महत्त्वपूर्ण होती है। यदि जीवन में धर्म को ठहराना है तो उसकी पात्रता है, जीव का ऋजु हो जाना।

दोष-बंधन से मुक्ति के लिए जरूरी है प्रायश्चित

आचार्य श्री महाश्रमण ने आगे कहा कि जहां सरलता होती है, वहां धर्म ठहरता है। एक साधु को सरल माना जा सकता है। पर यदि उसके जीवन में सरलता नहीं है, तो वह न जाने कितने-कितने दोष स्वयं को लगा रहा है। यदि उसमें सरलता नहीं है, छल-कपट कर लेता है, कई प्रकार के दोषों को अपने जीवन के साथ बांध लेता है। इसलिए कहा जा सकता है कि जो सरल होता है, उसकी शोधि हो जाती है। जो सरल होता है, वह साधु अपने दोषों को स्वीकार कर लेता है और प्रायश्चित्त स्वीकार कर लिया तो उसकी शोधि हो गई। इस प्रकार वह शुद्ध होता है। जिस प्रकार बालक अपने माता-पिता के सामने जितनी सरलता के साथ अपनी बातें रख देता है, उसी प्रकार साधु को अपने प्रायश्चित्त प्रदाता के सामने अपने दोषों को नम्रता से स्वीकार कर लेता है और प्रायश्चित्त दाता भी यथायोग्य प्रायश्चित्त प्रदान कर दें और वह उसका पालन कर ले, तो उसकी शोधि हो सकती है। इसलिए आदमी को सरल बनने का प्रयास करना चाहिए। छल-कपट के द्वारा दोषों को इकट्ठा करने से बचने का प्रयास करना चाहिए।

सरलता से बनता है जीवन शुद्ध

जीवन में सरलता होती है तो शुद्धता होती है। जिसका जीवन शुद्ध होता है और जो शुद्ध होता है, उसके जीवन में धर्म का निवास होता है तथा जिसके जीवन में धर्म होता है, तो उसे कभी मोक्ष की प्राप्ति भी हो सकती है
प्रवचन के बाद जिज्ञासा- समाधान का भी क्रम चला। चारित्रात्माओं द्वारा की जाने वाली जिज्ञासाओं को आचार्यश्री ने अपने प्रवचन में समाहित किया।

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Author: kalamkala

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