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दैनिक आचरण व व्यवहार में सुधार से रेागों से बचाव संभव- डा. डीसी जैन, ‘रोगमुक्त भारत’ पर व्याख्यान में बताई ‘वन हेल्थ एप्रोच’ अवधारणा में पशु-पक्षी, वनस्पति, मनुष्य सबकी चिकित्सा एक साथ

दैनिक आचरण व व्यवहार में सुधार से रेागों से बचाव संभव- डा. डीसी जैन,

‘रोगमुक्त भारत’ पर व्याख्यान में बताई ‘वन हेल्थ एप्रोच’ अवधारणा में पशु-पक्षी, वनस्पति, मनुष्य सबकी चिकित्सा एक साथ

लाडनूं। वीवीएमसी एवं सफदरजंग हास्पिटल नई दिल्ली के न्यूरोलोजी विभाग के हेड व प्रोफेसर डा. डीसी जैन ने कहा है कि भारत को रोगमुक्त बनाने के लिए अपने दैनिक आचरण में सुधार करने की जरूरत है। सोने, भोजन करने, फल व सब्जियां खाने के तरीकों व समय में पर्याप्त सुधार करके अपने आपको रोगों से दूर रखा जा सकता है। यहां जैन विश्वभारती संस्थान के महादेवलाल सरावगी अनेकान्त शोधपीठ के तत्वावधान में संचालित वार्षिक व्याख्यानमाला ‘आचार्य महाप्रज्ञ प्रज्ञासंवर्द्धिनी व्याख्यानमाला’ के अन्तर्गत यहां आचार्य महाश्रमण आॅडिटोरियम में एक दिवसीय व्याख्यान में ‘रेागमुक्त भारत का आध्यात्मिक-वैज्ञानिक आधार’ विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए उन्होंने आगे कहा कि उन्होंने आधुनिक चिकित्सा की अहिंसक प्रणाली व प्राणवान की रक्षा के दायित्व के सम्बंध में आयोजित विश्व सम्मेलनों एवं विविध संगठनों का सहयोग लेकर जो अभियान संचालित किया, उसका असर देखने को मिला और आज अमेरिका में 50 से 60 प्रतिशत तक लोग हिंसा से दूर हो गए हैं। इंग्लेंड व अन्य कुछ यूरोपीय देशों में भी इसका प्रभाव हुआ है। उन्होंने बताया कि देश में रोगों को प्रमुख रूप से दो भागों में बांटा जा सकता है, एक छूआछूत वाले रोग और दूसरे गैर छुआछूत वाली बीमारियां। देश से संक्रामक रोगों में चेचक व पोलियो को पूरी तरह से मिटाया जा चुका है। इसी प्रकार डिप्थीरिया, कूकर खांसी, टिटेनस को भी नियंत्रित किया जा चुका है। जैन धर्म में जो शु़द्धता पानी वगैरह की है, वह भी रोगों को दूर रखने का ही तरीका है। फल-सब्जियां धोकर खाना जरूरी है, इनसे जूनोसिस बीमारियों से बचा जा सकता है। बदलते तापमान के कारण 200 तरह की बीमारियां पैदा होती है। विभिन्न पक्षियों से भी बीमारियां पैदा होती है। परिषहज बीमारियां भी होती हैं, जो कठिनाइयों के कारण होती हैं। छुआछूत के बिना फैलने वाली बीमारियों में ह्दयरोग, ब्लड प्रेशर, डायबीटीज, स्मरण शक्ति का कम होना आदि के नाम गिनाते हुए उन्होंने बताया कि आज हर घर में ऐसी बीमारियां मिलेंगी। अलकोहल के सेवन, दवाइयों के असर, देर तक सोना, एनीमल फूड प्रयोग में लेने, भाजन देरी से करने, अधिक भोजन करने आदि से ये बीमारियां पनपती हैं। उन्होंने इनसे बचने के लिए प्लांट बेस्ड भोजन व न्यूट्रीशन, नियमित भोजन, व्यायाम, पैदल चलने सहित विविध उपाय बताते हुए कहा कि जीवन में सच्चाई व ईमानदारी हो तो जीवन स्वस्थ व सम्मान-योग्य बनता है। उन्होंने बताया कि एक अवधारणा सामने आई है, ‘वन हेल्थ एप्रोच’, जिसमें जानवरों, मनुष्यों व पेड़-पौधों तक को रोगों से बचाया जाता है। इसे विश्व स्वास्थ्य संगठन ने स्वीकार किया है और भारत ने भी माना है। इसमें पशु-पक्षी, वनस्पति, मनुष्य सबकी चिकित्सा एक साथ होगी। उन्होंने बताया कि चिकित्सा जगत में 2 करोड़ जीवों के कष्ट दिया जाता है, जानवरों पर एक्सपीरिमेंट किया जाता है, जिसे काफी प्रयासों के बाद देश में अब एनसीईआरटी ने बंद करवा दिया है। उन्होंने कहा कि दुनिया को राह दिखाने के लिए हमें जिद नहीं बल्कि लोगों की राय को समझ कर उसका निराकरण करना चाहिए।

आधि, व्याधि, उपाधि की चिकित्सा भी जरूरी

व्याख्यानमाला की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ ने कहा कि व्यक्ति को रेाग मुक्त किया जाना संभव है। परिस्थिति के विपरीत होते हुए भी उससे बिना प्रभावित हुए यथास्थिति बने रहना ही स्वस्थ रहना है। परिषहज-विजय महत्वपूर्ण है, विपरीत परिस्थितियों को सहने की क्षमता महत्व रखती है। उन्होंने रोगों को केवल शारीरिक ही नहंी आधि, व्याधि, उपाधि में विभाजित करते हुए उनकी चिकित्सा को भी जरूरी बताया। कार्यक्रम का प्रारम्भ समणी प्रणव प्रज्ञा के मंगल-संगान से किया गया। अतिथियों के स्वागत-सम्मान के पश्चात जैन विद्या एवं तुलनात्मक धर्म व दर्शन विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. समणी ऋजुप्रज्ञा ने स्वागत वक्तव्य प्रस्तुत किया। समणी नियोजिका डा. समणी अमलप्रज्ञा ने अतिथि-परिचय प्रस्तुत किया। कार्यक्रम के अंत में शोधार्थी अच्युतकांत जैन ने आभार ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन प्रो. आनन्द प्रकाश त्रिपाठी ने किया। इस अवसर पर प्रो. नलिन के. शास्त्री, कुलसचिव प्रो. बीएल जैन, प्रो. रेखा तिवाड़ी, विताधिकारी आरके जैन, डा. रविन्द्र सिंह राठौड़, डा. मनीष भटनागर, दीपाराम खोजा, पंकज भटनागर, डा. अमिता जैन, डा. सरोज राय, डा. लिपि जैन, विनोद कस्वां, प्रमोद ओला आदि उपस्थित रहे।

 

kalamkala
Author: kalamkala

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