पिछले 8 साल से युवक को जकड़ कर रखा है लोहे की जंजीरों में, कोई ध्यान नहीं दे रहे समाज और सरकार पिता की मौत के बाद तीन संतानों व वृद्ध दादा का सारा बोझ आया माता के कंधों पर, पेंशन और मजदूरी से मुश्किल हो गया गुजारा

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पिछले 8 साल से युवक को जकड़ कर रखा है लोहे की जंजीरों में, कोई ध्यान नहीं दे रहे समाज और सरकार

पिता की मौत के बाद तीन संतानों व वृद्ध दादा का सारा बोझ आया माता के कंधों पर, पेंशन और मजदूरी से मुश्किल हो गया गुजारा

लाडनूं (kalamkala.in)। किसी को भी बेड़ियों से बांध कर रखना मानवीय दृष्टिकोण से सरासर गलत है, लेकिन जहां भगवान ने ऐसी परिस्थितियां और मजबूरियां पैदा कर दी हो, वहां इसके सिवा कोई चारा नहीं बचता। एक 18 साल के युवक को पिछले 8 साल से लोहे की मजबूत सांकलों से बांध कर रखना पड़ रहा है। उसके परिवार की हालत देखें तो बहुत ही बदतर है। पिता की हादसे से मौत हो चुकी, बड़ी बहन को आर्थिक हालात के चलते पढ़ाई बीच में छोड़ देनी पड़ी, छोटे भाई को अभी दुनियादारी की समझ नहीं है। वृद्ध दादा को उस युवक की देखरेख में रहना पड़ता है। माता मजदूरी करके भी पूरे परिवार का पेट नहीं पाल पा रही है।

जंजीरों में जकड़ कर रखना पड़ रहा है 8 सालों से

यह 18 साल का युवक जनृम से ही दिव्यांग है। बचपन से ही उसकी स्थिति ऐसी थी कि उसका सिर हरदम अनावश्यक ही हिलता-डोलता रहता था। वह खुला रह कर घर से बाहर निकल जाता तो कभी किसी पर पत्थर फेंकने लगता, तो कभी किसी विद्युत ट्रांसफार्मर में हाथ डाल देता। कभी बेमतलब ही जानवरों की पिटाई करने लगता। वह नासमझी में खुद का या किसी भी दूसरे का अहित कर सकता था, ऐसी हालत को देख कर मजबूरन इस युवक महीपाल को परिवार के लोग बांध कर रखते हैं। उसका पालन-पोषण और देखरेख सब बंधे-बंधे की ही करनी पड़ रही है।

पिता के रीढ़ की चोट ने कर दिया कर्जा, पर बच नहीं पाए

यह युवक महीपाल सुजानगढ़ तहसील की ग्राम पंचायत बडाबर के गांव बिलासी का रहने वाला है। उसके पिता जीवनदान चारण की मौत हादसे में घायल होने से हो गई थी। जीवनदान छह साल पहले खेजड़ी के पेड़ से गिर कर घायल हुआ था। इसमें उसकी रीढ़ की हड्डी क्षतिग्रस्त हो गई थी। वह नाकारा हो गया और उसका लम्बा इलाज चला, लेकिन वह स्वस्थ नहीं हो पाया, अंततोगत्वा उसकी मौत हो गई। इलाज के दौरान उस पर भारी कर्जा भी चढ़ चुका था। उसकी मृत्योपरांत परिवार पर दु:खों का पहाड़ ही टूट पड़ा। पूरे परिवार की सारी जिम्मेदारियां अकेले उसकी पत्नी कमला कंवर के लाचार कंधों पर आ गई। गरीबी और हालात की लगातार पड़ती मार ने इस परिवार को इस कदर जकड़ लिया है कि मां कमला कंवर के पीहर पक्ष या ससुराल पक्ष कहीं से भी कोई मदद की कोई उम्मीद नहीं बची। बेटे को बैड़ियों में रखकर उसकी सेवा करने और उसकी दवा-पानी का खर्च उठाना उनके लिए भारी पड़ रहा है।उसकी दैनिक जरूरतें मां को ही पूरी करनी होती है।

सिर्फ पेंशन और मजदूरी के सहारे कर रहे जैसे-तैसे गुजारा

तीन संतानों और बुजुर्ग ससुर के साथ गुजर-बसर कर रही कमला कंवर को सरकार की ओर से सहायता के नाम केवल विधवा पेंशन और महिपाल की दिव्यांग पेंशन रुपए 2000 मिलती है। खेती की जमीन 8 बीघा जरूर है, मगर बुवाई-बिजाई व खाद के लिए उनके पास पैसा नहीं होने से खेती बेकार हो रही है। मनरेगा पर काम शुरू होने पर कभी-कभी मजदूरी से गुजारा होता है, लेकिन तब महिपाल को अकेला छोड़ना संभव नहीं होता, इसलिए अपने पिता देवीदान (67) को घर पर रखना पड़ता है। बड़ी बेटी सिया कंवर (19) दसवीं तक पढ़ाई करने के बाद आर्थिक तंगी के कारण आगे की पढ़ाई छोड़ चुकी है और अब सिलाई का काम कर मां का हाथ बंटा रही है। छोटा भाई अशोक दान (12) अभी पढ़ाई कर रहा है।

सरकार की ओर से कोई विभाग आगे नहीं आया

इस परिवार की इस हालत को देखते हुए गांव के ग्रामीणों ने कई बार प्रशासन व चिकित्सा विभाग को अवगत कराया, लेकिन आज तक किसी ने भी महिपाल के उपचार व परिवार की मदद के लिए कदम नहीं उठाया। सरकार चिरंजीव योजना सहित मुफ्त इलाज और योजनाओं के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन धरातल पर इस परिवार को उसका लाभ नहीं मिल पा रहा। कमला कंवर का कहना है कि ‘वह हर दिन महिपाल की सेवा करती है, मगर घर की आर्थिक स्थिति बहुत खराब है। यदि सरकार मदद नहीं करेगी तो आगे का गुजारा मुश्किल है।’ ग्रामवासियों ने सरकार व प्रशासन से परिवार को चयनित श्रेणी में शामिल कर विशेष सहायता और महिपाल का उपचार नि:शुल्क उपलब्ध कराने की मांग की है।

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Author: kalamkala

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