मन से ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, लोभ-लालच आदि दुर्गुणों को त्याग समाज का कार्य करें- डॉ. यायावर,
लाडनूं के आर्य समाज मंदिर में विशेष यज्ञ-सत्संग कार्यक्रम का आयोजन

लाडनूं (kalamkala.in)। यहां आर्य समाज मंदिर में साप्ताहिक यज्ञ-सत्संग कार्यक्रम का आयोजन प्रधान डॉ. जगदीश यायावर सैनी की अध्यक्षता में किया गया। डॉ. यायावर ने अपने अध्यक्षीय सम्बोधन में कहा कि ऋग्वेद के अंतिम सूक्त को संगठन सूक्त कहा जाता है। रविवार को हवन में इन मंत्रों की विशिष्ट आहुतियां दी गई। उन्होंने बताया कि यह मंत्र सभी आर्य सभासदों को चित्, मन और बुद्धि से एक होने, सबमें परस्पर प्रीतिपूर्ण व्यवहार होने और समान संकल्प के साथ ईश्वरीय कार्य के प्रति समर्पित रहने की भावना से प्रेरित करता है। उन्होंने आर्य समाज को अपने ध्येय ‘कृण्वंतो विश्वमार्यम’ के मार्ग पर निरंतर चलने का आह्वान किया तथा कहा कि आर्य समाज में सभी लोगों को अपने मन से ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, लोभ-लालच आदि दुर्गुणों को परित्याग करके समाज का काम करना चाहिए। यज्ञ के ब्रह्मा मुनिश्री ओमदास ने भजन प्रस्तुत करते हुए माता-पिता, गुरुजनों के प्रति आदर व सम्मान का भाव रखने, ईश्वर के प्रति अटूट श्रद्धा का विकास करने और आर्य समाज के नियमों का पालन करने की आवश्यकता बताई। यज्ञ में यजमान के रूप में सुरेन्द्र प्रताप आर्य ने आहुतियां दीं। इस अवसर पर मुनिश्री ओमदास, जगदीश यायावर, सुरेन्द्र प्रताप आर्य, बाबूलाल टाक, भोलाराम सांखला, राधा देवी दर्जी, भंवरदास स्वामी आदि उपस्थित रहे।







