संस्कृत रक्षा से ही संस्कृति, भारत राष्ट्र और भारतीयता की रक्षा संभव- आचार्य डॉ. हेमन्तकृष्ण मिश्र,
जसवंतगढ़ में छह दिवसीय पाणिनीय पौष्पी प्रक्रिया से संस्कृत व्याकरण प्रवेश शिविर का शुभारंभ
लाडनूं (kalamkala.in)। सेठ सूरजमल तापड़िया आचार्य संस्कृत महाविद्यालय जसवन्तगढ़ में आयोजित छह दिवसीय निःशुल्क आवासीय शिविर में श्रीरामकृष्ण भक्त संघ जोधपुर के माध्यम से पाणिनीय पौष्पी प्रक्रिया से संस्कृत व्याकरण का ज्ञान शिविरार्थियों को सरलता से सिखाया जा रहा है। देश के विभिन्न स्थानों से एकत्र 100 से अधिक अध्येता इस शिविर में संस्कृत-व्याकरण का ज्ञानार्जन कर रहे हैं।
संस्कृति व राष्ट्र की रक्षा के लिए संस्कृत की रक्षा है प्राथमिकता
शिविर के उद्घाटन सत्र में सेठ सूरजमल तापड़िया आचार्य संस्कृत महाविद्यालय जसवन्तगढ के प्राचार्य डॉ. हेमन्तकृष्ण मिश्र ने संस्कृत के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए कहा कि संस्कृत रक्षा से ही हमारी संस्कृति, भारत राष्ट्र और भारतीयता की रक्षा संभव है। हमें परिपूर्ण रूप से संस्कृत सीखना चाहिए और इसका व्यापक प्रचार-प्रसार करना चाहिए। संस्कृत केवल प्राचीनता को ही नहीं अर्वाचीन स्थिति व विज्ञान को भी सम्बल प्रदान करती है। संस्कृत पूर्ण वैज्ञानिक भाषा है। उन्होंने देश के विभिन्न भागों से आए हुए सभी शिविरार्थियों से शिविर का अधिकतम लाभ उठाने का आह्वान किया।
पाणिनीय पौष्पी प्रक्रिया से सिखाया जा रहा है संस्कृत व्याकरण
इस पाणिनीय पौष्पी प्रक्रिया से संस्कृत व्याकरण प्रवेश शिविर के प्रथम दिवस संस्कृत भाषा वैज्ञानिक स्वरूप, माहेश्वर सूत्र, प्रत्याहार, उच्चारण स्थान एवं प्रयत्न और अष्टाध्यायी सूत्र पाठ का आरम्भिक अध्यापन अभ्यास 8 सत्रों में कराया गया। शिविर में बताया गया कि भारतीय सनातन ज्ञान-विज्ञान परम्परा को मन्त्रदृष्टा ऋषियों ने अपने समाधि-अवस्था के अनुभवों के रूप भावानुभव को संरक्षित रखने वाली संस्कृत भाषा में निबद्ध कर सनातन शास्त्रों के रूप में प्रकट किया है। परन्तु, इन शास्त्रों का स्वयं अर्थ करने के लिए संस्कृत भाषा का व्याकरण का ज्ञान अनिवार्य है।
इनके द्वारा दी जा रही है संस्कृत व्याकरण के लिए अपनी सेवाएं
राष्ट्रपति सम्मान से सम्मानित छत्तीसगढ़ की राजधानी बिलासपुर की माताजी पुष्पा दीक्षित द्वारा पुनर्प्रतिष्ठित पाणिनीय क्रम की प्रक्रिया ने संस्कृत व्याकरण सीखना बहुत ही सरल और सुगम कर दिया है। शिविर में इन्हीं माताजी से प्रत्यक्ष सीखें उनके शिष्य अनिल दाधीच, संजय कुमार शर्मा, मनोज कुमार तंवर अध्यापन और अभ्यास करवाने की अपनी सेवाएं दे रहे है।







