मध्यपूर्व के देशों में चल रहे भीषण युद्ध को विराम दिलवाने के लिए जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय लाडनूं की पहल, अपने परिसर में प्रारंभिक आध्यात्मिक-कूटनीतिक संवादों की मेजबानी करने को तैयार
आचार्यश्री महाश्रमण के नैतिक मार्गदर्शन में मध्यपूर्व युद्ध की शांति के लिए जेवीबीआई घोषणा जारी, कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ ने यूएनओ सहित ईरान, इजरायल व अमेरिका के नेताओं को भेजे पत्र



लाडनूं (kalamkala.in)। अहिंसा एवं शांति को लेकर प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम और जनजागृति में लगे अपने आप में अहम् विश्वविद्यालय जैन विश्वभारती संस्थान लाडनूं ने अब मध्यपूर्व के देशों में चल रहे भीषण युद्ध को विराम दिलवाने के लिए पहल की है। यह पहल तेरापंथ धर्मसंघ के धर्म-प्रमुख युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण के मंतव्य के अनुरूप ‘जेवीबीआई घोषणा’ तैयार की जाकर की गई है। इस घोषणा और एक संलग्न पत्र को जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ ने संयुक्त राष्ट्र संघ और ईरान, इजरायल, अमेरिका के नेताओं व राष्ट्राध्यक्षों को भिजवाया है। इसमें उन्होंने आचार्य महाश्रमण के मार्गदर्शन में, जैन सिद्धांतों- अहिंसा और अनेकांतवाद के माध्यम से शत्रुता समाप्त करने और संघर्ष का समाधान करने के सम्बंध में आवश्यक अपील प्रस्तुत की है। उन्होंने लिखा है कि ईरान, इजराइल और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच होने वाले युद्ध से ऐसी भीषण तबाही होगी, जिससे उबरने में इस क्षेत्र को कई पीढ़ियां लग जाएंगी। हम जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय में आचार्य महाश्रमण के नैतिक मार्गदर्शन में, लाडनूं स्थित अपने परिसर में प्रारंभिक आध्यात्मिक-कूटनीतिक संवादों की मेजबानी करने या उन्हें सुगम बनाने के लिए तैयार हैं। लाडनूं एक ऐसा शहर है जो अहिंसा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के लिए जाना जाता है, और यदि ऐसी कोई निष्पक्ष जगह मददगार साबित होती है, तो हम सहर्ष सहयोग करेंगे। उन्होंने क्रोध पर विवेक की जीत होने और इन महान राष्ट्रों के नेताओं से शांति के मार्ग को चुनने की प्रार्थना की है।
शांति और युद्ध विराम के लिए प्रस्तुत किए सुझाव
अपने पत्र में कुलपति प्रो. दूगड़ ने लिखा है कि ‘जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय’ अहिंसा, अनेकांतवाद और अपरिग्रह के अध्ययन को समर्पित एक वैश्विक संस्था है। उसकी ओर से इस पत्र को अत्यंत गंभीरता और गहरे दुख के साथ लिखना बताते हुए उन्होंने ईरान, इजराइल और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच बढ़ती सैन्य टकराव से न केवल पश्चिम एशिया की स्थिरता के लिए खतरा हुआ है, बल्कि वैश्विक शांति की नींव भी खतरे में डाली जा रही है। कुलपति ने पत्र में अहिंसा को अपनाते हुए तत्काल और बिना शर्त युद्धविराम करने और कम से कम तीस दिनों की ‘शांति-अवधि’ घोषित कर सक्रिय युद्ध को रोके जाने, ‘अनेकांतवाद’ को अपनाते हुए अनेक सत्यों के प्रति सम्मान करने और एक ‘बहुपक्षीय सत्य और सुलह मंच’ बनाकर मध्यस्थता करने, तनाव कम करने के लिए तेहरान और यरुशलम के बीच एक सीधी और सुरक्षित हॉटलाइन से कोई निष्पक्ष पक्ष मध्यस्थता करते हुए शांति की ओर बढा जाए, नागरिकों की सुरक्षा का दयाभाव रखते हुए नागरिकों की जान का दुःखद नुकसान, अस्पतालों का विनाश और सांस्कृतिक स्थलों को निशाना बनाना तुरंत बंद कर दिया जाए। इसके साथ ही जैविभा विश्वविद्यालय ने सभी पक्षों से अपील की है कि वे अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानून का सख्ती से पालन करें। भोजन, पानी और चिकित्सा सहायता के लिए बिना किसी रुकावट के मानवीय गलियारे खोलने की अनुमति दें। ऊर्जा और नागरिक बुनियादी ढांचे पर हमला करने से बचें।
यह है जेवीबीआई घोषणा
युद्ध विराम एवं शांति स्थापनार्थ तैयार किए गए जेवीबीआई घोषणा को पत्र के साथ सभी संघर्षरत राज्याध्यक्षों एवं संयुक्त राष्ट्र संघ को भेजा गया है। इसमें लिखा गया है, ‘वर्तमान विश्व एक ऐसे ‘बहु-संकट’ के दौर से गुजर रहा है, जिसकी विशेषताएं हैं- तीव्र संघर्ष, अभूतपूर्व मानवीय विस्थापन, जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाला पर्यावरणीय क्षरण, आर्थिक दिवालियापन, साइबर और ड्रोन युद्ध, राजनीतिक अस्थिरताएं आदि। इसके परिणामस्वरूप विश्व-व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई है। फलस्वरूप, मानव सभ्यता अपने अस्तित्व के समक्ष एक गंभीर संकट का सामना कर रही है। इस परिदृश्य में, मानव विकास के विभिन्न पहलुओं में किए गए छोटे-मोटे समायोजन इस बहु-आयामी संकट का समाधान नहीं कर सकते। आज की सबसे बड़ी आवश्यकता एक ऐसी सुदृढ़ विचारधारा का अनुसरण करना है, जिसकी दार्शनिक और व्यावहारिक जड़ें गहरी हों, जिसमें अहिंसा और शांति के प्रति गहरी निष्ठा हो, और जो मानव सभ्यता के पोषण के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण रखती हो। इस संदर्भ में, जैन धर्म इस संकटग्रस्त विश्व को एक समग्र समाधान प्रदान करता हैं। क्योंकि, इसके दर्शन के मूल स्तंभ- अहिंसा, अनेकांतवाद और अपरिग्रह, सभी जीवों के प्रति सहानुभूति और सम्मान को प्रोत्साहित करके मानसिक शांति, पारिस्थितिक संतुलन और सौहार्दपूर्ण सह-अस्तित्व सुनिश्चित कर सकते हैं, तथा संघर्षों और पर्यावरणीय संकटों का समाधान प्रस्तुत कर सकते हैं। इसकी ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’ (जीवों का परस्पर उपकार ही जीवन है) की अवधारणा का तात्पर्य यह है कि दूसरों को चोट पहुुंचाना स्वयं को ही हानि पहुंचाना है। यह अवधारणा पारिस्थितिक संतुलन और संरक्षण को बढ़ावा देती है। इस अवधारणा को साकार करने हेतु इसके द्वारा किए जा रहे प्रयास, जैसे कि ‘विश्व शांति केंद्र, न्यू जर्सी’ जैसी संस्थाएं प्रशंसा की पात्र हैं। जैन धर्म इस बात पर जोर देता है कि सच्ची शांति की स्थापना हथियारों या बल-प्रयोग पर निर्भर रहने के बजाय, व्यक्तिगत आत्मा में सद्भावना जगाने और करुणा का अभ्यास करने से ही संभव है। इसलिए, मानवता के व्यापक हित में, युद्ध से बचें और भगवान महावीर के उपदेशों का अनुसरण करें।







