‘कलम कला’ खास: शख्सियत- राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उभरे शिक्षा और संस्कृति के आलोक स्तंभ,  लाडनूं के जैविभा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़

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‘कलम कला’ खास: शख्सियत-

राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उभरे शिक्षा और संस्कृति के आलोक स्तंभ, 

लाडनूं के जैविभा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़

आज आपको एक ऐसी शख्सियत से मिलवाते हैं, जिनका नाम देश-विदेश में शिक्षा, प्रशासनिक क्षमता और नैतिक मूल्यों की प्रतिथापना के लिए के लिए विख्यात हो चुका है। ये हैं लाडनूं के जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़। इनके नेतृत्व में जैन विश्वभारती संस्थान का नाम भी देश भर के शिक्षा जगत में चर्चित नाम बन चुका है। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी इस विश्वविद्यालय ने अपने झंडे गाड़े हैं। हाल ही में कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का सम्मान मिलने के बाद यह विश्वविद्यालय और कुलपति दोनों फिर से चर्चा में आए हंै। संयुक्त राष्ट्र की ‘इकोसॉक’ से सम्बद्ध इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ एजुकेटर्स वल्र्ड पीस द्वारा ‘एथिकल लीडरशिप एंड ह्यूमन वैल्यूज अवार्ड’ से सम्मानित किया गया है। कुलपति प्रो. दूगड़ को यह सम्मान उनके द्वारा नैतिक मूल्यों पर आधारित शिक्षा को बढ़ावा देने, मानवीय संवेदनाओं को केंद्र में रखकर अकादमिक वातावरण को सुदृढ़ करने तथा समाजोपयोगी शोध को प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जाने और उनके नेतृत्व में जैन विश्वभारती संस्थान द्वारा मूल्य-आधारित शिक्षा, सामाजिक उत्तरदायित्व और अकादमिक गुणवत्ता के क्षेत्र में विशिष्ट पहचान स्थापित किए जाने के लिए प्रदान किया गया है। इनके कार्यकाल में जैन विश्वभारती संस्थान आत्मनिर्भर बना है और यहां के कोर्पस फंड में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इससे संस्थान से जुड़े हुए सदस्यों को सुरक्षा मिली है। इससे पहले संस्थान अपनी मातृसंस्था जैन विश्व भारती और राजकीय अनुदानों पर निर्भर करता था। अब बिना किसी सरकारी अनुदान के भी विश्वविद्यालय का सुसंचालन संभव हो पाया है।

विश्वविद्यालय को अन्तर्राष्ट्रीय पहचान दिलवाई

कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ ने अपने दूरदर्शी नेतृत्व, गहन ज्ञान और शैक्षणिक उत्कृष्टता से जैन विश्वभारती संस्थान को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। कुलपति प्रो. दूगड़ के कुशल नेतृत्व में इस विश्वविद्यालय ने नई व्यवस्थाओं, नई परम्पराओं, नए इंफ्रास्ट्रक्चर, नए-नए पाठ्यक्रमों, नई रणनीति आदि का आगाज देखा है। उनकी कार्यशैली अकादमिक जगत में ही नहीं, बल्कि समूचे सांस्कृतिक और सामाजिक क्षेत्र में भी प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है। यही कारण है कि इन्हें देश-विदेश स्तर के सम्मानों से लगातार सुशोभित किया जाता रहा है। प्रो. दूगड़ को इससे पहले दुबई (यूनाईटेड अरब अमीरात) में ए.के.एस. एजुकेशन अवार्ड 2023 के समारोह में एक्सीलेंस लीडरशिप के लिए ‘ग्लोबल लीडर एचीवमेंट अवार्ड’ प्रदान किया गया था। इंडियन इंस्टीट्यूट आॅफ ओरियंटल हरिटेज, कोलकाता द्वारा आयोजित 43वें वार्षिक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मलेन में प्रो. दूगड़ को पूर्व उपराष्ट्रपति और पं. बंगाल के तत्कालीन राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने ‘विश्वकवि रबीन्द्रनाथ टैगोर मेमोरियल अवार्ड’ से नवाजा था, जो उन्हें उनकी उत्कृष्ट विद्वत्ता एवं प्राच्य विद्याओं के क्षेत्र में अध्ययन, शोध एवं विकास को संरक्षण, भारतीय संस्कृति के प्रसार एवं प्राचीन भारतीय ज्ञान को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुति के प्रयासों के लिये प्रदान किया गया। सन् 2017 में उन्हें डा. राधाकृष्णन् एक्सीलेंसी अवार्ड प्रदान करके सम्मानित किया गया। जैन समाज द्वारा भी उनका सम्मान किया जा चुका। चैन्नई में अप्रैल 2022 को श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा ट्रस्ट बोर्ड साहुकारपेट चैन्नई द्वारा प्रो. बच्छराज दूगड़ का सम्मान उत्तरीय पहनाकर व स्मृति चिह्न प्रदान कर किया गया, जिसमें चैन्नई का वृहद् जैन समाज एकत्रित रहा।

विश्वविद्यालय के विकास के लिए किए अतुलनीय कार्य  

देश-विदेश में मिले सारे सम्मान उनकी नेतृत्व क्षमता, कार्य क्षमता, दूरदर्शिता, सादगी और विनम्रता के कारण प्राप्त हुए हैं। उनकी प्रशासनिक क्षमता और जैन दर्शन व अहिंसा तथा नैतिक मूल्यों के प्रति उनकी गहन आस्था एवं धर्मसंघ के प्रति समर्पण भाव के कारण उन्हें लगातार दूसरी बार जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय के कुलपति पद का भार मिला, जो इस संस्थान में अभूतपूर्व था। उनके कार्यकाल में जैविभा संस्थान के विकास के लिए अतुलनीय कार्य किए गए। उन्होंने जैन दर्शन व अहिंसा के सिद्धांतों को शिक्षा में समावेश करने के साथ मूल्य आधारित शिक्षा को आधुनिक पाठ्यक्रमों में समाहित करवाया। संस्कृति और मूल्य आधारित शिक्षा पर इन्होंने सदैव जोर दिया और विश्वविद्यालय को लगातार उसी अनुरूप ढाला है। वे परम्परा और आधुनिकता के बीच संतुलन स्थापित करने वाले दूरदर्शी नेता माने जाते हैं। अपनी दूरदर्शी नेतृत्व क्षमता के कारण ही उन्होंने संस्थान को आधुनिक शिक्षा पद्धतियों से जोड़ते हुए परम्परा और संस्कृति का संतुलन बनाए रखा। उनके नेतृत्व में विश्वविद्यालय में ओपन एंड डिस्टेंस लर्निंग और ऑनलाइन शिक्षा को सुदृढ़ किया गया। आॅनलाईन कक्षाओं के लिए संस्थान में लर्निंग मैनेजमेंट सिस्टम (एलएमएस) की शुरूआत की गई है। इस सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म के द्वारा सभी शैक्षणिक कार्यक्रमों, पाठ्यक्रमों और शिक्षण सामग्री को बनाने, वितरित करने, प्रबंधित करने, ट्रैक करने और रिपोर्ट करने के लिए उपयोग किया जा सकता है। इसके द्वारा सामग्री वितरण और उपयोगकर्ता के नामांकन से लेकर प्रगति निगरानी और मूल्यांकन तक संपूर्ण शिक्षण प्रक्रिया को केंद्रीकृत करता है, और ऑनलाइन (ई-लर्निंग) और मिश्रित शिक्षण दोनों वातावरणों का समर्थन करता है। यहां ईआरपी सिस्टम भी स्थापित किया गया, जो केन्द्रीकृत डेटाबेस और एकीकृत प्रणालियों आदि द्वारा संस्थान को डिजीटली रूप से मजबूती प्रदान करता है। कुलपति प्रो. दूगड़ संकल्पपूर्वक जैन विश्वभारती संस्थान और परिसर को एक ‘विज्डम सिटी’ के रूप में विकसित करने के आचार्य तुलसी एवं आचार्य महाप्रज्ञ के स्वप्न को पूर्ण करने की तरफ निरन्तर बढ रहे हैं। विश्वविद्यालय को आधुनिकतम स्वरूप देते हुए समस्त भौतिक संसाधनों में अपूर्व वृद्धि और विस्तार विकास के प्रत्यक्ष स्वरूप हैं, वहीं विद्यार्थियों की संख्या में सर्वाधिक बढोतरी, शैक्षणिक व गैर शैक्षणिक स्टाफ में वृद्धि, उनकी सुविधाओं और वेतनवृद्धि करते हुए गुणात्मक क्षमता में वृद्धि आदि भी प्रो. दूगड़ की ही देन है। इन्होंने 30 अप्रेल 2016 से पहली बार कुलपति का पदभार संभाला था और तब से अनवरत कुलपति पद पर सेवारत हैं। इनके लगातार दो कुलपतित्व कार्यकाल में आचार्य श्री महाप्रज्ञ नेचुरोपैथी एंड योग मेडिकल काॅलेज एंड होस्पिीटल की स्थापना और नेचुरोपैथी एवं योग थैरेपी में बी.एन.वाई.एस. का साढे पांच वर्षीय नवीन पाठ्यक्रम प्रारम्भ करना, प्राकृत एवं संस्कृत भाषा के संवर्द्धन एवं प्रसार में बेहतरीन कार्य हुआ, वहीं राजस्थानी भाषा के लिए अलग से विभाग की स्थापना की जाकर विभिन्न सर्टिफिकेट कोर्स से लेकर बी.ए. एवं एम.ए. तक के पाठ्यक्रमों को प्रारम्भ किया गया।

सर्वाधिक दीर्घकाल से जुड़े रहे हैं विश्वविद्यालय से

लाडनूं के जैन विश्वभारती संस्थान (मान्य विश्वविद्यालय) ने पिछले करीब दस सालों से जितनी ऊंचाइयां छुईं हैं, वह अभूतपूर्व हैं। पूरे देश और विश्व भर में इस विश्वविद्यालय ने सम्पूर्ण जैन समाज और लाडनूं क्षेत्र का नाम रोशन किया है। यह देन कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ की ही रही है। कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ अहिंसा, शांति और कलह-शमन के क्षेत्र में भारत के प्रख्यात विद्वान् हैं और आचार्य महाप्रज्ञ प्रणीत अहिंसा प्रशिक्षण प्रविधि के भी विशेषज्ञ हैं। प्रो. दूगड़ प्रेक्षाध्यान के प्रशिक्षित प्रशिक्षक रह चुके हैं। अहिंसा-प्रशिक्षण, ग्रामीण-विकास, सापेक्ष-अर्थशास्त्र जैसी आचार्यगण की देन को प्रसारित करने में भी ये सदैव अग्रणी रहे हैं। इसीसे अपने 38 वर्षों से अधिक के शैक्षणिक अनुभव के कारण उन्होंने बड़ी संख्या में शोधार्थियों को मार्गदर्शन प्रदान किया। तेरापंथ समाज के प्रायः मुनियों ने इनके ही मार्गदर्शन में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है। प्रो. बच्छराज दूगड़ पहले ऐसे कुलपति हैं, जो विश्वविद्यालय के प्रारम्भ से लेकर लगातार इससे जुड़े रहे हैं। इस विश्वविद्यालय की स्थापना से लेकर लगातार सेवारत रहने से इनका अनुभव विशाल रहा, जिसका पूरा उपयोग विश्वविद्यालय को मिल रहा है। जैन विश्वभारती संस्थान में सबसे पहला शिक्षक होने का सौभाग्य भी इनका रहा। ये संस्थान के नींव के पत्थर के रूप में रहे। संस्थान की स्थापना सम्बंधी प्रक्रिया इनके हाथों से ही सम्पन्न हुई थी। जैन विश्वभारती संस्थान में कुलपति बनने से पूर्व वे इसी संस्थान में अहिंसा एवं शाति विभाग में विभागाध्यक्ष रह चुके तथा संस्थान में कुलसचिव, परीक्षा-नियंत्रक, संकायाध्यक्ष, शोध-निदेशक के रूप में अपनी सेवाएं लगातार देते रहे हैं। प्रो. दूगड़ विभिन्न विश्वविद्यालयों की अकादमिक काउन्सिल, सीनेट, चयन-समिति आदि के सदस्य भी रहे हैं। राष्ट्रीय मूल्यंाकन एवं प्रत्यायन समिति की पीयर टीम के चेयरमैन के रूप में इन्होंने अनेक महाविद्यालयों-विश्वविद्यालयों के निरीक्षण का कार्य भी किया है। विशेष बात यह है कि प्रो. दूगड़ आचार्य तुलसी, आचार्य महाप्रज्ञ एवं आचार्य महाश्रमण, तीनों ही आचार्यों के विश्वस्त एवं निकटतम रहे हैं। तीनों ही आचार्यों ने इनके जैन विश्वभारती स्थित आवास पर पधार कर इन्हें व्यक्तिगत एवं पारिवारिक सेवा का शुभावसर भी प्रदान किया है।

विश्वविद्यालय को लगातार हर क्षेत्र में नवीनता मिली

प्रो. दूगड़ संस्थान के विकास और उत्थान के लिए सतत प्रयत्नशील रहे हैं। कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ के कुशल नेतृत्व में इस विश्वविद्यालय ने नई व्यवस्थाएं, नई परम्पराएं, नया इन्फ्रास्ट्रक्चर, नए पाठ्यक्रम, नई रणनीति आदि का आगाज देखा। सर्वाधिक परीक्षाएं और बेहतरीन परीक्षा परिणाम भी इनके कार्यकाल की विशेषता रही है। संस्थान में शैक्षणिक एवं शिक्षणेत्तर कार्मिकों की सर्वाधिक नियुक्तियां और पदोन्नतियां इनके हाथों ही हुई हैं। कार्मिकों की वेतन-वृद्धियां करने में भी इन्होंने कभी कोई कमी नहीं रखी। सातवां वेतन आयोग इन्होंने ही विश्वविद्यालय में लागू करवाया। विश्वविद्यालय की जमीन का भूरूपांतरण इनके प्रयासों से हो पाया। विश्वविद्यालय के लिए नई आवासीय भूमि का क्रय आदि के कार्य भी उल्लेखनीय हैं। संस्थान के भवनों का निर्माण, इन्फ्रास्ट्रक्चर कार्य और पुनरोद्धार कार्य भी इनके द्वारा ही सम्पन्न करवाए गए और विश्वविद्यालय को एक वैश्विक स्तर का स्वरूप प्रदान किया गया। आॅडिटोरियम, कुलपति कक्ष और सेमिनार हाॅल सहित सम्पूर्ण विश्वविद्यालय परिसर आधुनिक सुविधाओं से सम्पन्न और न्यू-लुक में तैयार करवाने एवं सम्पूर्ण वातानुकूलित करवाने के साथ समस्त कर्मचारियों के लिए नवीन कार्यस्थल और रहवास व्यवस्था सराहनीय बनाकर उन्होंने अपनी छवि सर्वहितैषी की निर्मित की है। इन्होंने संस्थानिक नियमों की स्पष्टता एवं पारदर्शिता हेतु 20 नवीन नीतियों एवं नियमावलियों का निर्माण करवा कर प्रशासन को आसान बनाया। इनमें एमेरिटस प्रोफेसरों के लिए दिशानिर्देश, जैविभा रिसर्च प्रोजेक्ट्स के लिए दिशानिर्देश, शिकायत नियम, बौद्धिक संपदा अधिकार नीति, परामर्श नीति, ई-गवर्नेंस नीति, फैकल्टी सीड ग्रांट नीति, अभिनव अनुसंधान पुरस्कार नीति, साहित्यिक चोरी नीति, रखरखाव नीति, शैक्षणिक विकास के लिए फैकल्टी को वित्तीय सहायता के लिए नीति, अनुसंधान संवर्धन नीति, सूचना प्रौद्योगिकी नीति, शिकायत निवारण नीति, यौन उत्पीड़न की रोकथाम के लिए महिला शिकायत निवारण नीति, शैक्षणिक अखंडता और नैतिकता नीति, छात्रवृत्ति और फ्रीशिप नीति, परीक्षा नीति, आचार संहिता नीति, भवन रखरखाव के लिए एसओपी, परिवहन रखरखाव के लिए एसओपी, उपकरण रखरखाव के लिए एसओपी, विद्युत रखरखाव के लिए एसओपी, पुस्तकालय के लिए एसओपी, खेल सुविधाओं के लिए एसओपी प्रमुख हैं। इन्होंने ही संस्थान के (मैमोरेंडम आॅफ एसोसिएशन) एमओयू का पंजीयन करवा कर सस्थान को कानूनी मजबूती प्रदान की।

उद्देश्यों और नीतियों का सफलता के साथ क्रियान्वयन 

जैन विश्वभारती संस्थान अपने उद्देश्यों और नीतियों का क्रियान्वयन सफलता के साथ सतत् कर रहा है। प्रो. दूगड़ के नेतृत्व में संस्थान के कार्यक्रमों में अनेकांत एवं अहिंसा तथा मानवता के लिये शांतिपूर्ण सहअस्तित्व एवं सहिष्णुता पर बल दिया जाने के साथ ही श्रमणिक संस्कृति के उच्च आदर्शों को बढावा देने तथा मानव जाति के लिये सही आचरण व ज्ञान के प्रसार पर पूरा जोर दिया जा रहा है। संस्थान प्राकृत भाषा और साहित्य, पाली, संस्कृत, अपभ्रंश, जैनोलॉजी एवं तुलनात्मक धर्म व दर्शन के अध्ययन, ज्योतिष, मन्त्रविद्या, अवधानविद्या, योग और साधना, आयुर्वेद, नेचुरोपैथी, रंग थेरेपी, चुंबक थैरेपी, जीवन विज्ञान और प्रेक्षा ध्यान के क्षेत्र में ज्ञान के अनुसंधान और प्रगति में लगा हुआ है। इस प्रकार संस्थान नई शिक्षा नीति में भारतीय संस्कृति के उन्नयन के उद्देश्य को पूरा करने में पुरजोर लगा हुआ है। ग्रामीण राजस्थान के गरीबी से छुटकारा दिलवाने और पिछड़े क्षेत्र की शैक्षिक आवश्यकताओं को पूरा करने का महती कार्य भी संस्थान कर रहा है। सामाजिक सद्भावना, महिला साक्षरता, वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति को लोकप्रिय बनाने और विशेष रूप से योग विज्ञान और ध्यान में भी संस्थान ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। संस्थान में छात्रों के लिये बुनियादी सुविधायें, उत्कृष्ट केंद्रीय पुस्तकालय और रिप्रोग्राफिक सुविधाएं, केंद्रीकृत और विभागीय कंप्यूटर प्रयोगशालाएं, उच्च शोध और गुणवत्तायुक्त अनुसंधान, प्रकाशन, उत्कृष्ट प्लेसमेंट रिकार्ड, कुशल दूरस्थ शिक्षा का संचालन, पिछड़े क्षेत्र के सामाजिक दृष्टि से वंचित वर्ग की लड़कियों की शैक्षिक आवश्यकताओं को पूरा करने और आसपास के करीब आधे दर्जन पास के गांवों में कुशलता से संगठित विस्तार सेवाओं की पूर्ति कर रहा है।

पांडुलिपि संरक्षण का महत्वपूर्ण कार्य

यह कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ की ही उपलब्धि कही जाएगी कि विश्वविद्यालय के केन्द्रीय पुस्तकालय में रखी पाण्डुलिपियों के दीर्घकालिक संरक्षण हेतु ‘पाण्डुलिपि संरक्षण केन्द्र’ की स्थापना की गई। भारत सरकार के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्रालय के अन्तर्गत संचालित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के अन्तर्गत संस्थान को मैन्युस्क्रिप्ट रिसोर्स सेंटर (एमआरसी) परियोजना स्वीकृत की गई थी और स्टाफ को पांडुलिपि संरक्षण सम्बंधी प्रशिक्षण भी प्रदान किया गया। संस्थान एवं IGNCA के मध्य इस हेतु एमओयू भी हो चुका है। नेशनल मेन्युस्क्रिप्ट मिशन के आर्थिक सहयोग से संस्था और आसपास के क्षेत्र से पांडुलिपियों के संग्रहण एवं संरक्षण हेतु ‘पाण्डुलिपि संरक्षण केन्द्र’ द्वारा महत्वपूर्ण कार्य किया जा रहा है। यहां अब तक 2000 से अधिक पांडुलिपियों को संरक्षित किया जा चुका है।

विश्वविद्यालय में नवीन विभागों और कोर्सों का संचालन

जैन विश्वभारती संस्थान में अनेक लघु अवधि पाठ्यक्रम और नवीन विभागव व नए पाठ्यक्रमों का संचालन भी प्रो. दूगड़ के नेतृत्व में किया गया, इनमें (1) जैन जीवनशैली, (2) जैन पर्यावरण विज्ञान, (3) जैन ज्योतिष, (4) जैन प्रबन्धन, (5) जैन आहार विज्ञान, (6) पाण्डुलिपि विज्ञान, (7) जैन मनोविज्ञान, (8) जैन कलह-प्रबन्धन प्रमुख हैं तथा कुछ अन्य स्वीकृत पाठ्यक्रमों में जैन शिल्प, जैन वास्तु, जैन कला, जैन शिक्षा, जैन ब्रह्माण्ड विज्ञान, जैन गणित को भी संचालित किए जाने तय किए गए। यहां 15 से अधिक नवीन अल्पकालिक एवं आॅनलाईन प्रमाण-पत्र पाठ्यक्रमों को प्रारम्भ कर उनका संचालन निरन्तर किया जा रहा है।
इनके अलावा विश्वविद्यालय में नेचुरोपैथी विभाग की स्थापना की जाने के बाद यहां ‘योग एवं नेचुरोपैथी’ का नियमित एवं ‘आहार शास्त्र’ का आॅनलाईन प्रमाण पत्र पाठ्यक्रम प्रारम्भ किया गया। यहां ज्योतिष व वास्तु शास्त्र में भी पाठ्यक्रमों की शुरूआत की जा चुकी है। जैन विद्या विभाग में ‘प्राकृत का सामान्य बोध’, टैरो रीडिंग तथा ‘संस्कृत एवं प्राकृत’ (लेवल सैकेंड) के नवीन आॅनलाईन पाठ्यक्रम प्रारम्भ किए गए। जैन विद्या विभाग तथा अहिंसा एवं शांति विभाग के विभिन्न आॅनलाईन पाठ्यक्रम प्रारम्भ करने के लिए आॅनलाईन पाठ्य-सामग्री तैयार की जा रही है। शारीरिक शिक्षक प्रशिक्षण के लिए नवीन नियमित कार्यक्रम (बी.पी.एड. एवं एम.पी.एड.) प्रारम्भ किए जाने के लिए राजस्थान सरकार को आवेदन किया गया है। आगामी सत्र 2023-24 में नियमित एवं दूरस्थ शिक्षा के विद्यार्थियों को आॅनलाईन माध्यम से प्रवेश की सुविधा प्रदान करने के लिए आॅनलाईन पोर्टल का निर्माण कार्य पूर्ण किया गया एवं आॅनलाईन माध्यम से प्रवेश प्रक्रिया प्रारम्भ की जा चुकी है। संस्थान की विद्या-परिषद् की बैठक में प्राप्त नवीन पाठ्यक्रमों को प्रारम्भ किये जाने के सुझावों में 5 वर्षीय एल.एल.बी. (इंटीग्रेटेड लाॅ कोर्स), कोर्स इन फिजियोथैरेपी, बी.एड. इन स्पेशन एजुकेशन (टू टीच चिल्ड्रन विथ डिसएबिलिटीज) तथा नर्सिंग कोर्स शामिल हैं।
संस्थान के शुरू किए जा चुके नए विभागों में मातृभाषा राजस्थानी के प्रोत्साहन, संरक्षण एवं प्रचार-प्रसार को बढावा देने के लिए तथा राजस्थानी साहित्य व संस्कृति के संरक्षण के उद्देश्य से विश्वविद्यालय में ‘‘राजस्थानी भाषा एवं संस्कृति केन्द्र’’ की स्थापना की गई। शास्त्रीय क्लासिकल संगीत को महत्व देने के लिए यहां संगीत सम्बंधी साधना, शोध और शिक्षण के लिए संगीत विभाग की स्थापना की गई है। योग एवं जीवन विज्ञान विभाग का संचालन यहां पहले ही है और अब यहां प्राकृतिक चिकित्सा का नया विभाग भी शुरू किया गया है।

हर परीक्षण में खरा उतरा विश्वविद्यालय

प्रो. दूगड़ के कुलपतित्व काल में सबसे अधिक बार विश्वविद्यालय के मूल्यांकन के अवसर आए और इनके नेतृत्व में हर बार ़हर मूल्यांकन में पूरी सफलता मिल पाई। इन सभी निरीक्षण-परीक्षण के लिए विश्वविद्यालय पहुंची टीमों द्वारा सूक्ष्मता से अवलोकन व परीक्षण किए जाने के बाद सदैव अपनी रिपोर्टों को विश्वविद्यालय के पक्ष में सकारात्मक रूप से प्रस्तुत किया गया। राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद् (नैक) की 12-बी टीम ने संस्थान को 12-बी की सुविधा प्रदान की। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की टीमों का कई बार आना हुआ। नैक ने निरीक्षण के उपरांत संस्थान को ‘ए’ ग्रेड प्रदान की, जो अपने आप में संस्थान के लिए विशेष है। विभिन्न सरकारी वित्तीय अनुदानों की प्राप्ति हेतु यह 12ठ का दर्जा आवश्यक है, जो संस्थान को यूजीसी से प्राप्त हुआ। इनके कार्यकाल के दौरान भारत सरकार की विभिन्न संस्थाओं के सफल मूल्यांकन आयोजित हुए, जिनमें UGC-Review (Jan. 19-21, 2017), UGC-12B (March 12-14, 2018), UGC-ODL (Aug. 9-10, 2018) ,oa NAAC (April 11-13, 2019; Oct. 23-25, 2021) शामिल हैं।

पुरस्कार प्राप्ति के साथ श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में हुआ चयन

कुलपति प्रो. दूगड़ के कार्यकाल के दौरान विश्वविद्यालय को विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय व राष्ट्रीय सम्मान व उपलब्धियां प्राप्त हुए इनमे यहां के पाठ्यक्रम संबंधी पहलुओं में उत्कृष्टता को ध्यान में रखते हुए जैन विश्वभारती संस्थान को दुबई में 2022-23 में ‘ग्लोबल एजुकेशन अवार्ड प्रदान करते हुए ‘बेस्ट डीम्ड यूनिविर्सटी- एक्सेलेंस इन कुरीकुलर एस्पेक्ट्स’ के रूप में 30 अप्र्रेल 2023 को घोषित किया गया। ‘एजुकेशन स्टारवार्ट्स’ की ओर से जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय को ‘इंडियाज 10 बेस्ट यूनिवर्सिटीज टू वाच इन 2021’ में सम्मिलित किया गया है। वल्र्ड फेडरेशन आॅफ एकेडमिक एण्ड एजूकेशनल इंस्टीट्यूट द्वारा यह ‘बेस्ट इन क्लास यूनिवर्सिटी’ अवार्ड जैन विश्वभारती संस्थान को मुम्बई में विश्व मानव संसाधन विकास सम्मेलन, 2020 (28वीं वल्र्ड एचआरडी कांग्रेस) में ईटी नाउ, व कैनेडियन यूनिवर्सिटी दुबई के संयुक्त तत्वावधान में दिया गया। जैन विश्वभारती संस्थान को राजस्थान में दर्शन विषय के उन्नयन के लिए 2018 का ‘प्रो. श्रीप्रकाश दुबे राष्ट्रीय दर्शन पुरस्कार’ प्रदान करके सम्मान किया गया। शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने वाले संस्थानों की समीक्षा करने वाली विश्वप्रसिद्ध पत्रिका ‘‘दी नाॅलेज रिव्यू मैगजीन’’ द्वारा जैन विश्व भारती संस्थान मान्य विश्वविद्यालय को देश के सबसे प्रशंसित 20 विश्वविद्यालयों की वार्षिक समीक्षा सूचि में वर्ष 2017 के लिये चुना गया है। ‘बेस्ट डीम्ड यूनिवर्सिटी इन राजस्थान’ का अवार्ड जैन विश्वभारती संस्थान को ‘वल्र्ड वाइड एचीवर्स’ संस्था की ओर से ‘एशिया एजुकेशन समिट एंड अवार्ड्स 2016 के तहत प्रदान किया गया। जैन विश्वभारती संस्थान (मान्य विश्वविद्यालय) को लगातार तीन आई.एस.ओ. के मानक प्रमाण पत्र प्राप्त हुए। पर्यावरण प्रबंधन तंत्र के क्षेत्र, व्यावसायिक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा प्रबंधन के क्षेत्र में उच्च मानदंडों की अनुपालना के आधार पर और लगातार गुणवता, प्रबंधन, स्वास्थ्य, सुरक्षा, पर्यावरण आदि विभिन्न क्षेत्रों में विशेष सजगता एवं जागरूकता के साथ उच्च मानकों को स्थापित किया जरनं पर भी आईएसओ सर्टिफिकेशन किया गया है।

विश्व रिकाॅर्ड, राष्ट्रपति पुरस्कार और राष्ट्रीय-अन्र्राष्ट्रीय पैटेंट की उपलब्धियां

कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ के नेतृत्व में संस्थान के करीब 20 विद्यार्थियों ने विश्व रिकाॅर्ड बनकर कीर्तिमान कायम किया है। इनमें योग एवं जीवन विज्ञान विभाग और दूरस्थ शिक्षा निदेशालय के एम.ए. योग एवं जीवन विज्ञान के विद्यार्थी शामिल हैं। यहां के अनेक विद्यार्थियों ने राष्ट्रीय एवं अन्तर्राज्यीय प्रतियोगिताओं में स्वर्ण एवं रजत पदक प्राप्त किये हैं। इनके प्रोत्साहन व मार्गदर्शन स्वरूप इनके कार्यकाल के दौरान संस्थान के 4 प्राध्यापकों को राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। सभी संकायों के सदस्यों को निरन्तर प्रोत्साहन और प्रेरणा देते रहने और उन्हें आगे बढने की सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाने के कारण रहा कि यहां के स्टाफ ने विभिन्न खोज और आविष्कार किए और उनका पैटेंट भी राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर करवाने में सफल रहे। इनमें अहिंसा प्रशिक्षण प्रणाली को पैटेंट मिलना, ‘एआई पर्यावरण मोनिटरिंग’ को अन्तर्राष्ट्रीय पेटेंट हासिल होना, आविष्कृत डिजीटल शिक्षा उपकरण एवं सीखने को मापने की तकनीक का पेटेंट, ‘छात्रों के सीखने के परिणामों पर प्रौद्योगिकी एकीकरण के प्रभाव को मापने के लिए एक प्रणाली और विधि’ का पेटेंट आदि शामिल हैं।

देश-विदेश के विश्वविद्यालयों के साथ एम.ओ.यू.

बच्छराज जी दूगड़ के कुलपतित्व काल में जैन विश्वभारती संस्थान ने निरन्तर प्रगति देखी है। इसका वैश्विक स्वरूप निखर कर सामने आया है। इनके कार्यकाल में विभिन्न विश्वस्तर के शिक्षण संस्थानों, विश्वविद्यालयों से अनेक पहलुओं को लेकर एमओयू होना काफी महत्वपूर्ण रहा है। Florida International University, Miami, USA के साथ नवीन अन्तर्राष्ट्रीय MoU, Ghent University बेल्जियम से Student Exchange प्रोग्राम के अन्तर्गत एक विद्यार्थी (Joanna Flynn) के संस्थान के जैनविद्या विभाग में अध्ययन हेतु प्रवेश का एमओयू, टैक्सास युनिवर्सिटी के साथ भी जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय का MoU किया गया है।
ऽ नेपाल व भूटान के विभिन्न विश्वविद्यालयों के साथ MoU, पांडुलिपि संरक्षण केन्द्र के लिए केन्द्र सरकार के प्ळछब्। एवं संस्थान के मध्य एमओयू, आचार्य महाप्रज्ञ मेडिकल काॅलेज, होस्पिटल एवं नेचुरोपैथी रिसर्च सेंटर और राजस्थान सरकार के आयुष विभाग के बीच नेचुरोपैथी चिकित्सा सुविधा और उसके विकास के लिए 50 करोड़ रूपयों का परस्पर समझौता करार ( MoU) किया गया है।
kalamkala
Author: kalamkala

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