भाग्य की चिंता छोड़ निरन्तर पुरुषार्थवाद का प्रयास करें- आचार्यश्री महाश्रमण, नियमित प्रवचनों के अन्तर्गत ‘संयम में पराक्रम’ विषय को व्याख्यायित करते हुए दिया उपदेश

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भाग्य की चिंता छोड़ निरन्तर पुरुषार्थवाद का प्रयास करें- आचार्यश्री महाश्रमण,

नियमित प्रवचनों के अन्तर्गत ‘संयम में पराक्रम’ विषय को व्याख्यायित करते हुए दिया उपदेश

लाडनूं (kalamkala.in)। तेरापंथ धर्मसंघ के अधिशास्ता आचार्य महाश्रमण ने शनिवार को जैन विश्व भारती परिसर स्थित सुधर्मा सभा में ‘संयम में पराक्रम’ विषय पर अपने व्याख्यान में कहा कि चार चीजें दुर्लभ बताई गई हैं। मनुष्य जन्म, धर्म का श्रवण, श्रद्धा और वीर्य दुर्लभ है। श्रद्धा को परम दुर्लभ कहा गया है, क्योंकि जब तक श्रद्धा नहीं होती, तब तक वीर्यपूर्वक पराक्रम संभव नहीं हो सकता। श्रद्धा होने पर वीर्य उतना दुर्लभ नहीं होता। उन्होंने कहा कि आदमी को संयम में पुरुषार्थ करने का प्रयास करना चाहिए। भाग्यवाद और पुरुषार्थवाद ये दोनों बातें जानने का प्रयास आदमी को करना चाहिए। श्लोककार ने बताया कि केवल भाग्य और केवल पुरुषार्थ पर नहीं टिकना चाहिए। अच्छा आदमी भाग्य और पुरुषार्थ दोनों को जानने वाला और दोनों पर ध्यान देने वाला होता है। जीवन में आदमी को यथावसर भाग्यवाद और पुरुषार्थवाद को भी काम में लेना चाहिए। भाग्यवाद ज्ञातव्य है और पुरुषार्थवाद कर्त्तव्य का पथ है। उन्होंने चारित्रात्माओं को परामर्श देते हुए कहा कि ज्योतिष आदि में ज्यादा समय लगाने से बचने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा, भाग्यवाद को जान लेना चाहिए और उसका यथावसर उपयोग करना चाहिए, किन्तु पुरुषार्थवाद को छोड़़ना नहीं चाहिए। भाग्यवाद की सीमा होती है, तो पुरुषार्थवाद की सीमा भी होती है। पारणामिक भाव को कोई बदलने वाला नहीं हो सकता। आदमी को अपने जीवन में यथासंभव पुरुषार्थ करने का प्रयास करना चाहिए। संयम के क्षेत्र में यथासंभव पुरुषार्थ किया जा सकता है। जहां तक उसकी सीमा हो, वहां तक पुरुषार्थ किया जा सकता है। भाग्य की चिंता करना नहीं और पुरुषार्थवाद को निरंतर करते रहने का प्रयास होना चाहिए। कहा भी गया है कि जो उद्योगी, पुरुषार्थी होता है, मानो लक्ष्मी स्वयं उसका वरण करती हैं। अध्यात्म, संयम व तप में यथासंभव पराक्रम करते रहने का प्रयास करना चाहिए।

हर परिस्थिति में शांत और तनावमुक्त रहें

आचार्य श्री महाश्रमण ने कहा कि जीवन में कई परिस्थितियां आ सकती हैं, कठिनाई आ सकती है, मुश्किल समय आ सकता है, उसमें आदमी को ज्यादा तनाव और अशांत होने से बचना चाहिए। कभी चोट लग जाए, शारीरिक पीड़ा हो जाए तो भी आदमी को शांत भाव रखने का प्रयास करना चाहिए और आदमी को आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। जीवन में कभी असफलता आए तो उस असफलता से सबक सीखकर आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए और संभव हो सकता है कि आगे सफलता भी मिल सकती है। प्रवचन सभा में साध्वीश्री संबुद्धयशा ने अपनी जिज्ञासा प्रस्तुत की, तो आचार्यश्री महाश्रमण ने उसे समाहित किया।

जैन विद्या पाठ्यक्रम की पुस्तकों का विमोचन

जैन विश्व भारती स्थित समण संस्कृति संकाय के अंतर्गत जैन विद्या पाठ्यक्रम भाग- एक से चार भाग की नवीन पुस्तकों का शनिवार को आचार्यश्री महाश्रमण के समक्ष लोकार्पित किया गया। आचार्यश्री ने इस संदर्भ में मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। जैन विश्व भारती के अध्यक्ष अमरचंद लूंकड़, समण संस्कृति संकाय की ओर से मालचंद बैंगानी व हनुमान लूंकड़ ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने इस संदर्भ में मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। दिल्ली ज्ञानशाला की प्रशिक्षिकाओं ने गीत का संगान किया।

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Author: kalamkala

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