अध्यात्म का सुगम प्रयोग है जप, श्वास-श्वास के साथ होता रहे जप- आचार्यश्री महाश्रमण

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भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा का वर्णन


छापर (चूरू)। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण के सान्निध्य में सोमवार को उनके छापर प्रवास स्थल में पर्युषण महापर्व का छठा दिवस जप दिवस के रूप में समायोजित हुआ। नित्य की भांति प्रातः नौ बजे आचार्यश्री महाश्रमण के नमस्कार महामंत्र से कार्यक्रम के पश्चात मुनि नम्रकुमार ने तीर्थंकर अरिष्टनेमि के जीवन का वर्णन किया। साध्वीवर्या साध्वी सम्बुद्धयशा ने त्याग-तप धर्म पर आधारित गीत का संगान किया। मुख्यमुनिश्री महावीरकुमारजी ने त्याग और तप, धर्म को व्याख्यायित किया। साध्वी जयंतमाला ने ‘जप दिवस’ के संदर्भ में गीत का संगान किया। साध्वीप्रमुखा साध्वी विश्रुतविभा ने ‘जप दिवस’ के अवसर पर श्रद्धालुओं को जप के मंत्र का शुद्ध उच्चारण करने हेतु उत्प्रेरित किया।
सिद्ध साधक आचार्यश्री महाश्रमण ने ‘भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा’ के मंगल व्याख्यान के उपरान्त पर्युषण आराधना के छठे दिवस ‘जप दिवस’ के संदर्भ में प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि आज का दिन जप दिवस के रूप में प्रतिष्ठित है। जप अध्यात्म का सुगम प्रयोग है। हालांकि, मंत्र जप के सिद्धि प्राप्त कर किसी को कष्ट पहुंचाने का प्रयास हो, तो फिर वह पापकर्म का बंध कराने वाला हो जाता है। ऐसा करने वालों की वर्तमान स्थिति और आगे की गति भी अच्छी नहीं होती। जप के द्वारा तो अपनी आत्मा के कल्याण का प्रयास होना चाहिए। अवस्था प्राप्त लोग धर्म के अन्य प्रयोगों को शारीरिक अपेक्षा से उतना न भी कर पाएं, किन्तु जप तो लेटे-लेटे और बैठे-बैठे भी हो सकता है। तो अवस्था प्राप्त लोगों को अपना अधिक से अधिक समय जप के प्रयोग में लगाने का प्रयास करना चाहिए। जप को अपने श्वास के साथ जोड़ लिया जाए, तो कितना अच्छा हो सकता है। श्वास आए और श्वास जाए तो जप होता रहे। इस प्रकार आदमी को अपना कुछ समय जप की साधना में भी नियोजित करने का प्रयास करना चाहिए। अंत में श्रीमती मोहनी देवी नाहटा ने 8 की तथा श्रीमती वीना दूगड़ ने आचार्यश्री से 9 की तपस्या का प्रत्याख्यान किया।
त्रिपृष्ठ की कथा और पुनर्जन्म का विवरण
इससे पूर्व आचार्यश्री महाश्रमण ने ‘भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा’ के प्रवचन श्रृंखला में सम्बोधित करते हुए कहा कि त्रिपृष्ठ के भव में स्थित भगवान महावीर की आत्मा ने शेर को मारकर मानों ख्याति प्राप्त कर ली। प्रति वासुदेव अश्वग्रीव को जब इसकी सूचना मिली, तो ज्योतिषि द्वारा बताई गई दोनों बातें घटित हो चुकी थीं। तो उसे त्रिपृष्ठ में अपना हंता नजर आने लगा। उसने त्रिपृष्ठ को मारने की योजना बनाने लगा। उसने प्रजापति के पास पत्र भेजा कि आपके दोनों पुत्रों को हम स्वयं अपने हाथ से सम्मानित करना चाहते हैं, किन्तु त्रिपृष्ठ ने पत्र का कठोर जवाब भेज दिया। जिससे वह युद्ध के लिए पोतनपुर की सीमा तक चला आया। दोनों सेनाओं में युद्ध आरम्भ हुआ और अंत में त्रिपृष्ठ ने अश्वग्रीव को मार डाला और वासुदेव बन गए। प्रति वासुदेव का वध करके ही वासुदेव बना जा सकता है, ऐसा बताया गया है।
एक समय वसुदेव बने त्रिपृष्ठ के समक्ष गीत-संगीत का आयोजन चला, तो उसने कहा कि जब मैं सो जाऊं तो बंद करवा देना, किन्तु उसमें रम जाने के कारण वह सेवक ऐसा नहीं कर पाया, तो यह जानने पर त्रिपृष्ठ ने अपने सेवक के कानों में शीशा गर्म कर डलवा दिया, जिससे उसकी मृत्यु हो जाती है। इस प्रकार राज करते हुए वसुदेव अपना आयुष्य पूर्ण कर सातवें नरक की गति में पैदा हुए। फिर वे सिंह की योनि में पैदा हुए। फिर अपने बाइसवें भव में मनुष्य बने और विमलकुमार के रूप में पैदा हुए और बड़े नीति निपुण राजा हुआ। अंत में राजा ने चारित्र-ग्रहण कर लिया। तेइसवें भव में वापस मनुष्य गति में पैदा हुए। उनका नाम प्रियमित्र हुआ। यहां भगवान महावीर की आत्मा चक्रवर्ती बनती है। अंत में चारित्र ग्रहण कर लेते हैं। चौबीसवें भव में पुनः नन्दन के रूप में पैदा हुए। राजा बने और प्रजा की पालना और राज्य की सेवा करते हुए लगभग चौबीस लाख वर्ष तक गृहस्थ जीवन बीताने के बाद नन्दन राजर्षि बन गए।

kalamkala
Author: kalamkala

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