क्षमा रूपी धर्म को धारण करने का हो प्रयास: युगप्रधान आचार्य महाश्रमण आचार्य श्री का रतनगढ में मंगल प्रवेश

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क्षमा रूपी धर्म को धारण करने का हो प्रयास: युगप्रधान आचार्य महाश्रमण

आचार्य श्री का रतनगढ में मंगल प्रवेश

रतनगढ़ (चूरू)। राजलदेसर में दो दिवसीय मंगल प्रवास के बाद आचार्यश्री महाश्रमण प्रस्थान करके पदयात्रा करते हुए रतनगढ पहुंचे।
आचार्यश्री महाश्रमण बरसात के बावजूद गतिमान रह कर लगभग 14 किलोमीटर का विहार कर रतनगढ़ के रिक्को औद्योगिक क्षेत्र में स्थित मरूधर टेक्सटाइल के परिसर में पधारे।
आचार्यश्री ने वहां बरसते मेह में खड़े दर्शनार्थियों को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।

इस अवसर पर आचार्यश्री ने अपने पावन पाथेय में कहा कि क्षमा रूपी धर्म को धारण करने का प्रयास होना चाहिए। क्षमा ऐसा धर्म है, जो सबके लिए कल्याणकारी है। एक श्लोक में क्षमा धर्म को प्रस्तुत करते हुए कहा गया है कि मेरा सबके साथ मैत्री का भाव है, किसी से वैर नहीं है, सबको मैं क्षमा करता हूं और सभी जीव मुझे क्षमा करें। यह श्लोक या इसका भावार्थ एक बार भी उच्चरित हो जाए तो क्षमा धर्म को धारण किया जा सकता है।
क्षमा का अर्थ है – सहिष्णुता। आदमी के जीवन में कभी शारीरिक, कभी मानसिक, कभी वाचिक, कभी वैचारिक प्रतिकूल परिस्थितियां किसी द्वारा पैदा की जा सकती हैं, किन्तु ऐसी परिस्थितियों में भी जो शांत रह जाए, प्रतिकूलता को सहन कर ले, क्षमता होने के बाद भी सहन कर लेना उत्तम बात होती है। जिस आदमी के हाथ में क्षमा रूपी खड्ग हो भला उसका दुर्जन आदमी क्या बिगाड़ सकता है। दुनिया में सज्जन और दुर्जन दोनों प्रकार के लोग होते हैं। इनकी पहचान के लिए तीन प्रकार बताए गए हैं। दुर्जन के पास विद्या हो तो वह उसके द्वारा समस्या पैदा करता है, विवाद को बढ़ावा देता है, वहीं सज्जन के पास विद्या है तो वह विवादों को सुलझाने में, किसी को उचित ज्ञान देने में उपयोग होती है। दुर्जन के पास धन हो जाए तो उसके भीतर अंहकार पैदा करने वाला बन जाता है, जबकि सज्जन का धन दान के लिए होता है। दुर्जन के पास शक्ति हो तो वह किसी को प्रताड़ित करता है, कष्ट पहुंचाता है और सज्जन की शक्ति किसी को शांति पहुंचाने, किसी की पवित्र सेवा के लिए होती है। इस प्रकार सज्जन की विद्या, धन और शक्ति सत्कार्यों में तथा दुर्जन की विद्या, धन और शक्ति असत्कार्यों में लगती है। आदमी को स्वयं के भीतर सज्जनता का विकास करने का प्रयास करना चाहिए। सहिष्णुता रूपी को धर्म को धारण करने का प्रयास करना चाहिए।

इस औद्योगिक प्रतिष्ठान में आचार्यश्री के पदार्पण से हर्षित बैद परिवार की ओर से सुरेन्द्र बैद ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी और आचार्यश्री से आशीर्वाद प्राप्त किया।

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Author: kalamkala

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