पटरी से उतर जाएगा ‘भारत जोड़ो यात्रा’ अभियान और मजमा लूट ले जाएंगे लोग
150 दिनों की 3,500 किमी की यात्रा में केंद्रीय भूमिका में केवल राहुल गांधी
असमंजस- लोकसभा की 20 सीटों वाले केरल में यह यात्रा 18 दिनों तक निकलेगी, जबकि 80 सीटों वाले उत्तर प्रदेश में केवल दो दिन
नई दिल्ली। गत सप्ताह बड़े जोर-शोर से कांग्रेस की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ शुरू हुई। इससे पार्टी समर्थकों, कार्यकर्ताओं और इंटरनेट मीडिया योद्धाओं में नए उत्साह का संचार हुआ है। इस दौरान राहुल गांधी ने भी नई ऊर्जा और सक्रियता दिखाई है। यह यात्रा का आरंभिक दौर है। दूसरा दौर तमिलनाडु से शुरू होकर है। इस समय वह केरल में है, जहां कांग्रेस पारंपरिक रूप से मजबूत रही है। कांग्रेस के हालिया लचर प्रदर्शन को देखते हुए यात्रा को मिल रही प्रतिक्रिया पार्टी को प्रोत्साहित करने वाली है। इसके बावजूद एक सवाल कायम है कि क्या अगले आम चुनाव से पहले खुद को मजबूत करने में जुटी कांग्रेस के लिए भारत जोड़ो यात्रा जैसी मुहिम ही पर्याप्त होगी।
पूरे फोकस के बाद भी राहुल का फिर से लांच होना मुश्किल
यह यात्रा एक तरह से राहुल गांधी को नए सिर से ‘लांच’ करने की कवायद दिखती है। इसीलिए, वही इसके केंद्र में हैं और यह रणनीति उचित भी है। यह कहना गलत नहीं होगा कि राहुल की मौजूदगी से ही यात्रा के प्रति इतनी दिलचस्पी जग रही है। इसमें भी कोई संदेह नहीं कि फिलहाल वही देश भर में पार्टी के लिए भीड़ जुटाने वाले सबसे बड़े नेता हैं। हालांकि उन्हें स्वयं पर पूरा फोकस रखने में कोई गुरेज नहीं, लेकिन इसके बावजूद वह इस अभियान के नेतृत्वकर्ता की औपचारिक भूमिका स्वीकार करने के लिए भी तैयार नहीं दिखते। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि यात्रा कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव से ठीक पहले हो रही है, जिस चुनाव में उतरने के लिए राहुल ने अभी तक हामी नहीं भरी है। यह मानते हुए कि वह इस रुख पर अभी भी कायम हैं, तो राहुल के लिए छवि निर्माण की इतनी बड़ी कवायद के बाद नए अध्यक्ष को अपनी जिम्मेदारी को प्रभावी रूप से संभालना मुश्किल होगा।
उलझाव से जूझ रही है लुंजपुंज कांग्रेस
इस प्रकार के जन जुड़ाव वाले अभियानों के वास्तविक लाभ स्थानीय और राज्य संगठनों से जुड़े होते हैं, जिनमें राष्ट्रीय स्तर के नेता द्वारा सकारात्मक भावनाएं भुनाने का पहलू समाहित होता है। कांग्रेस के लिए मुश्किल यह है कि इस समय राज्यों में उसका सांगठनिक ढांचा लुंजपुंज अवस्था में है और क्षत्रप एक दूसरे से लड़ने पर आमादा हैं। इसके भी कोई संकेत नहीं कि जिन क्षेत्रों से यह यात्रा गुजर रही है, वहां स्थानीय सांगठनिक मुद्दे सुलझ जाएंगे। खासतौर से यह देखते हुए कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व स्वयं नए अध्यक्ष के लंबित चुनाव में उलझाव से जूझ रहा है। इस प्रकार के व्यापक जनसंपर्क अभियान का पार्टियां चुनावी लाभ उठा सकती हैं, मगर भारत जोड़ो यात्रा का मंतव्य कुछ अलग दिखता है। उसने गुजरात और हिमाचल जैसे उन राज्यों से स्वयं को दूर रखा है, जहां जल्द ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। वहीं इसके कारण भी ज्ञात नहीं कि आखिर किस वजह से लोकसभा की 20 सीटों वाले राज्य केरल में यह यात्रा 18 दिनों तक निकलेगी, वहीं 80 लोकसभा क्षेत्रों वाले उत्तर प्रदेश में केवल दो दिन।
नदारद होते जा रहे हैं सभी कद्दावर नेता
यह भी एक पहेली है कि इस यात्रा के आरंभ में तो राष्ट्रीय कद के नेताओं का जमावड़ा देखा गया, लेकिन बाद में वरिष्ठ एवं जनाधार वाले नेता नदारद दिख रहे हैं। शायद यह सुनियोजित रूप से किया गया हो, ताकि पूरा फोकस केवल राहुल पर रहे। पार्टी की ओर से जो फोटो जारी किए जा रहे हैं, उनमें भी राहुल ही आम लोगों से चर्चा करते हुए दिखाई देते हैं। यह भी उन्हें ‘जन-नेता’ के रूप में स्थापित करने के उद्देश्य से किया जा रहा है। योगेंद्र यादव जैसे ‘बाहरी’ लोग इस यात्रा से जुड़कर सुर्खियां बटोर रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस यही उम्मीद कर सकती है कि 150 दिनों तक चलने वाली 3,500 किलोमीटर की यात्रा में राहुल गांधी ही केंद्रीय भूमिका में रहें। अन्यथा यह अभियान पटरी से उतर जाएगा और दूसरे लोग मजमा लूट ले जाएंगे।
केवल राहुल की छवि सुधरेगी या कांग्रेस भी बन पाएगी मजबूत
इस अभियान के माध्यम से कांग्रेस अपनी अखिल भारतीय मौजूदगी के बारे में विपक्ष को संकेत देना चाहती है। परन्तु जिन राज्यों में कांग्रेस सत्ता से बाहर है और उसका सांगठनिक ढांचा भी कमजोर है, उनमें यह कहां तक सफल हो पाएगी। अरविंद केजरीवाल और के. चंद्रशेखर राव जैसे दो नेता कांग्रेस के साथ गठजोड़ को कतई तैयार नहीं दिखते। यही बात ममता बनर्जी के बारे में कही जा सकती है। केरल में यात्रा के लंबे पड़ाव से माकपा का भी मुंह बना हुआ है। इधर भाजपा राहुल की प्रत्येक गलती को भुनाने को तैयार है। उसने यात्रा के लिए विशेष रूप से तैयार आलीशान कंटेनरों पर निशाना साधा। यात्रा के दौरान राहुल द्वारा मिलने वाले लागों पर भी भाजपा की पैनी नजर है। जैसे एक विवादित पादरी से मुलाकात पर तुरंत राहुल को घेरा गया। कुडनकुलम परियोजना और स्टरलाइट-विरोधी प्रदर्शनों के लिए जिम्मेदार लोगों से उनकी मुलाकात को भाजपा ने खासा तूल दिया। यात्रा के माध्यम से राहुल क्या अपनी छवि ही निखारेंगे या पार्टी में नई जान डालेंगे। कांग्रेस की असल चुनौती राहुल की व्यक्तिगत छवि के बजाए संगठन में जान फूंकने की है। यह यात्रा अभी शुरू हुई है, पर कांग्रेस के लिए ‘दिल्ली अभी दूर’ है।





