सभी के प्रति मैत्री और सौहार्द की भावना का विकास हो- आचार्यश्री महाश्रमण हिंसा व उसकी पांचों क्रियाओं को चरणबद्ध रूप से किया व्याख्यायित

SHARE:

[responsivevoice_button voice="Hindi Female"]

सभी के प्रति मैत्री और सौहार्द की भावना का विकास हो- आचार्यश्री महाश्रमण

हिंसा व उसकी पांचों क्रियाओं को चरणबद्ध रूप से किया व्याख्यायित

छापर (चूरू)। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम् अधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण ने शनिवार को मुख्य प्रवचन में हिंसा की उत्पत्ति से लेकर उसकी निष्पत्ति तक को विधिवत् व्याख्यायित कर लोगों को अहिंसा की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा प्रदान की। साथ ही आचार्यश्री कालूगणी की जन्मधरा पर कालूयशोविलास का सरसशैली में आख्यान भी किया।

आचार्यश्री महाश्रमण ने कहा कि भगवती सूत्र में एक प्रश्न पूछा गया है कि एक शिकारी, जो शिकार के माध्यम से अपनी आजीविका चलाता है। वह जंगल में जाकर और जीव को मारने के उद्देश्य से अपनी जाल बिछा चुका है, उसे कितनी क्रिया का पाप लगेगा? उत्तर दिया गया कि उसे तीन, चार और पांच क्रिया का पाप भी लग सकता है। प्रतिप्रश्न हुआ कि ऐसा क्यों? उत्तर दिया गया कि जैन दर्शन में पांच प्रकार की क्रिया बताई गई है- 1. कायिकी क्रिया, 2. आधिकारणिकी क्रिया, 3. प्रादोषिकी क्रिया, 4. पारितापनिकी क्रिया और 5. प्राणातिपात क्रिया। बताया गया कि कहीं भी कोई युद्ध होता है तो सीधे युद्ध के मैदान में नहीं होता, पहले किसी से युद्ध करने का विचार मन में पैदा होता है। मन में पैदा हुए विचारों के बाद शरीर उसके लिए तैयार होने लगता है, जो कायिकी क्रिया कही जाती है। फिर आदमी युद्ध के लिए शस्त्र आदि का चुनाव करता है, या शस्त्र तैयार करता है। शस्त्र तैयार करने की क्रिया आधिकारणिकी क्रिया होती है। जिसे युद्ध में मारना है उसके प्रति मन में द्वेष की भावना प्रादोषिकी क्रिया कहलाती है। इतनी क्रिया होने के बाद जब कोई किसी को शस्त्र से मारने का प्रयास करता है तो सामने वाला उस प्रहार से मरता नहीं है, किन्तु उसे चोट पहुंचती है, कष्ट होता है या वह घायल होता है, यह क्रिया पारितापनिकी क्रिया कही जाती है। तदुपरान्त जब किसी के किए गए प्रहार से किसी की मृत्यु हो जाती है तो अंतिम पांचवीं क्रिया प्राणातिपात होती है। इस प्रकार इन पांच क्रियाओं में प्रथम तीन तो शिकारी पहले ही पूरी कर लेता है, जब वह जाकर जंगल में शिकार के लिए जाल फैला देता है और निशाना तैयार कर लेता है। जब वह सलक्ष्य शस्त्र छोड़ता है, यदि उससे जीव का प्राणांत नहीं हुआ, तो चौथी क्रिया और प्राणी का प्राणांत हो गया तो उसे पांचवीं क्रिया का दोष लगता है। इस प्रकार हिंसा के स्तर के आधार पर क्रिया का दोष बताया गया है।[the_ad id=”1711″]

उन्होंने कहा कि आदमी ऐसा प्रयास करे कि उसके मन में किसी को मारने की भावना ही न आए। किसी के प्रति द्वेष की भावना न विकसित हो, इसके लिए आदमी को सभी के प्रति मैत्री और सौहार्द की भावना का विकास करना चाहिए। यदि मन में ही द्वेष और हिंसा की भावना न आए तो फिर सभी क्रियाओं से आदमी बचकर अहिंसा का पालन कर सकता है।

कार्यक्रम में आचार्यश्री ने कालूयशोविलास के माध्यम से आचार्य कालूगणी के आचार्यकाल के विभिन्न प्रसंगों का सुमधुर गायन और आख्यान सुनाया।[the_ad id=”771″]

kalamkala
Author: kalamkala

[the_ad id='179']

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

सबसे ज्यादा पड़ गई

नगरीय निकायों एवं पंचायती राज चुनावों के दृष्टिगत निर्वाचक नामावलियों में निरंतर अद्यतन की प्रक्रिया जारी, मतदाता सूची में नाम जोड़ने, संशोधित करने व हटाने के लिए नागरिकगण कर सकते हैं आवेदन

लाडनूं पुलिस की कालिका पैट्रोलिंग टीम की लगातार सफलता, लड़कियों और महिलाओं को मिल रही है सुरक्षा, फब्तियां कसने, स्नेपचैट पर मैसेज करने, अपनी आई की पर्चियां लड़कियों को देने, पीछा करने और वाशरूम में ताक-झांक करने वाले तीन युवकों को दबोचा

नामांकन बढाएं, गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा दें तथा श्रेष्ठतम प्रयासों से बनाएं आदर्श विद्यालय- सीबीईओ बजरंगसिंह राठौड़, अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ द्वारा स्वागत व सम्मान समारोह एवं वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित

[the_ad id='15212']
[the_ad id='22854']
[the_ad id='22855']
[the_ad id='22856']

शहर चुनें

Follow Us Now