ज्ञानार्जन का सशक्त माध्यम है ‘श्रुत’।भगवती सूत्र के तीसरे सूत्र में श्रुत को किया गया नमस्कार- आचार्य महाश्रमण, बच्चों ने ली आराध्य से मंत्र-दीक्षा

SHARE:

[responsivevoice_button voice="Hindi Female"]

ज्ञानार्जन का सशक्त माध्यम है ‘श्रुत’।भगवती सूत्र के तीसरे सूत्र में श्रुत को किया गया नमस्कार- आचार्य महाश्रमण

बच्चों ने ली आराध्य से मंत्र-दीक्षा

छापर (चूरू)। भगवती सूत्र के तीसरे सूत्र में श्रुत को नमस्कार किया गया है। प्रथम तीनों सूत्रों में मंगल के लिए नमस्कार किया गया है। जैन दर्शन में ज्ञान के पांच प्रकार बताए गए हैं- मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्यव ज्ञान व केवलज्ञान। इन पाचों ज्ञानों में दूसरा ज्ञान है श्रुतज्ञान। इसके भी दो प्रकार होते हैं- द्रव्य श्रुत और भाव भाव श्रुत। शब्द का उच्चारण करना अथवा लिखे होने वाला द्रव्य श्रुत होता है। शब्द अपने आपमें जड़ है। उस जड़ से हमें जो अर्थबोध होता है वह अर्थ भाव श्रुत होता है। शब्द भले जड़ हों, उच्चारित हों या लिखित, ज्ञान के बड़े सक्षम माध्यम बनते हैं। शब्द होते हैं तो बड़े आसानी से ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है। मैं प्रवचन कर रहा हूं, तो मैं शब्दों का ही प्रयोग कर रहा हूं और श्रोता मेरे शब्दों को सुन रहे हैं तथा मैं स्वयं भी अपने शब्दों को सुन रहा हूं। सुनने से कईयों को ज्ञान भी प्राप्त हो सकता है तो सुनना ज्ञान का माध्यम बनता है।

भगवती सूत्र में श्रुत को नमस्कार किया गया है। जीवन में ज्ञान का परम महत्त्व है। यदि मनुष्य के पास सम्यक् ज्ञान नहीं है, तो उसका चारित्र भी सम्यक् नहीं हो सकता। सम्यक् चारित्र तभी हो सकता है, सम्यक् श्रुत हो। श्रीमज्जयाचार्य हमारे धर्मसंघ के चतुर्थ आचार्य थे। उन्होंने भगवती सूत्र पर राजस्थानी भाषा में भगवती की जोड़ नाम से बहुत बड़ा ग्रन्थ लिखा है। स्वाध्याय के साथ श्रुत का संबंध है। इसमें चारित्रयुक्त श्रुतवान साधु को नमस्कार किया गया है। श्रुत का बहुत महत्त्व है। प्राचीनकाल में सुन-सुनकर कितना ज्ञान किया जाता था। एक गुरु से उनके शिष्यों ने सुना उन्होंने अपने शिष्यों को सुनाया, इस प्रकार परंपरा श्रुतज्ञान की परंपरा चलती थी। वर्तमान समय में ऐसी परंपरा नहीं है। वर्तमान समय के अनुसार सुनी हुई बात आगे जाकर अपना कुछ रूप बदल सकती है, किन्तु लिखी हुई बात लम्बे समय तक शुद्ध और अच्छी रह सकती है। आदमी ज्ञान का सम्मान करे और ज्ञानी की अवज्ञा भी न हो, इसका प्रयास करना चाहिए।

उक्त ज्ञानमयी बातें जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण ने छापर चतुर्मास के दौरान आयोजित मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के दौरान श्रद्धालुओं को बताईं। आचार्यश्री ने भगवती सूत्राधारित प्रवचन के पश्चात् पूज्य कालूगणी की धरा पर ‘कालूयशोविलास’ का गायन और स्थानीय भाषा में उसका व्याख्यान करते हुए कहा कि मूलचंद-छोंगाजी को फाल्गुन शुक्ला दूज को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। बुधमलजी ने दो ज्योतिषियों सहित भृगु संहिता के आधार पर अपने पोते के भविष्य की जानकारी की। जहां उनके जीवन भर के घटनाक्रमों का वर्णन किया गया था।

मंत्र दीक्षा का कार्यक्रम

आचार्यश्री के मंगल उद्बोधन के उपरान्त अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद व स्थानीय तेरापंथ युवक परिषद के तत्त्वावधान में मंत्र दीक्षा कार्यक्रम का आयोजन हुआ, जिसमें कई बालकों ने अपने आराध्य के श्रीमुख से मंत्र दीक्षा स्वीकार की। इस संदर्भ में स्थानीय तेरापंथ युवक परिषद के संगठन मंत्री आलोक नाहटा ने अभिव्यक्ति दी। रिद्धकरण सुराणा ने गीत का संगान किया। आचार्यश्री के दर्शनार्थ उपस्थित हुई चूरू जिलाप्रमुख श्रीमती वंदना आर्य ने भी आचार्यश्री के समक्ष अपनी अभिव्यक्ति दी और आचार्यश्री से पावन आशीर्वाद प्राप्त किया।

kalamkala
Author: kalamkala

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

सबसे ज्यादा पड़ गई

घर-घर में पानी के टांके बनवाए जाकर करें वर्षाजल का संचय- तहसीलदार अनिरुद्ध देव पांडेय, श्री रामआनंद गौशाला में वंदे गंगा जल संरक्षण जन अभियान कार्यक्रम आयोजित, पौधारोपण किया, परिंडे लगाए और पिंजरे का किया समर्पण

जनता और पुलिस के मध्य सामंजस्य स्थापित करने और अपराधों को कम करने में रहती है सीएलजी सदस्यों की महत्ती भूमिका- एसपी ज्ञानचंद यादव, लाडनूं पुलिस थाने में ईदुल जुहा के अवसर पर एसपी ने स्वयं ली सीएलजी की बैठक, लाडनूं में हुआ भव्य स्वागत

शहर चुनें

Follow Us Now