गुरु की आज्ञा को शिरोधार्य करने वाला शिष्य ही महान- आचार्य महाश्रमण,
तेरापंथ की राजधानी लाडनूं धार्मिक पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना


लाडनूं (kalamkala.in)। ‘ ‘तेरापंथ की राजधानी’ घोषित लाडनूं शहर में तेरापंथ धर्मसंघ के अनुशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण ने रविवार को यहां जैन विश्व भारती स्थित सुधर्मा सभा में आयोजित प्रवचन सभा में कहा कि जैन शासन में तीर्थंकर सर्वोच्च हैं और उनके बाद आचार्य का पद ही सबसे महत्वपूर्ण होता है। गुरु और शिष्य के सम्बंधों की व्याख्या करते हुए युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण ने कहा कि हमारे धर्मसंघ में आचार्य का पद ही सर्वोपरि है और सभी पदों का कार्यभार आचार्य में ही समाहित होता है। यदि कभी आचार्य शिष्य से अप्रसन्न हो जाएं, तो शिष्य को अपनी त्रुटि का बोध कर लेना चाहिए। यदि शिष्य को लगे कि गुरु उससे नाराज हैं, तो उसका कर्तव्य है कि वह नम्रतापूर्वक उनके कोप को शांत कर उन्हें शीघ्र प्रसन्न करे। आगमकार बताते हैं कि शिष्य हाथ जोड़कर वंदना की मुद्रा में बैठे और प्रीति-कारक वचनों से गुरु को यह विश्वास दिलाए कि उससे जो भी भूल हुई है, वह भविष्य में दोबारा नहीं होगी। शिष्य के मन में अहंकार नहीं अपितु विनम्रता का भाव होना चाहिए। गुरू के समक्ष शिष्य बालक के समान होता है। जो शिष्य गुरु की डांट और उपालंभ को बिना किसी आवेश या गुस्से के अत्यंत गंभीरता और विनय से झेलते हैं, ऐसे विनीत, सेवाभावी और सरल शिष्य वास्तव में शासन के गौरव समान महान होते हैं। गुरु तो सर्वोच्च और महान हैं ही, लेकिन गुरु की आज्ञा को शिरोधार्य कर समर्पित रहने वाले ऐसे महान शिष्यों को भी मैं प्रणाम करना चाहता हूँ।
धार्मिक पर्यटकों के लिए बना आकर्षण का केंद्र
लाडनूं में आचार्य श्री महाश्रमण के योगक्षेम वर्ष प्रवास के अंतर्गत विविध प्रशिक्षण, शिक्षण, कक्षाएं, गतिविधियों, सेमिनार आदि के लगातार आयोजन से साधु साध्वियों के साथ सकल समाज भी लाभान्वित हो रहा है। लाडनूं के जैन विश्व भारती परिसर स्थित जैन विश्व भारती, जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय, आचार्य तुलसी स्मारक, साहित्य सदनम्, सेवाभावी आयुर्वेदिक रसायनशाला, आचार्य महाप्रज्ञ नेचुरोपैथी कॉलेज आदि विविध आयाम यहां आने वाले धार्मिक पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बने हुए है।





