जागरूकता और समय पर इलाज से टीबी को किया जा सकता है समाप्त- प्रो. जैन, लाडनूं के जैविभा विश्वविद्यालय में विश्व क्षयरोग दिवस कार्यक्रम का आयोजन

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जागरूकता और समय पर इलाज से टीबी को किया जा सकता है समाप्त- प्रो. जैन,

लाडनूं के जैविभा विश्वविद्यालय में विश्व क्षयरोग दिवस कार्यक्रम का आयोजन

लाडनूं (kalamkala.in)। जैन विश्वभारती संस्थान के शिक्षा विभाग में विश्व क्षयरोग दिवस पर एक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में विभागाध्यक्ष प्रो. बी.एल. जैन ने में कहा कि टी.बी. एक खतरनाक, लेकिन पूरी तरह ठीक होने वाली बीमारी है। जागरूकता और समय पर इलाज के माध्यम से इसे समाप्त किया जा सकता है। पहले टी.बी. एक लाइलाज महामारी थी, लेकिन आधुनिक चिकित्सा के माध्यम से अब इसका पूर्ण इलाज संभव है। उन्होंने बताया कि टी.बी. के मुख्य लक्षणों में 2-3 सप्ताह तक लगातार खांसी, बलगम में खून आना, रात में पसीना आना, वजन कम होना और कमजोरी शामिल हैं। ऐसे लक्षण दिखाई देने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क कर जांच और उपचार शुरू करना चाहिए। उन्होंने बताया कि टी.बी. के इलाज के लिए 6-9 महीनों तक नियमित रूप से दवाइयों का सेवन करना जरूरी है। बीच में दवा छोड़ देने से बीमारी अधिक गंभीर हो सकती है और मल्टी-ड्रग रेसिस्टेंट टी.बी. का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए मरीजों को पूर्ण उपचार कोर्स पूरा करना चाहिए। टी.बी. से बचाव के उपाय बताते हुए उन्होंने समय पर टीकाकरण, खांसते समय मुंह ढकने, स्वच्छता बनाए रखने, पौष्टिक आहार लेने और संक्रमित व्यक्ति से दूरी बनाए रखने की सलाह दी।

हां, हम टीबी समाप्त कर सकते हैं

कार्यक्रम के संयोजक डॉ. देवीलाल कुमावत ने बताया कि टीबी की गंभीर बीमारी के प्रति समाज को जागरूक करने के लिए यह दिवस महत्वपूर्ण अवसर है। टी.बी. या क्षयरोग एक प्राचीन संक्रामक बीमारी है, जो माइकोबैक्टेरियम ट्यूबरक्लोसिस नामक जीवाणु के कारण होती है और मुख्य रूप से फेफड़ों को प्रभावित करती है। 24 मार्च 1882 को वैज्ञानिक रॉबर्ट कोच द्वारा इस जीवाणु की खोज की थी, इसी कारण प्रतिवर्ष 24 मार्च को विश्व क्षयरोग दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष की थीम “हाँ! हम टीबी को समाप्त कर सकते हैं!” पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक संकल्प है, जो हमें विश्वास दिलाता है कि सामूहिक प्रयासों से इस बीमारी को समाप्त किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि वर्ष 1921 में फ्रांसीसी वैज्ञानिक अल्बर्ट कैल्मेट और कैमिले गुएरिन द्वारा बीसीजी वैक्सीन की खोज की गई, जो नवजात शिशुओं को टी.बी. से सुरक्षा प्रदान करती है। डॉ. मनीष भटनागर ने भी अपने विचार व्यक्त किये। इस अवसर पर शिक्षा विभाग के संकाय सदस्य डॉ. अमिता जैन, डॉ. आभा सिंह, डॉ. विष्णु कुमार, डॉ. गिरीराज भोजक, डॉ. गिरधारी लाल शर्मा, खुशाल जांगिड़, स्नेहा शर्मा सहित सभी छात्राएं उपस्थित रहीं।
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Author: kalamkala

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