लाडनूं के शीतला माता चौक में परम्परागत भव्य शीतला मेले का आयोजन, साढ़े पांच सौ सालों से लगता आ रहा है मेला, उमड़ी भीड़ ने ठंडे पकवानों से लगाया शीतला माता को भोग और किया पूजन, बच्चों के स्वास्थ्य की मांगी मन्नत
लाडनूं के शीतला माता चौक में परम्परागत भव्य शीतला मेले का आयोजन, साढ़े पांच सौ सालों से लगता आ रहा है मेला,
उमड़ी भीड़ ने ठंडे पकवानों से लगाया शीतला माता को भोग और किया पूजन, बच्चों के स्वास्थ्य की मांगी मन्नत
रामसिंह रैगर, पत्रकार। लाडनूं (kalamkala.in)। लोक आस्था में सबसे गहनता रखने वाली मौसमी बीमारियों से बचाने और बीमारियों को भगाने की मान्यता वाली शीतला माता के पूजन-पर्व शीतलाष्टमी पर यहां शीतला माता मंदिर चौक में भव्य मेला का आयोजन किया गया। श्री शीतला माता सेवा समिति के तत्वावधान में बुधवार को यह शीतला माता का भव्य मेला भरा गया। मेले के दौरान परंपरानुसार शीतला-सप्तमी के दिन बनाए गए रांधा-पोवा (बास्योड़ा) के ठंडे पकवानों-व्यंजनों का भोग प्रातः तड़के ही शीतला माता को और साथ ही पास में स्थित बोदरी माता की प्रतिमाओं पर भोग लगाने का तांता लग गया। इस दिन घर-घर में ठंडे पकवानों का ही सेवन आबाल-वृद्धों द्वारा किया जाता है।
स्वास्थ्य और खुशहाली के लिए लगता हे लोगों का तांता
इससे पूर्व मंगलवार रात्रि में मन्दिर के सत्संग भवन में जागरण का आयोजन किया गया। जागरण में भजन कलाकार किशोर पारीक निवासी सुजानगढ व रविन्द्र निवासी अबोहर ने माताजी के भजनों की प्रस्तुतियां दी। बुधवार को माता-बहिनों की भारी भीड़ माता के भजनों व गीतों को गाते हुए मन्दिर पहुंची व माता को धोक लगाई। सबने अपने-अपने परिवार में बाल-बच्चों के स्वास्थ्य और खुशहाली की मंगल-कामनाएं कीं। मेले की व्यवस्थाओं में शीतला माता सेवा समिति के अध्यक्ष नोरतन मल तुनगरिया, भागीरथ फुलवारिया, अर्जुनराम तुनगरिया, भागचन्द बालोटिया, अशोक फुलवारिया, गंगाराम रैगर, संपतलाल फुलवारिया, हुकमाराम धौलपुरिया, गनपतराम फुलवारिया, डालाराम सबलानिया, जगदीश जूनवाल, गोपाल तुनगरिया, बाबूलाल तुनगरिया, नारायण मौर्य, गौतम नगलिया, कमल सबलानिया ने सहयोग प्रदान किया।
करीब साढ़े पांच है सालों से लगता आ रहा है भव्य मेला
गौरतलब है कि लाडनूं में इसी स्थान पर पिछले साढ़े पांच हो सालों से हर साल शीतलाष्टमी का मेला लगता आ रहा है। पहले यहां बस्ती नहीं थी, यहां तागोलाव तालाब और उसके जलसंग्रहण की भूमि ताल था। तालाब की पाल के पास ही यह शीतला माता का मंदिर बना हुआ था। धीरे-धीरे इस जगह के रहवासी पट्टे अस्तित्व में आते गए और तालाब व ताल दोनों का अस्तित्व समाप्त होता चला गया। अब यहां सीमित चौक ही बचा है मेले के लिए, वरना यह सुबह से शाम तक चलने वाला अति विशाल मेला था, जिसमें बहुत सारे तरह-तरह के झूले लगते थे और पूरा मार्केट सजता था। यहां शीतला माता की शीतलता के लिए पानी की कोठियां उड़ेली जाती थी। यहां का विशाल परिसर महिला-पुरुषों से खचाखच भरा रहता था। पहले चेचक और अन्य बीमारियां महामारी के रूप में फैली रहती थी, इस महामारी से बचाने के लिए शीतला माता के प्रति जन-जन में गहन आस्था थी।