‘राजस्थान के बजट में पत्रकारों की घोर उपेक्षा’ समस्त पत्रकार विचार करें और प्रदेश स्तर के संगठन को मजबूत बनाकर उठाएं अपनी सशक्त आवाज- प्रदेशाध्यक्ष डॉ. यायावर

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‘राजस्थान के बजट में पत्रकारों की घोर उपेक्षा’

समस्त पत्रकार विचार करें और प्रदेश स्तर के संगठन को मजबूत बनाकर उठाएं अपनी सशक्त आवाज- प्रदेशाध्यक्ष डॉ. यायावर

लाडनूं / जयपुर (kalamkala.in)। राजस्थान प्रदेश सरकार ने अपना तीसरा बजट जारी किया है, परन्तु उसमें पत्रकारों के लिए कोई प्रावधान नहीं रखे जाने से पूरे प्रदेश के पत्रकारों को निराशा ही हाथ लगी है। जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन आफ इंडिया के प्रदेशाध्यक्ष डॉ. जगदीश यायावर सैनी ने राज्य बजट में पत्रकारों के हित में किसी भी प्रकार की कोई घोषणा नहीं किए जाने को लेकर अपनी निराशा बताते हुए कहा है कि आखिर कब तक पत्रकारों को निराश और हताश रहना पड़ेगा। उन्होंने बताया कि पत्रकार वर्ग प्रदेश का बहुत बड़ा असंगठित व्यवसाय से सम्बद्ध है और अस्थिरता का शिकार है। पत्रकार आज विभिन्न समाचार पत्रों और न्यूज चैनलों पर बिना तनख्वाह के काम करने पर मजबूर हैं। इनका प्रदेश व्यापी एक मजबूत संगठन नहीं होने तथा जिला, तहसील और नगर स्तर पर छोटे-छोटे तीन-तीन, चार-चार प्रेस क्लब और छोटे स्तर के संगठन बना कर बुरी तरह से बटे हुए हैं। पत्रकार लोग स्वयं भी अपनी एकता को खंडित करने में जुटे रहते हैं और इनकी प्रदेश व्यापी एकजुट आवाज नहीं बन पाती। इसी कारण इनको लेकर कोई राजनेता या सरकार इन्हें उचित तवज्जो नहीं देते। पत्रकार आज केवल छोटे विज्ञापनों और अन्य तुच्छ आर्थिक लाभ के लिए राजनेताओं और उच्च प्रशासनिक अधिकारियों के कृपापात्र या खास बनने के लिए असफल चेष्टाएं करते रहते हैं। इसी तरह शहर के बड़े उद्योगपतियों, माफियाओं की जी-हजूरी करके पत्रकार अपनी पत्रकारिता के स्वाभिमान को लगभग गिरवी रख देते हैं और कार्यक्रमों के नाम पर अनधिकृत उगाई करके खुश हो जाते हैं। डॉ. यायावर ने कहा है कि पूरे प्रदेश के पत्रकारों को अपने अहम् और आपसी प्रतिस्पर्धा में अपनों का ही नुक़सान कर रहे हैं और इसी में स्वयं को खुश कर लेते हैं। इस प्रवृत्ति से वे अपने ही पांवों में कुल्हाड़ी मार रहे हैं। जबकि सभी पत्रकारों को प्रदेश स्तरीय संगठन से जुड़े कर अपने हितों की लड़ाई को महत्व देना चाहिए तथा पत्रकारों के लिए लड़ाई लड़ने वाले और उनके अधिकारों के लिए संघर्षरत संगठनों से जुड़े कर छोटे-छोटे सांगठनिक टुकड़ों का बहिष्कार करना चाहिए। अपने ही महत्व के प्रति कब तक पत्रकार घोर उदासीनता अपनाएं रखेंगे और अपने हितों की नहीं सोचने के लिए राज्य सरकार, राजनेताओं और दूसरों को दोष देते रहेंगे। प्रदेश के समस्त पत्रकारों को इसकी अपेक्षा अपने आप में झांकते हुए गंभीरता से विचार करना चाहिए और अपने सांगठनिक सुधार के लिए प्रयास करना चाहिए। अन्यथा सबको लगातार इसी प्रकार निराशा और हताशा का सामना ही करते रहना पड़ेगा।

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Author: kalamkala

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