उच्च चिंतन, स्वाधीनता के भाव हैं साहित्य सृजन की आत्मा- डा. नरेन्द्र शर्मा कुसुम, दो दिवसीय ऑनलाइन राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ

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उच्च चिंतन, स्वाधीनता के भाव हैं साहित्य सृजन की आत्मा- डा. नरेन्द्र शर्मा कुसुम,

दो दिवसीय ऑनलाइन राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ

लाडनूं। ‘स्वतंत्रता आंदोलन एवं हिंदी साहित्य’ विषय पर दो दिवसीय ऑनलाइन राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ जैन विश्वभारती संस्थान विश्वविद्यालय के आचार्य कालू कन्या महाविद्यालय तथा दूरस्थ एवं ऑनलाइन शिक्षा केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए कवि-साहित्यकार डॉ. नरेंद्र शर्मा ‘कुसुम’ ने उच्च चिंतन, स्वाधीनता का भाव, सृजन की आत्मा आदि को साहित्य का उद्देश्य मानकर आलस्य के भाव को मृत्यु का लक्षण माना और कहा कि साहित्य ऐसा होना चाहिए, जो कि समाज को ऊंचाइयों की ओर अग्रसर करे। उन्होंने निराला, माखनलाल चतुर्वेदी, भारतेंदु हरिश्चंद्र, भवानी प्रसाद मिश्र, जर्मन लेखक हरबर्ट रसैल आदि के उद्धरणों द्वारा विषय प्रतिपादित किया।

आजादी में सहयोगी रहे कलम की ताकत और लोकनायक

संगोष्ठी के सारस्वत अतिथि इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय नई दिल्ली के हिन्दी विभाग के प्रोफेसर प्रो. नरेन्द्र मिश्र कलम की ताकत और लोक नायकों के योगदान की सराहना करते हुए भारतीय आजादी में दोनों के योगदान को एक सिक्के के दो पहलू के रूप में स्वीकार किया। मैथिलीशरण गुप्त के साथ ही सियारामशरण गुप्त सरीखे उनके अग्रज के योगदान पर भी दृष्टिपात किया और शिवमंगल सिंह सुमन, जयशंकर प्रसाद, सुभद्रा कुमारी चैहान, बालकृष्ण शर्मा श्नवीनश्, माखनलाल चतुर्वेदी, राम प्रसाद बिस्मिल, जगदंबा प्रसाद, वंशीधर शुक्ल, सोहनलाल द्विवेदी आदि के कर्तव्यनिष्ठ लेखन एवं भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान आम जनमानस में जगाए गए स्वाभिमान व देश प्रेम के भावों की भरपूर प्रशंसा की, लेकिन साथ ही साहित्यकारों की देश प्रेम एवं आदर्शवादीता से विमुख वर्तमान पीढ़ी को भी पुनः कर्तव्यनिष्ठ सृजन हेतु जागरूक किया।

गुलदस्ते की तरह है भारत की सांस्कृतिक विशेषताएं

इस अवसर पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के हिंदी प्रोफेसर व प्रख्यात कवि एवं गजलकार प्रो. शंभूनाथ तिवारी ने हिंदुस्तान की सांस्कृतिक विशेषता को विभिन्न सुमनों को चुनकर बनाए हुए गुलदस्ते के समान बताया तथा कहा कि इसमें अकेले किसी का महत्व ना होकर सभी का सामुहिक सौंदर्य विद्यमान रहता है। प्रो. तिवारी ने हिंदी को उर्दू का सबसे पुराना नाम बताया और ‘भाषा’ के रूप में हिंदी का सबसे पुराना नाम बताते हुए इकबाल के ‘हिंदी हैं हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा’ में हिंदी का मतलब हिंद के लोगों से माना। उन्होंने हिंदी की पहली प्रगतिशील रचना ‘भारत-भारती’ और प्रेमचंद के ’सोजे वतन’ के उद्धरणों द्वारा विषय की सार्थकता को सिद्ध किया एवं पेड़ के विकास में जड़ का महत्व बताते हुए भारतीय आदर्शों, संस्कारों एवं संस्कृति के महत्व को इससे जोड़ा। संगोष्ठी का संयोजन प्रो. आनंदप्रकाश त्रिपाठी ने किया।

विभिन्न विद्वानों ने किया शोध-पत्रों का वाचन

उद्घाटन सत्र के पश्चात संगोष्ठी के प्रथम सत्र की अध्यक्षता राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर के हिंदी सह आचार्य डॉ. जितेंद्र कुमार सिंह द्वारा की गई। इस सत्र में डॉ. सुमति कुमार मीणा, सुंदरम् शांडिल्य, डॉ. महेश कुमार दायमा, डॉ. सर्वेश कुमार मिश्र, डॉ. प्रदीप कुमार दुबे, आशीष कुमार मिश्र, डॉ. अशोक कुमार चारण व डॉ. श्रुति पारीक ने संगोष्ठी से संबंधित विभिन्न उप-विषयों पर आधारित अपने शोध पत्रों वाचन भी किया। इन सत्रों का प्रारंभ श्वेता जैन एवं प्रगति चैरड़िया के मंगलसंगान के साथ किया गया। दोनों सत्रों में स्वागत वक्तव्य एवं आभार ज्ञापन क्रमशः प्रो. बनवारीलाल जैन व डॉ. प्रगति भटनागर तथा प्रो. रेखा तिवारी व प्रेयस सोनी द्वारा किया गया। प्रथम सत्र का संचालन कार्यक्रम समन्वयक अभिषेक चारण ने किया।

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Author: kalamkala

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