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विशेष आलेख-  दुर्लभ पांडुलिपियां का अद्भूत संग्रह और संरक्षण का महत्वपूर्ण केन्द्र, जहां है साढे छह हजार हस्तलिखित ग्रंथ सुरक्षित, लाडनूं का जैविभा विश्वविद्यालय का पांडुलिपि संरक्षण केन्द्र, जहां सोने के अक्षरों की पुस्तक ही नहीं 40 फुट लम्बा पटदर्शन भी है विशेष

विशेष आलेख- 

दुर्लभ पांडुलिपियों का अद्भूत संग्रह और संरक्षण का महत्वपूर्ण केन्द्र, जहां है साढे छह हजार हस्तलिखित ग्रंथ सुरक्षित,

लाडनूं का जैविभा विश्वविद्यालय का पांडुलिपि संरक्षण केन्द्र, जहां सोने के अक्षरों की पुस्तक ही नहीं 40 फुट लम्बा पटदर्शन भी है विशेष

– जगदीश यायावर, लाडनूं।
             प्राचीन दुर्लभ हस्तलिखित ग्रंथों के संग्रह के रूप में लाडनूं के जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय की वर्द्धमान ग्रंथागार सेंट्रल लाईब्रेरी में स्थित ‘श्रुत सन्निधि’ कक्ष में संचालित पांडुलिपि संरक्षण केन्द्र प्राचीन धरोहर के संरक्षण के लिए अभूतपूर्व है। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अन्तर्गत राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन द्वारा प्रायोजित इस केन्द्र को सम्पूर्ण देश के जैन जगत में विशेष व महत्वपूर्ण माना जाता है। इस विश्वस्तरीय पांडुलिपि केन्द्र में विभिन्न प्रकार की हस्तलिखित, हस्तचित्रित पांडुलिपियों का दुर्लभ संग्रह उपलब्ध है। इनमें स्वर्णक्षारीय कल्पसूत्र, बाराबुदूर आदि अतीव दुर्लभ और अमूल्य ग्रंथ भी समाहित हैं। यहां कुल उपलब्ध 6650 पांडुलिपियों में से दुर्लभ श्रेणी की 2094 पांडुलिपि ग्रंथों का डिजीटाईजेशन भी किया जा चुका है। इनकी सीडी भी यहां उपलब्ध हैं। यहां 545 प्राचीन हस्तलिखित पोथी मौजूद हैं। ये पोथियां एक तरह से हाथ से लिखी हुई प्राचीन पत्रिकाएं हुआ करती थी। ये सभी विशिष्ट हस्तनिर्मित प्राकृतिक रंगों एवं स्याही से लिखी गई हैं।

पौने दो लाख से अधिक प्राचीन पृष्ठों को किया सुरक्षित 

केन्द्रीय पुस्तकालय वर्द्धमान ग्रंथागार के प्रभारी निखिल कुमार राठौड़ ने बताया कि यहां 6650 पांडुलिपियों के 1 लाख 77 हजार 760 पृष्ठों को पूर्ण संरक्षित व सुरक्षित रूप से संजोकर रखा गया है। यहां मूल हस्तलिखित आगम ग्रंथ भी उपलबध हैं, जिन्हें जैन धर्म में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इन आगमों की 1402 पांडुलिपियां यहां सुरक्षित हैं। इसी तरह से जैन विद्या व दर्शन सम्बंधी 486 प्राचीन हस्तलिखित पांडुलिपियां भी यहां मौजद है। 651 प्रकार की स्तवन व स्तोत्र ग्रंथों की पांडुलिपियां हैं। इनके अलावा 501 प्राचीन उपदेश ग्रंथ, 489 कथाएं, 458 तरह के दर्शन ग्रंथ, 142 आयुर्वेद ग्रंथ, 160 व्याकरण ग्रंथ, 339 ज्योतिष शास्त्र सम्बंधी ग्रंथ, 83 कोश, 298 प्रकार के मंत्र-तंत्र सम्बंधी ग्रंथ, 61 आचार सम्बंधी ग्रंथ, 7 खगोल शास्त्र के हस्तलिखित ग्रंथ, 7 वैदिक गणित के और 1 कामशास्त्र का ग्रंथ हस्तलिखित रूप में पाडंुलिपि संरक्षण केन्द्र में सुरक्षित रखे गए हैं। इनमें अधिकतर प्राकृत भाषा और फिर राजस्थानी व संस्कृत के ग्रंथ शामिल हैं।

सोने से लिखित पांडुलिपि करती है आकर्षित

राठौड़ ने बताया कि यहां उपलब्ध पांडुलिपियों में स्वर्णाक्षरों से लिखित ‘स्वर्णाक्षरीय श्री कल्पसूत्र’ अति विशिष्ट श्रेणी की हस्तलिखित पांडुलिपि है, जिसमें आज भी सभी अक्षर सोने की आभा संजोए हुए हैं। रंगीन चित्रों से युक्त इस श्री कल्पसूत्र ग्रंथ को बारसासूत्रम ग्रंथ भी कहा जाता है। यह श्री भद्रबाहु स्वामी द्वारा रचित ग्रंथ है। आकर्षक सोने के अक्षरों व मनमोहक रंगीन चित्रों से सुसज्जित यह पांडुलिपि अत्यधिक महत्वपूर्ण है तथा यहां आने वाले पर्यटकों को विशेष रूप से आकर्षित करती है। इसके अलावा ‘बाराबुदर’ पांडुलिपि अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इसके तीन खंड है। इसमें हाथ से बनाए हुए जावा इंडोनेशिया के 9वीं शताब्दी के बौद्ध मंदिर की आर्कियोलोजिकल डिजाइन अंकित है। बताया जाता है कि भारत में इस दुर्लभ ग्रंथ ‘बाराबुदर’ की सिर्फ तीन प्रतियां उपलब्ध हैं, जिनमें से यह एक प्रति लाडनूं में सुरक्षित है। यहां की एक और विशेष हस्तलिखित कृति ‘पट्ट दर्शन’ है, जो एक ही कागज पर 40 फुट लम्बी है। इस पर भी हाथ से तुलिका द्वारा बनाए रंगीन चित्रों के साथ सुंदर हस्तलिपि में तैयार किया गया है। इसमें जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों का विवरण अंतिक किया गया है। इसे देखने के लिए भी लोग लालायित रहते हैं। इस ग्रंथ से एक रंगीन पुस्तक भी तैयार की गई है, जिसके माध्यम से पर्यटक दर्शक परी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं और मूल पांडुलिपि प्रति को बिना छेड़छाड़ के सुरक्षित रखा जा सकता है।

शोधकर्ताओं के लिए है तीर्थस्थल

लाडनूं ही नहीं बल्कि समूचे क्षेत्र का यह अपनी तरह का प्रथम पांडुलिपि संरक्षण केन्द्र है। इस हजारों दुर्लभ पांडुलिपियों के अद्भुत संग्रह में पूरे क्षेत्र की मंदिरों, उपाश्रयों, आश्रमों, संतों, पुजारियों, घरों आदि से पांडुलिपियां प्राप्त करके उन्हें संग्रहित व संरक्षित किया गया है। विभिन्न शोधार्थियों, प्राध्यापकों, स्वाध्याय करने वालों और रूचि रखने वाले लोगों के लिए यह किसी तीर्थस्थल से कम नहीं है। यहां उपलब्ध सभी दुर्लभ ग्रंथों को डिजीटाईज्ड किए जाने की प्रक्रिया के कारण उन्हें चिरकाल तक सुरक्षित किया जाना और सबके लिए सहज रूप से उपलब्ध करवाया जाना भी संभव हुआ है।
– जगदीश यायावर, 
पीआर एंड एडिटिंग, जैविभा विश्वविद्यालय, लाडनूं।
मो. 9571181221
kalamkala
Author: kalamkala

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