अध्यात्म और साहित्य हैं समाज परिवर्तन के सशक्त माध्यम- कुलपति प्रो. दूगड़, लाडनूं में आयोजित दो दिवसीय ‘काव्य सुर सरिता’ का उद्घाटन कार्यक्रम 

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अध्यात्म और साहित्य हैं समाज परिवर्तन के सशक्त माध्यम- कुलपति प्रो. दूगड़,

लाडनूं में आयोजित दो दिवसीय ‘काव्य सुर सरिता’ का उद्घाटन कार्यक्रम 

लाडनूं (kalamkala.in)। जैन विश्व भारती में विराजित शासनश्री मुनि विजय कुमार, तपस्वी मुनिश्री जयकुमार व मुनिश्री मुदित कुमार के सान्निध्य में आयोजित की जा रहे दो दिवसीय ‘काव्य की सुर सरिता’ कार्यक्रम में प्रेक्षा इंटरनेशनल में आयोजित ‘अध्यात्म एवं कविता’ विषय पर हुए उद्घाटन सत्र को सम्बोधित करते हुए मुख्य अतिथि जैन विश्वभारती संस्थान के कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ ने कहा है कि आज समाज में परिवर्तन की सबसे अधिक आवश्यकता बनी हुई है, जिसे अध्यात्म और साहित्य से बदला जा सकता है। उन्होंने साहित्य में अध्यात्म को सबसे महत्वपूर्ण बताया और कहा कि वीरों की गाथाएं हों या श्रृंगार सम्बंधी गाथाएं सभी कुछ समय के बाद लुप्त हो जाती है, परन्तु अध्यात्म की गाथाएं हमेशा जीवित रहती हैं। उन्होंने शांति, मयूरों एवं त्याग-तपस्या की धरती बताते हुए जैन विश्व भारती को आध्यात्मिक धारा से अनुप्राणित बताया और यहां की प्राणवान ऊर्जा से सभी साहित्यकारों को प्राणवान बनने एवं अपनी ऊर्जा से इस धरा की प्राणशक्ति को बढाने का आह्वान किया।

कविता को जागृत होकर सुनना चाहिए

कार्यक्रम में सान्निध्य प्रदान कर रहे शासनश्री मुनि विजयराज ने अपने सम्बोधन में कवि की विशेषताओं को उल्लेखित किया और कहा कि कविता को सुनने वाले को भी उसमें कई रस मौजूद होने की जानकारी होनी चाहिए। इसलिए कविता को जागृत होकर ही सुनना चाहिए। उन्होंने व्यक्ति को सच्चा इंसान बनने के लिए प्रेरित किया और एक गीत सुनाया। तपस्वी मुनिश्री जयकुमार ने कहा कि अध्यात्म और कविता का सम्बंध शरीर में सांस के महत्व की तरह से होता है। कवि अध्यात्म के प्रति जुड़ा हुआ होता है। हमारे देश के साहित्य का आधार अध्यात्म ही रहा है। चाहे तेरापंथ धर्मसंघ हो या अन्य सब में ही अध्यात्म साहित्य का आधार रहा है। उन्होंने कहा, ‘जो हृदय चेतना जगा सके, उसे मैं कविता कहता हूं।’ आििद अपनी कविताएं भी प्रस्तुत कीं।

कवि होना सौभाग्य की बात

कवि राजेंश चेतन ने कवि होने को सौभाग्य बताते हुए कहा कि जिन्होंने कविता को लिखा और कविता को जिया, उन्हें सदैव याद किया जाता है। अध्यात्म पर लिखे गए काव्य को उन्होंने सदैव जीवंत बताया और कहा कि वाल्मिकी रामायण, वेदव्यास का महाभारत, तुलसीदास रचित रामचरित मानस आदि आध्यात्मिक साहित्य आज भी अमर है। ‘गुरू ग्रंथ साहिब’ को हम दंडवत प्रणाम करते हैं, उसे गुरू का स्थान दिया गया है। यह संतों की कवितामय वाणी ही है। हमारे जैन आचार्यों व संतों ने भी अध्यात्म के साथ कविताएं लिखी हैं और वे जनमानस को प्रभावित कर रहीं हैं। कवि अशोक बत्रा ने कहा, ‘कविता मूलतः संवेदना व भाव का विषय है, विचार का नहीं। अध्यात्म प्रशांत महासागर की तरह शांति का विषय है। कविता की उछलती लहरें और प्रशांत महासागर की शांति दोनों का मिलाप होता है। यही कवि की कला होती है। हिंदी साहित्य भारती के अध्यक्ष योगेन्द्र शर्मा ने वेदों से अध्यात्म और काव्य दोनों की उत्पति बताई और वेद काल से लेकर अब तक के कवियों भगवदवाद और उसे जनमानस तक पहुंचाने की जानकारी दी।

समागत कवियों का किया गया सम्मान

चन्दनतारा दूगड़ फाउंडेशन लाडनूं-वापी-हैदराबाद के प्रायोजन में होने वाले इस काव्य सुर सरिता कार्यक्रम में डा. अशोक बत्रा, योगेन्द्र शर्मा, डा. रसिक गुप्ता, राजेश चेतन, डा. आदित्य जैन, डा. कमलेश जैन बसंत, करणसिंह जैन, केसरदेव मारवाड़ी, दीपा सैनी, नरेश शांडिल्य, प्रियंका राय ओमनंदिनी, बलजीत कौर, मधु मोहिनी उपाध्याय, मनोज गुर्जर, धर्मेन्द्र किलर, महेश दुबे, राजेश विद्रोही, घनश्यामनाथ कच्छावा, डा. राहुल अवस्थी, डा. रुचि चतुर्वेदी, श्रद्धा शौर्य, संदीप शजर, सपना सोनी, समोद सिंह कमांडो, सरला मिश्रा, सरिता जैन, सोनल जैन, शंकर आकाश आदि प्रमुख कवियों का सम्मान पट्ट ओढा कर एवं साहित्य भेंट करके किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता जैन विश्व भारती के अध्यक्ष अमरचंद लूंकड़ ने की। मुख्य अतिथि जैविभा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ रहे और विशिष्ट अतिथि के रूप में राजेश दूगड़, योगेन्द्र शर्मा रहे। कार्यक्रम का आरम्भ मुनियों द्वारा णमोकार महामंत्र का पाठ करके किया गया। प्रारम्भ में जैन विश्व भारती के मंत्री सलिल लोढा ने स्वागत वक्तव्य प्रस्तुत किया। अंत में राजेश खटेड़ ने आभार ज्ञापित किया। इस अवसर पर जैन विश्व भारती के पूर्व अध्यक्ष धर्मचंद लूंकड़, राजकुमार चौरड़िया, शांतिलाल बैद, अजीत चौरड़िया, राजेश भोजक, जैविभा विश्वविद्यालय के कुलसचिव राजेश मौजा आदि एवं अन्य लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन डा. लिपि जैन ने किया।
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Author: kalamkala

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