वाह रे सरकार, लाडनूं की व्यवस्थाएं हुई तार-तार-
ईओ पद पर तीन दिन में संजय बारासा को लगाया और हटाया, नगर पालिका बना राजनीति का घिनौना अखाड़ा,
यह कैसा रगड़ा-झगड़ा, लाडनूं के लोगों को बाहर खदेड़ा, सांगेला व पंवार को लेकर भी झमेला
लाडनूं (kalamkala.in)। नगर पालिका लाडनूं की प्रशासनिक व्यवस्था को पिछले काफी सालों से चकनाचूर करके रख दिया है। राजनीतिक चालों और चक्करों के बीच शहर के शासन की पूरी तरह से ऐसी-तैसी करके छोड़ी है। यहां अधिशाषी अधिकारी पद को बरसों से कटी पतंग बनाया हुआ है। ईओ का स्थाई पद नहीं मिलने से यहां आम नागरिकों को अपने रोजमर्रा के और आवश्यक कामों के लिए भी तरसना पड़ रहा है। चुनावी आचार संहिता लगने, तबादलों पर रोक लगने आदि किन्हीं कारणों को छोड़ कर यहां का ईओ का पद रोज चूड़ा बदलने वाला ही रहा है। हाल ही में यहां सहायक प्रशासनिक अधिकारी संजय बारासा को राज्य सरकार ने आदेश जारी करके अधिशाषी अधिकारी नियुक्त किया था और उन्होंने इस पद पर अपनी जोइनिंग करके काम शुरू भी कर दिया था। सरकार के इस आदेश का लगभग सभी पार्षदों ने इसका स्वागत किया और लाडनूं के सभी नागरिकों ने उम्मीद लगाई कि अब नगर पालिका में अटके उनके सभी काम अब आसानी से हो पाएंगे। लोगों ने नगर पालिका पहुंच कर संजय बारासा का ईओ के रूप में स्वागत किया। लेकिन, मात्र तीन-चार दिनों के बाद ही सरकार ने एक और तबादला आदेश जारी कर दिया और अपने तीन दिन पहले के आदेश पर पानी फेर दिया।
ईओ का पद बना हिंडोला
लाडनूं को सरकार ने फिर से टारगेट बना कर ईओ के पद को हिंडोला बना डाला। संजय बारासा को फिर से सहायक प्रशासनिक अधिकारी के पद पर लगा दिया और छापर की नगर पालिका में ईओ के पद पर कार्यरत सहायक लेखाधिकारी द्वितीय भवानी शंकर व्यास को लाडनूं का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है। इसके साथ ही लाडनूं के लोगों को हाल ही में किए गए तबादलों में बाहर फेंक दिया गया है। इनमें वर्तमान में लाडनूं में एसआई के रूप में कार्यरत कनिष्ठ सहायक गोपाल सांगेला को यहां से हटा कर डीडवाना भेज दिया गया है। कनिष्ठ लेखाकार राजेन्द्र सिंह पंवार को लाडनूं से सीधे अलवर भिजवाने के आदेश हुए हैं। अलवर से वसीम खान को उनकी जगह लाडनूं लगाया गया है। यह सब आश्चर्यजनक लग रहा है।
चर्चा है, भाजपा के दो गुट हैं आमने-सामने
आखिर यह सब किसके इशारों या डिजायर से किया गया है? इसे लेकर लाडनूं में लोगों में अच्छी-खासी गर्मागर्म चर्चाएं चल रही हैं। लोगों का कहना है कि नगर पालिका मंडल में केवल अकेले अधिशाषी अधिकारी के पद पर नियुक्ति को लेकर भाजपा के दो गुट आमने-सामने हो गए हैं। पिछले सप्ताह सहायक प्रशासनिक अधिकारी संजय कुमार बारासा को अधिशाषी अधिकारी का अतिरिक्त कार्यभार दिये जाने के तीन दिन बाद पुन: उन्हें इस पद से हटा दिए जाने को इन दो गुटों की लड़ाई माना जा रहा है। संजय कुमार बारासा को नियुक्ति दिलाने में भाजपा का एक गुट आगे आया था, जिस पर दूसरे गुट ने रोष जताते हुए उसे तुरन्त प्रभाव से हटाने के लिए पैरवी शुरू कर दी। हालांकि संजय कुमार बारासा की नियुक्ति होने पर पक्ष और विपक्ष के सभी पार्षदों व अन्य जनप्रतिनिधियों ने हर्ष व्यक्त किया था और इसे नगर के हित और नगर विकास के लिए बेहतर निर्णय बताया था। लेकिन, कुछ कथित नेता असंतुष्ट हो गए। ऐसे नेताओं के व्यक्तिगत स्वार्थ को ही संजय बारासा के विरूद्ध गढ़ी गई रणनीति माना जा रहा है, जिसमें उन्हें अत्यल्प समय में ही उन्हें अधिशाषी अधिकारी के पद से मुक्त करने के आदेश करवा दिए गए हैं। अब देखना यह है कि जिन लोगों या भाजपाइयों ने संजय बारासा की नियुक्ति करवाई थी, वे क्या करते हैं। यह भाजपा के दो गुटों के बीच शक्ति-परीक्षण ही कहा जाएगा, देखें कौन अपने मकसद में सफल रह पाता है।
क्यों फेंका जा रहा है लाडनूं के लोगों को बाहर
नगर पालिका को अपने फुटबॉल गेम का अखाड़ा बना दिया गया है। लोगों का कहना है कि संजय बारासा के साथ यह खेल खेलने के बाद राजेन्द्र सिंह पंवार और गोपाल सांगेला को भी यहां से ‘किक-आउट’ करने के आदेश भी जारी करवाए गए। इनको भी यहां भाजपा नेता ही लाए थे। कांग्रेस राज में इन्होंने अपना समय लाडनूं से बाहर रह कर ही गुजारा था। लेकिन एक साल भी नहीं हो पाया और इन्हें यहां से फेंक दिया गया। ये दोनों शख्स लाडनूं के जाए-जन्मे हैं, और यहां नगर पालिका में इनका कार्य भी काफी संतोषजनक रहा। लोगों में इन्हें लेकर कभी कोई शिकायत नहीं रही। फिर अचानक क्या हुआ, जो इन पर भी तबादलों की गाज गिर गई। लगता है आज भी राज्य सरकार पर कांग्रेसी मानसिकता के लोगों का वर्चस्व बना हुआ है और भाजपा के लोग अपनी कोई मर्जी नहीं चला सकता। अथवा भाजपा का कोई एक गुट कुछ कांग्रेसी नेताओं की सलाह से काम करने में जुटे हैं। हो सकता है कि सत्य कुछ और ही हो, लेकिन इतना तो सत्य प्रतीत होता है कि इस सारी कवायद का असर भाजपा को आगामी चुनावों में भुगतना पड़ सकता है। इसका खामियाजा आगामी पंचायत राज चुनाव में और नगर पालिका चुनाव में तो अवश्य ही उठाना पड़ेगा और आगामी विधानसभा चुनावों पर भी इसकी छाप देखने को नजर आए तो कोई अचरज नहीं होगा।






