विनय से होते हैं आयुष्य वृद्धि, विद्या में विकास, यश का प्रसार और शक्ति का विस्तार- आचार्यश्री महाश्रमण, जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा द्वारा नवनिर्मित अभ्युदय भवन व उपासक साधना केन्द्र का हुआ लोकार्पण

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विनय से होते हैं आयुष्य वृद्धि, विद्या में विकास, यश का प्रसार और शक्ति का विस्तार- आचार्यश्री महाश्रमण,

जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा द्वारा नवनिर्मित अभ्युदय भवन व उपासक साधना केन्द्र का हुआ लोकार्पण

लाडनूं (kalamkala.in)। आचार्यश्री महाश्रमण ने यहां जैन विश्व भारती स्थित सुधर्मा सभा में शुक्रवार को अपने मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में ‘क्यों करें विनय’ विषय को विवेचित करते हुए कहा कि प्रश्न हो सकता है कि विनय क्यों करना चाहिए। विनय करने से क्या लाभ हो सकता है। सामान्य प्राणी भी बिना प्रयोजन के कोई कार्य नहीं करता है। विनय के विषय में बात करें तो मान और कषाय को दूर करने एक माध्यम है- विनय। अहंकार को दूर करने के लिए विनय का प्रयोग करना चाहिए। कहा गया है कि अबाध, निर्बाध सुख प्राप्त करना है, उसके लिए मोक्ष की प्राप्ति आवश्यक है। चारित्र के पालन से मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। ज्ञान से दर्शन की प्राप्ति और फिर चारित्र की प्राप्ति होती है। ज्ञान प्राप्ति के लिए विनय की परम आवश्यकता होती है। विनय से ज्ञान की प्राप्ति, ज्ञान से दर्शन, दर्शन से चारित्र और चारित्र से मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। मोक्ष की प्राप्ति हो गई तो जीवन को परम सुख की प्राप्ति हो सकती है। विनय को एक आधारशिला के रूप में देखा जा सकता है। विनय को धर्म का मूल भी कहा गया है। अहंकार शून्यता और साथ में नम्रता आती है, वह विनय होता है। उन्होंने कहा कि संस्कृत के एक श्लोक में प्रेरणा दी गई है कि जो विनयशील होता है, उसके चार चीजों की वृद्धि होती है। विनयशील का आयुष्य बढ़ता है, उसके विद्या में विकास होता है, उसका यश फैलता है और उसकी शक्ति की विस्तारित होती है। विनय नम्रता का प्रयोग है। कहीं बड़े लोग मिलें, संत मिले, उन्हें विधि अनुसार वंदन करना अथवा उनके प्रति विनय का भाव अभिव्यक्त करने का प्रयास करना चाहिए।

साधु-संत प्रतिदिन करें प्रतिक्रमण, अलोयणा के माध्यम से चारित्र की सफाई

आचार्यश्री महाश्रमण ने साधु-संतों को चारित्र रूपी घर की सफाई की प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि प्रतिदिन प्रतिक्रमण, अलोयणा आदि के माध्यम से चारित्र की सफाई करने का प्रयास करना चाहिए। प्रतिक्रमण को भी शुद्ध रखने का प्रयास करना चाहिए। कोई भूल, गलती आदि हो जाए तो उसका प्रायश्चित्त ले लेने से चारित्र निर्मल रह सकता है। विनय की भावना हो तो शील की प्राप्ति हो सकती है। प्रवचन के बाद आचार्यश्री ने अनेक चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं का समाधान प्रदान किया। प्रवचन सभा का प्रारंभ आचार्यश्री महाश्रमण ने मंत्रोच्चारण से किया। साध्वी वृंद ने प्रज्ञा गीत का संगान किया।

अभ्युदय भवन व उपासना साधना केन्द्र में किया पदार्पण

आचार्यश्री महाश्रमण इस मंगल प्रवचन कार्यक्रम के उपरान्त जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा द्वारा नवनिर्मित अभ्युदय भवन एवं उनके अंतर्गत बने उपासक साधना केन्द्र में पधारे। आचार्यश्री के पदार्पण से पूर्व महासभा के पदाधिकारियों व उपासक-उपासिकाओं द्वारा वहां एक घण्टे तक जप-अनुष्ठान का भी क्रम रहा। आचार्यश्री से मंगलपाठ का श्रवण कर भवन के निर्माणकर्ता व अनुदानदाता श्री जी. जयंतीलाल, विजय, सुयश सुराणा परिवार ने भवन का लोकार्पण किया। इस दौरान कार्यक्रम में महासभा के प्रधान न्यासी सुरेशचन्द गोयल ने भवन के संदर्भ में अवगति प्रदान की। भवन के निर्माणकर्ता व अनुदानदाता जयंतीलाल सुराणा व उपासक श्रेणी के संयोजक सूर्यप्रकाश श्यामसुखा ने भी अपनी भावाभिव्यक्ति दी। इस संदर्भ में आचार्यश्री महाश्रमण ने मंगल आशीर्वाद प्रदान करने के साथ उपस्थित उपासक-उपासिकाओं को विधिवत प्रशिक्षण प्रदान करते हुए उपासक साधना केन्द्र का प्रायोगिक शुभारम्भ भी किया। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति रही। ज्ञातव्य है कि अभ्युदय भवन ‘तेरापंथ प्रबोध’ व ‘व्यवहार बोध’ की रचना स्थली के रूप में भी जाना जाता है।

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Author: kalamkala

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