वसंत ऋतु में ज्ञान-विज्ञान सीखने के साथ आहार-संयम का अनुपालन भी जरूरी- डा. शेखावत, बसन्त पंचमी महोत्सव का आयोजन

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वसंत ऋतु में ज्ञान-विज्ञान सीखने के साथ आहार-संयम का अनुपालन भी जरूरी- डा. शेखावत,

बसन्त पंचमी महोत्सव का आयोजन

लाडनूं। जैन विश्वभारती संस्थान के प्राकृत एवं संस्कृत विभाग द्वारा बुधवार को बसन्त पंचमी का पर्व बहुत धूमधाम से मनाया गया। माता सरस्वती की पूजा-अर्चना के साथ कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया। समणी मृदुप्रज्ञा के मंगलाचरण के बाद कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि डॉ. प्रद्युम्नसिंह शेखावत ने अपने सम्बोधन में कहा कि भारत में छः ऋतुए होती हैं, जबकि अन्य देशों में दो या तीन ऋतुएं ही पाई जाती है। उन्होंने बसन्त ऋतु के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए इसके वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक पक्ष को भी उजागर किया तथा कहा कि इस ऋतु में हमें ज्ञान-विज्ञान को सीखने के साथ-साथ आहार-संयम का अनुपालन भी करना चाहिए। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि प्रो. रेखा तिवारी ने माता सरस्वती को ज्ञान की देवी बताते हुए उनकी आराधना करने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि हमें हमेशा विद्यार्थी बने रह कर जिज्ञासु भाव से कुछ न कुछ सीखते रहने चाहिए। उन्होंने विद्यार्थियों को आह्वान करते हुए कहा कि यह संस्थान ज्ञान का प्रमुख केन्द्र रहा है और यहां ज्ञान की आराधना होती रहती है। अतः हमें भी इस ज्ञान-यज्ञ में सहभागिता करनी चाहिए। कार्यक्रम की अध्यक्षा करते हुए प्रो. दामोदर शास्त्री ने ज्ञान के महत्त्व को कुछ छोटी-छोटी बातों के माध्यम से प्रतिपादित किया। उन्होंने बताया कि ज्ञान का सार ही आचार या व्यवहार है। अतः हमें ज्ञानार्जन का प्रयत्न करते रहना चाहिए, जिससे सरस्वती की आराधना स्वतः ही हो जायेगी। डॉ. समणी संगीतप्रज्ञा ने प्रारम्भ में अतिथियों का स्वागत किया तथा विषय प्रवर्तन करते हुए बसन्त पंचमी को सरस्वती के जन्मदिवस के रूप में मनाए जाने की जानकारी दी। उन्होंने सरस्वती को ज्ञान, सुन्दरता और पवित्रता की देवी बताते हुए, उनके अनेक रूपों का वर्णन किया। कार्यक्रम का संयोजन डॉ सत्यनारायण भारद्वाज ने किया तथा अन्त में सब्यसाची सारंगी ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
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Author: kalamkala

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