पर्युषण महापर्व के प्रथम दिन ‘खाद्य संयम दिवस’ मनाया, जयाचार्य की 145वां निर्वाण दिवस मनाया

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पर्युषण महापर्व के प्रथम दिन ‘खाद्य संयम दिवस’ मनाया, जयाचार्य की 145वां निर्वाण दिवस मनाया

लाडनूं (kalamkala.in)। श्रीमद् जयाचार्य के 145वां निर्वाण दिवस शासन गौरव साध्वी कल्पलता व सेवा केंद्र व्यवस्थापिका साध्वीकार्तिक यशा के सान्निध्य में ऋषभद्वार भवन में आयोजित हुआ। इसके साथ ही शुरू हुए पर्युषण पर्व के प्रथम दिवस को खाद्य संयम दिवस के रूप में मनाया गया। इस अवसर पर साध्वीश्री सुनंदा ने कहा कि शरीर के लिए भोजन जरुरी है, पर भोजन कैसे करें, कब खाएं, कितना खाएं, इसका ध्यान रखना जरूरी है। आयुर्वेद में कहा गया है कि भोजन में लगभग 3 घंटे का अंतराल रहना चाहिए। समय-समय पर अनशन, ऊनौदरी, आयम्बिल करके पेट को आराम भी देना चाहिए। कार्यक्रम में हाकम साध्वी ने कहा कि दान में अभय दान, रतन में चिंतामणि रत्न, वृक्ष में कल्पवृक्ष जैसे अमूल्य होते हैं, वैसे ही पर्वों में पर्युषण महापर्व है। पर्युषण अध्यात्म, उपासना, योग व आत्मशुद्धि का पर्व है पर्युषणका मतलब संसार में रहना ही नहीं, बल्कि आत्मा व परमात्मा के आसपास रहना है। शरीर नहीं आत्मा में झांको, दूसरों को नहीं भीतर मुड़ कर देखो और भीतर की गांठें खोलकर मैत्री की धारा प्रवाहित करो, यही पर्युषण का सार है।

जयाचार्य को याद किया

कार्यक्रम में शासन गौरव साध्वी ने कहा, पर्युषण मतलब बाहर घूमते-घूमते अपने भीतर जाकर देखना यानि भीतर लौटना। कषाय व 18 पापों, प्रमाद व बहिर्मुखी बनने के कारण मानव अशांत रहता है तो पर्युषण में 8 दिन धर्म आराधना करो, अपने भीतर के विकारों को उपासना, साधना व संयम द्वारा पवित्र बनाकर आत्मालोचन करके मन को हल्का बनाने का यह पर्व पर्युषण है। इस अवसर पर उन्होंने श्रीमद् जयाचार्य को याद करते हुए बताया कि जयाचार्य का लाडनूं पर बहुत उपकार रहा है। उन्होंने लाडनूं में 9 चातुर्मास किए। मुनि अवस्था में एक, युवाचार्य बनने के बाद दो। आचार्य बनने के बाद छः चातुर्मास किए।लाडनूं क्षेत्र की पुण्यवता है कि यहां 12 मास साधु-साध्वियों का विराजना होता है। यहां का सेवा केन्द्र उन्हीं कुछ देन है। चरमोत्सव, पटोत्सव, मर्यादा महोत्सव भी उनकी ही देन है। उन्होंने साहित्य के भंडार भरे हैं तथा संघ की नींव को मजबूत कर उसे संरक्षण और सुरक्षा प्रदान की। कार्यक्रम में श्रीमद् जयाचार्य का 145वाँ निर्वाण दिवस पर साध्वी वृंद ने गीतिका प्रस्तुत की। प्रारम्भ में तेरापंथ महिला मंडल की बहनों ने मंगलाचरण किया। कार्यक्रम का संयोजन साध्वी खुशी प्रभा ने किया। इस अवसर पर लाडनूं का श्रावक समाज उपस्थित रहा‌। लाडनूं के मूल ठिकाने में सुबह से शाम तक व ऋषभ द्वार में नवकार मंत्र का जाप सुचारू रूप से चलाया जा रहा है।

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Author: kalamkala

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