लाडनूं में भाजपा और कांग्रेस दोनों की अटकी टिकटों पर लगी है सबकी टकटकी, क्या गुल खिलाएगी टिकट वितरण के बाद नाराज दावेदारों की अधिक संख्या

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लाडनूं में भाजपा और कांग्रेस दोनों की अटकी टिकटों पर लगी है सबकी टकटकी,

क्या गुल खिलाएगी टिकट वितरण के बाद नाराज दावेदारों की अधिक संख्या

लाडनूं (कलम कला- खास रिपोर्ट)। लाडनूं में टिकट मांगने वालों की संख्या अधिक होने से निश्चित है कि बड़ी संख्या में आकांक्षियों की टिकटें कटेगी और यह संख्या तीन दर्जन हो सकती है। ऐसे में टिकट वितरण के बाद माहौल कैसा रहेगा, यह सोचना राजनीति के उलटफेर की आशंकाओं को जन्म देता है। यहां सबसे अधिक दावेदारी ठोकने वाले भारतीय जनता पार्टी के लोग है। हालात ऐसे हैं कि इनमें परस्पर एक दूसरे से पटड़ी नहीं बैठती। पूर्व विधायक मनोहर सिंह के पुत्र करणी सिंह और भाजपा जिलाध्यक्ष गजेन्द्रसिंह के बीच सहमति बहुत मुश्किल है। दोनों का कोई गहरा राजनैतिक अनुभव नहीं है। करणीसिंह अपने पिता के तीन बार विधायक रहने के बावजूद राजनीति में कभी कोई रुचि नहीं रखी। पिता की बीमारी के चलते इन्हें भाजपा से दावेदार बनाने के प्रयास हुए और पूर्व विधायक के निधन के बाद उनको विरासत संभलवाने को उनके आस पास के लोग उतावले हो गए। इसी प्रकार गजेन्द्रसिंह को सीधे ही जिलाध्यक्ष बनाया गया। इससे पहले वे एक आम आदमी जितनी ही राजनीति जानते-समझते थे। शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत व्यक्ति की राजनीतिक लालसा अवश्य रही थी और इसी कारण भागदौड़ व प्रयासों से भाजपा में पहली बार सीधा जिलाध्यक्ष पद हासिल कर लिया। इसके बाद विधायक बनने के सपने पलने लगे। वरिष्ठ कार्यकर्ताओं में जगदीश सिंह राठौड़ एडवोकेट भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य रह चुके, सहकारिता प्रकोष्ठ में प्रदेश संयोजक रह चुके। उनमें राजनीति की गहरी सूझबूझ भी है। सरपंच, पंचायत समिति सदस्य, उप प्रधान आदि चुनिंदा पदों पर रहने का अनुभव भी है। उनका मानना है कि लाडनूं सीट को राजपूत सीट के रूप में प्रस्तुत करना राजनीतिक भूल है। यहां 7 बार जाट, 3 बार राजपूत और 1 बार ब्राह्मण विधायक रह चुके हैं। चुनावी जीत तात्कालिक समीकरणों पर निर्भर करती है। राजपूत समाज से राजेंद्र सिंह धोलिया, आशुसिंह लाछड़ी, कर्नल प्रताप सिंह रोडू आदि अनेक दावेदार भाजपा में सामने आए हैं। जाट समाज से नाथूराम कालेरा, देवाराम पटेल, डा. नानूराम चोयल आदि प्रमुख हैं। ब्राह्मण समाज से ओमप्रकाश बागड़ा, जगदीश प्रसाद पारीक, मनीषा शर्मा, अंजना शर्मा आदि हैं। मूल ओबीसी से उमेश पीपावत व सुमित्रा आर्य प्रमुख हैं।

आखिर किसकी होगी भाजपा टिकट?

इनमें से भाजपा का टिकट लेकर कौन आता है, यह अभी स्पष्ट नहीं है। शुरू में भाजपा जिलाध्यक्ष गजेंद्र सिंह ओड़ींट के नाम को उछाला गया। इधर करणी सिंह के दावेदार केवल उन्हें ही भाजपा की टिकट का हकदार बताते हैं। जगदीश सिंह वकील साब तो अपनी टिकट मान कर चल रहे हैं। इसी प्रकार प्रताप सिंह, आशुसिंह, नाथूराम कालेरा, उमेश पीपावत आदि भी टिकट को अपना मान रहे हैं। लगता है सभी दावेदार अलग-अलग ढंग से टिकट पर अपना पक्का दावा ठोंक रहे हैं। करणीसिंह ने तो यहां फील्ड में दावेदारी जताई, लेकिन पार्टी के समक्ष पेश नहीं की, इस पर पार्टी ने अपनी अंतिम बैठक से पूर्व उनसे आवेदन लिया। इसी प्रकार महिला मोर्चा की पूर्व जिलाध्यक्ष सुमित्रा आर्य ने आवेदन नहीं किया तो पार्टी के दिल्ली कार्यालय से उनके बायोडाटा मांगे गए। पार्टी वोटों के जातिगत आंकड़ों को भी पूरा ध्यान में रख रही है। नेताओं को अच्छी तरह से पता है कि लाडनूं क्षेत्र में सबसे ज्यादा मत मूल ओबीसी के हैं। उसके बाद पार्टी जाट मतों की संख्या और अनुसूचित जाति के मतों को महत्व दे रही है। ऐसे में पार्टी निर्णय का आधार क्या बनाती है, यह तो अभी समय के गर्भ में है।

मनोनुकूल टिकट नहीं होने पर क्या?

लेकिन, टिकटों के बटवारे, नीति, पार्टी की गतिविधियों और अन्य राजनीतिक हलचल आदि पर आम आदमी की निगाहें टिकी हैं।
यह तो निश्चित है कि एक व्यक्ति टिकट लेकर आएगा और इससे अन्य लोगों में निराशा छाएगी। यह निराशा कौन सा रूप लेगी, यह चिंतनीय है। ऐसा भी संभव है कि मनोनुकूल उम्मीदवार सामने नहीं आने पर अन्य व्यक्ति अकेले या एकजुट होकर कोई पार्टी की उम्मीदों के विपरीत निर्णय ले ले। पार्टी निश्चित रूप से ऐसी संभावनाओं को ध्यान में रखेगी और इस टूट-फूट की रोकथाम के लिए समय रहते कोई ठोस कदम अवश्य उठाएगी।

कांग्रेस में क्या होगा?

कांग्रेस पार्टी से मौजूदा विधायक मुकेश भाकर, कांग्रेस के प्रदेश सचिव रामूराम साख, पूर्व पीसीसी सदस्य लियाकत अली और पूर्व प्रधान जगन्नाथ बुरड़क प्रमुख दावेदार हैं। इनमें से मुकेश भाकर को वर्तमान विधायक होने का लाभ मिलता दिख रहा है। लेकिन, उनके सचिन पायलट खेमे का प्रमुख होने से टिकट प्रभावित हो सकती है। रामूराम साख मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नजदीकी माने जाते हैं तथा केन्द्रीय नेतृत्व में भी खासी पैठ है। इसी कारण वे अपनी स्थिति को मजबूत मान रहे हैऔ। इधर लियाकत अली अल्पसंख्यक वोटों को लेकर आशान्वित हैं। वे 2008 में कांग्रेस से प्रत्याशी भी थे। उन्हें जिले में अल्पसंख्यकों को दी जाने वाली सीटों के गणित का समीकरण अनुकूल लग रहा है। इधर पूर्व कृषिमंत्री रहे हरजीराम बुरड़क के पुत्र व पूर्व प्रधान जगन्नाथ बुरड़क को भी कांग्रेस टिकट की पूरी उम्मीद है। अशोक गहलोत से उनके पिता की घनिष्ठता और पिता के 6 बार विधायक रहने से उनको टिकट मिलने की उम्मीद है। वे पिछला विधानसभा चुनाव आर.एल.पी के टिकट से लड़ चुके। इसे जहां उनका नकारात्मक बिंदु माना जाता है, वहीं करीब 20 हजार वोट लेने से उसे पक्ष में मजबूती के रूप में भी देखा जा रहा है।

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Author: kalamkala

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